“ हमने आनन-फ़ानन में एक दूसरे के कपड़े उतारे, और तभी जब मुझे याद आई अपनी भग्न योनि ”
शरण्या ( 27 तभी, 27 अभी )
मैं यक़ीन कर चुकी थी कि मेरे पास एक भग्न योनि थी। और क्या वजह हो सकती थी कि जब मैंने कि जब मैंने 10 सालों की अवधि में अपने एक-दो बार बॉयफ्रेंड और एक-दो बार ग़ैरों के साथ (जो मेरे बॉयफ्रेंड नहीं थे) सेक्स किया, तो उनमें से सिर्फ़ तीन मर्तबा ही सम्भोग हो पाया (एक बार एक बॉयफ्रेंड के साथ,दो दफ़ा ग़ैरों के साथ और दूसरों के साथ तो कभी नहीं) और मैंने कुल मिलाकर दो बार कामोन्माद हासिल किया (और गहराई तक जाने वाले सम्भोग से नहीं) ? मैं बहुत ढेर सारा सेक्स और काफ़ी कामोन्माद हासिल करना चाहती थी, लेकिन मेरी योनि ने मुझे सहयोग नहीं दिया। मैं दूसरी अन्य महिलाओं साथ उनके वासनात्मक अनुभव से अपनी तुलना करती रही। कैसे हर दूसरा कोई आसानी से सेक्स करने के क़ाबिल दिखता है ? मेरे साथ क्या गड़बड़ थी ? क्या ग़लत था मेरे साथ ? मैंने पूरी तरह अपनी भग्न-योनि से कोई आशा रखना बंद कर दिया था। ( हाँ, मैं मानती हूँ कि ये ये पढ़ने सुनने में बड़ा बेवकूफ़ सा लग रहा है । मैं न तो बहुत यौन-सम्बन्धी अनुभवी थी और ना ही यौन-सम्बन्धी आज़ाद।आजकल के कूल नौजवानों की भाषा में कहूँ तो- मुझे इस रास्ते पर बहुत दूर तक जाना है जागृत होने के लिए ।)
मुद्दे पर आते हुए : मैं ऑनलाइन एक लड़के से मिली. हमने व्हाट्सएप्प पर दो हफ़्ते बात की ( अपने बॉयफ्रेंड से सम्बन्ध तोड़ने के बाद मैं सही में कुछ रूमानी सम्बंध नहीं ढूंढ रही थी ; वो भी मेरी इस बात को मान गया । हम रूबरू मिले और ये महसूस किया कि हमारी (मेरी?) पवित्र मंशाओं के बावजूद, हम लोग दिमाग़ी, जज़्बाती और जिस्मानी रूप से एक दूजे के प्रति बहुत आकर्षित हो गए थे। दो दिनों के बाद जब हम दूसरी बार मिले, मैं उसके फ़्लैट पर गई जहाँ हमने रंगरेलियाँ मनाते हुए एक लाजवाब टीवी शो देखा और खाने को कुछ आर्डर किया। खाने के बाद घर जाने के लिए मुझे ट्रेन पकड़नी थी पर मैंने सोचा कि मैं एक एपिसोड और देखकर जाऊँगी। जबतक मैं वहाँ थी, उसने बिलकुल कोई भी हरक़त नहीं की। यहाँ तक कि हम लोग अलग सोफ़े पर बैठे थे। क्या मेरा अनुमान कि हमारे बीच वासनात्मक तनाव था, ग़लत था ? क्या ये सही में एक निष्काम डेट थी, बावजूद हमारे व्हाट्सएप्प पर एक दूसरे से इज़हार करने के कि हम एक दूसरे से आकर्षित थे ? मैं जानना चाहती थी, मैं ये भी चाहती थी कि चुम्बन जल्दी हो जाए ताकि इस डेटिंग की रस्म में एक आरामदायक मुक़ाम आए। अगर इसे हम डेट कह भी सकते हैं, तो। मैं अमूमन पहले क़दम नहीं बढाती क्योंकि मुझे हमेशा ये शक़ रहता है कि शायद सबकुछ दोस्ती सा है, निष्काम। पर वो भी कोई पहल नहीं कर रहा था, तो फिर, कुछ करना ज़रूरी हो गया।
खाने के बाद, हम आख़िरकार एक ही सोफ़े पर बैठ गए और उस लाजवाब शो को फिर से देखने लगे। उसने तब मुझसे पूछा कि क्या मैं उसको आलिंगनबद्ध करना चाहती हूँ। मैंने किया। तो हम दोनों ने किया। शायद फिर भी ये दोस्ती-सा ही है, मैंने सोचा। दोस्त आपस में आलिंगनबद्ध हो सकते हैं, मैं मानती हूँ। इसलिए मैंने उसका चुम्बन लिया। वो हक्का-बक्का नहीं प्रतीत हुआ तो मैंने सोचा कि चलो, ये ठीक है, ये निष्काम नहीं। हम एक दूसरे के और भी गले लगे, एक दूजे को और भी चूमा, और उसने माना कि देर हो रही है। उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं रुकना चाहती हूँ या फिर वो मुझे गाड़ी से ट्रेन स्टेशन तक छोड़ दे, ताकि मैं अपने घर के लिए आख़री ट्रेन पकड़ सकूँ (बाद में उसने मुझसे कहा कि वो लड़कियों द्वारा पहला क़दम उठाने को प्रश्रय देता है ताकि उसे यक़ीन हो कि लड़की पूरी तरह आराम से है और कुछ भी करने के दबाव में नहीं है। वो मुझसे ज़्यादा जागरुक है, ये लड़का) | वहाँ ठहरने की कोई योजना नहीं थी। मगर वो शो अच्छा था और साथ ही वो आलिंगन और चुम्बन भी। मैंने कहा कि मैं रुकूँगी और हमने शो देखकर ख़त्म किया। तब, हमने एक बहुत-ही उत्साहित यौन वासना में डूबा सत्र शुरू किया जो समाप्त हुआ उसका मुझे बैठक के सोफ़े से गोद में उठाकर अपने शयनकक्ष तक ले जाने पर (वो कुछ ऐसा बेतुका फ़िल्मी-सा महसूस हुआ कि मैं ख़ुद को खिलखिलाकर हँसने से नहीं रोक पाई)। बिन देखे, बिन जाने, मैं आज कल के “नेटफ्लिक्स और चिलिंग” वाले संदर्भ में जा भटकी थी। हमने आनन-फ़ानन में एक दूसरे के कपड़े उतारे और तब मुझे याद आई। अपनी भग्न योनि। हो सकता है इस बार ये ख़ुद ही साथ देगी, मैंने उम्मीद का पुल बाॅधा। मैं इस लड़के पर काफ़ी लट्टू थी और सच में चाहती थी कि मेरी योनि सहयोग करे, पर पाठकों, इसने सहयोग नहीं दिया। हमने सम्भोग का प्रयत्न किया और हार गए। मुझे अपने शर्मनाक रहस्य के बारे में उस लड़के से कहना पड़ा। उसने ऐसा नहीं सोचा कि ये कोई एक बहुत गम्भीर बात है। उसने फटाफट कुछ चिकनाई युक्त क्रीम ( lubricant) लगाई पर वो भी काम न आई। तो हम लोगों ने एक दूसरे को चूमा और शुभ-रात्रि कहकर सो लिए।
अगले हफ़्ते वो मेरे घर पे आया। वहाँ कोई क्रीम नहीं लगी पर कुछ भेदन-सा हुआ और मैं बहुत उत्तेजित हो गई। इसमें पूरी तरह से क़ामयाबी नहीं मिली पर वो एक शुरुआत थी। ऐसा लगा कि मेरी योनि मेरा कहा मानने लगी थी। पर अगली बार, वही विपदा। मेरी योनि हड़ताल पे चली गई। मुख मैथुन , क्रीम, विभिन्न मुद्राएँ - हमने सब आज़माया। पर मेरे पैर अनायास सख़्त हो जाते और भेदन काम नहीं करता था। मैं सच में उसके साथ सम्भोग करना चाहती थी और मैं सच में एक साधारण योनि की चाहत रखती थी। मैं अचानक इतनी बेचैन हो गई कि मैं उस लड़के से नज़रें तक नहीं मिला पाई। यद्यपि हमारी पहली मुलाक़ात को दो हफ़्ते ही बीते थे और चार हफ़्ते जबसे हमने बातचीत शुरु की थी, हमने ये माना था कि हम दोनों दृढ़ता से एक दूसरे में समा रहे हैं। मैंने इससे पहले कभी-भी किसी के बारे में इस तरह से नहीं महसूस किया था और मुझे यक़ीन था कि वो अब दोबारा कभी-भी मेरी बामुश्किल योनि के साथ सम्भोग करना नहीं चाहेगा। यहाँ तक कि मैं ख़ुद अपनी इस मुश्किलशुदा योनि लेकर सम्भोग नहीं करना चाहती थी। जब मैंने उससे नज़रें मिलाने से इनक़ार किया और कम्बल में छिप गई, उसने मुझे उभरने को मजबूर किया, मुझे कसके अपनी बाहों में भर लिया और बिना किसी ढुलमुल परिभाषा के मुझसे कहा कि मैं एक अनाड़ी बेवक़ूफ़ के जैसी हूँ। वो अभी-भी कोई एक बड़ी बात नहीं है, हमने सेक्स करना अभी सिर्फ़ शुरु किया ही है और हमारे आगे अभी एक लम्बा समय है, कोशिश करके इसे सही करने का। मुझे घबरा जाने की ज़रुरत नहीं है, वो इसे एक समस्या की तरह नहीं देखता था और वो यक़ीनन इंतज़ार और कोशिश जारी रखने की चाहत रखता था। और क्या मैं अब मेहरबानी करके ख़ुद को छिपाना बंद करुँगी और बेचैन होकर सोने नहीं जाऊँगी क्योंकि वो मुझे इस तरह बुझा हुआ नहीं देख सकता। और तब मैंने वो बात यक़ीनन जानी जिसका मुझे तब तक बस अंदेशा था कि मैं न सिर्फ़ एक उस तरह की लड़की थी जो अकस्मात् नेटफ्लिक्स और चिल (Netflixed And Chilled) की दुनिया में भटक गई बल्कि मैं उस तरह की लड़की भी थी, जो सारी रुकावटों के बावजूद अपने आप को रोमांस की सीमा के बवंडर के बीच में पाती है। मैं इस दयालु, जागरुक लड़के से दीवानों की तरह मोहब्बत करने लगी थी। अगर वो मेरी योनि के साथ धैर्यवान रहना चाहता था, तो मैं भी वही चाहती थी। मैंने उस योनि को मन ही मन धिक्कारना बंद किया, उस लड़के को चूमा और सोने चली गई।
अगली रात, मेरी योनि ने इस तरह काम करने की ठानी जैसा उसने पहले कभी नहीं किया था। कोई क्रीम नहीं, कोई मुख-मैथुन नहीं, कोई आधुनिक मुद्राओं की ज़रुरत नहीं थी। मैं इतनी हतप्रभ और हर्षित थी कि मैं अपने आप को खिलखिलाने से रोक नहीं पाई, हमारे बाक़ायदा कामयाब वक़्त के दौरान। ना आख़िर में ज़ोर से आनंदित होकर चिल्लाने से रोक पाई, और अपने चेहरे पे छाई बेवक़ूफ़ी भरी बनावटी मुस्कराहट को पोंछने से। वो लड़का भी भौंचक्का था कि कितनी जल्दी मेरी योनि ने सहयोग किया लेकिन वो ज़्यादा प्रफुल्लित था मेरी दमकती ख़ुशी पर। ज़ाहिर तौर पे, मेरी योनि काम में आने के लिए बस इतना ही चाहती थी कि मैं जज़्बाती तौर पे (और संभवतः प्यार में भी) लिंग के स्वामी के साथ जुड़ी रहूँ। यानि कि वो भग्न नहीं थी, बहुत ऊॅचा दर्ज़ा रखती थी, जो कि अभी-भी एक बकवास है क्योंकि वो एक रात के ठहराव या इत्तेफ़ाक़न जुड़ाव को लगभग असंभव बनाता है।लेकिन मैं सोचती हूँ कि ये लड़का इन सारी उलझनों की बूटी है, जो इसको संवारता है। तब से अब तक हमने अनेकों क़ामयाब सम्भोग किए। मैं ख़ुद भी कामोन्माद के क्षेत्र में इतनी ज़्यादा सफल नहीं हुई, पर जैसा कि उस लड़के ने एक बार कहा था, हमारे पास इसकी कोशिश करने और इसको सही करने के लिए आगे एक लम्बा समय है। (अगर आप ये पूछना चाह रहे हैं, तो हमने जो शो देखा, तो उसका नाम ‘ग्लो’ था - लम्बे वक़्त तक लगातार देखने के लिए बिलकुल सही और चिल करने के लिए भी।
“ उसने मेरे कानों में फुसफुसा कर कहा कि वो मुझसे प्यार करती है। जो भी कुछ मैं कह सकी, वो बस इतना था, ‘मुझे पता है’ ”
लीसा ( 37 तभी, 38 अभी )
मैं 12 वर्षों की अकामुक, जोशीली पर चालाकीपरस्त शादी से बाहर निकल आई और अपने आप को एक कढ़वी-सी तलाक़ प्रक्रिया के बीचों बीच पाया। हर तरह की अंतरंगता और शायद कुछ प्यार की लम्बी अवधि की तृष्णा से उत्तेजित, मैंने पूरे होशो-हवास में ख़ुद को एक व्यवहारिक रिश्ते की ओर अग्रसर किया, जहाँ सेक्स की मुख्य भूमिका थी और उसके विभिन्न स्वरूपों को तलाशने की एक सहभागिता थी ।
उस रिश्ते ने कई वर्षों की अनुपस्थित वासना के शून्य को भरा, लेकिन उसने प्यार किए जाने के एहसास को महसूस करने में कोई मदद नहीं की। मैंने तीन वर्षों तक प्यार की भावनाओं को कोने में दबाकर रखने और आदान-प्रदान का इंतज़ार नहीं करने का संघर्ष किया। मैंने जज़्बातों के वर्गीकरण की इस सोच को समझने पर काम किया हालाँकि मुझे डर था कि मैं इसके लिए सक्षम नहीं हूँ।
पिछले साल, हमारी खोजबीन हमें एक ऐसे जोड़े का स्वरूप अपनाने की ओर ले गई, जो और जोड़ों के साथ वासनात्मक रूप से आदान-प्रदान करने के लिए तैयार है। मैं अपने जोड़ीदार से द्वि-जिज्ञासु ( bi curious) होने पर बात करने के लिए काफ़ी खुल चुकी थी। जिस पहले जोड़े से हम मिले, उस लड़की और मैंने बहुत बढ़िया रंग जमाया। अपनी मुलाक़ात के पहले कुछ ही मिनटों में हम जुड़ गए और मैंने पाया कि औरतों के साथ फ़्लर्ट करने में मैं बड़ी स्वाभाविक हूँ। घर वापसी के रास्ते मैं हम एक दूसरे पर से अपना हाथ नहीं हटा सके और जबतक हम घर पहुँचे, मर्द नज़रअंदाज़ हो चुके थे। उस रात हमने एक-दूसरे के जोड़ीदारों के साथ और एक ग्रुप की तरह और आख़िरकार सिर्फ़ हम दोनों ने सेक्स किया। जब वो (लड़की) और मैं प्रेम कर रहे थे, उसने मेरे कानों में फुसफुसाकर कहा कि वो मुझसे प्यार करती है और उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं भी वैसा ही महसूस करती हूँ। वो पल मेरी याद्दाश्त में उकेरता-सा रह गया, इसलिए कि मैं उसे वापस कह नहीं पाई, क्योंकि उस रात मैंने महसूस किया कि मैंने जज़्बातों का अभी अभी वर्गीकरण कर डाला था।
जो भी कुछ मैं कह सकी, वो बस इतना था, “मुझे पता है”
“ मैं अपने मासिक-धर्म में थी। हमने सम्भोग किया, मुझे इससे घृणा महसूस हुई, पर उसे नहीं ”
अमीया ( 21 तब, 27 अब )
हम दोनों 21 के थे, कॉलेज में थे और सही में अच्छे दोस्त थे। मैं छिपे तौर पे उसकी चाहत रखती थी, बाद में उसने बताया की वो भी रखता था। लेकिन हमने इसे कभी स्वीकारा नहीं जबतक कि एक दिन हम अकेले थे, मेरे माता-पिता के घर पर, और हमने अपने होठों और जिस्मों को एक दूसरे की खोज करते हुआ पाया।कुछ दिनों के बाद उसने उॅगली से मुझे उत्तेजित किया, ये पहली बार था जब किसी ने सहमति के साथ ऐसा किया हो, और हे प्रभु! वो ख़ुशी। हम दोनों ने इससे पहले कभी सम्भोग नहीं किया था, लेकिन वो इंतज़ार करना चाहता था, एकदम सम्भोग नहीं करना चाहता था। इसलिए हमने उसके अलावा सबकुछ किया, उसने उॅगली से मुझे उत्तेजित किया, मेरे जननांगों को चूमा, और मैंने उसके। तब फिर एक दिन हमने महसूस किया कि हमें सम्भोग करना चाहिए, लेकिन मैं अपने मासिक-धर्म से गुज़र रही थी। उसने कहा कि वो इसकी परवाह नहीं करता और हमने सम्भोग किया बावजूद इस सच्चाई के कि मुझे रक्तस्राव हो रहा था। उसने कहा कि ये मेरे औरत होने का एक हिस्सा है, उसने पूरी तरह उसका मज़ा लिया। मुझे इससे घृणा महसूस हुई पर उसे नहीं। वो अच्छा तो था पर स्पष्टतः मुझे ख़ून देखकर सदमा-सा लगा और कुछ कारणों से उसे ऐसा नहीं लगा।
कुछ दिनों के बाद जब मेरी मासिक-धर्म की मियाद ख़तम हो चुकी थी, मैं उसके घर पर फिर से गई। हमने फिर सम्भोग किया, हमने बिस्तर के कोने, पढ़ने की मेज़ और ज़मीन पर किया। और मैं भूल नहीं सकती जिस अंदाज़ से उसने मुझे देखा था। एक जादू की तरह, दस सालों तक एकसाथ रहने के बाद, वो अभी-भी मुझे उसी अंदाज़ से देखता है और मैं अभी-भी उस दिन की ओर लौट जाती हूँ जब हमने क्लासों को बंक किया था ज़मीन पर मिलन को अंजाम देने के लिए, ऐसा प्यार पाने के लिए जैसा हर किसी को एक बार ज़रूर मिलना चाहिए।
“ एक विवाह जैसे लम्बी अवधि के रिश्ते में सहमति का मोल-भाव करना कुछ ऐसा है जिसपर कोई बात करना नहीं चाहता ”
मन्दाकिनी ( 27 तब, 32 अब )
अंसारी मामले के बाद मैं इस बातचीत का मतलब निकालने की कोशिश में लगी रही। शुरू में मैंने इसे काफ़ी निराशा से पढ़ा था। मैं उसके काम की विशाल प्रशंसक रही हूँ - उसका हास्य, उसकी लेखनी और उसका प्रदर्शन। मुझे पसंद आया उसका ज़िन्दगी को हास्यास्पद तरीक़े से लेना और मेरा मन था कि ऐसा जागरूक जवान हम सबके दिल में बसे, मैं बह निकली इस जागरूकता को अपने दल में लेने पर। इसलिए जब मैंने उसके बारे में पढ़ा तो मेरी पहली प्रवृति थी उसमें उस आरोप से बचाव के रास्ते ढूँढना। ये कहने के लिए कि - ए, छोड़ो, ये उतना भी ख़राब नहीं था। शुक्र है वो दौर तुरन्त गुज़र गया। मैंने फिर भी इत्मीनान की एक छोटी ठंडी साँस भरी जब मैंने उसका माफ़ीनामा पढ़ा। और तब सामजिक मीडिया और घनघनाते व्हाट्सएप्प समूहों की गपशप ने मुझे अपने घेरे में चूस लिया। वहाँ एक ज़बरदस्त माहौल था, ये फ़ैसला ईजाद करने को कि जो हुआ वो सब बस एक बुरा वासनात्मक अनुभव था, कोई मारपीट का मामला नहीं। और ये कि अगर उस लड़की को वो सब पसंद नहीं था तो उसे वहाँ से बस चले जाना चाहिए था। इसपर भी बड़े मज़ाक़ हुए कि अब तो सम्भोग के पहले कोई काॅन्ट्रैक्ट ही साईन कराना पड़ेगा ताकि कोई हमें बलात्कार का दोषी न ठहराए। कई लोगों ने जोश से हामी भरी और ख़ूब शोर हुआ जो ये कह रहा था कि # मैं भी # Me too *अभियान आपे से बाहर जा चुका था। मैंने ये सब सख़्त नापसंद किया। मैंने इन बातचीतों के विषय की हरेक चीज़ को नापसन्द किया। लेकिन ये उन बातचीत के ज़रिये ही मैं ख़ुद की ज़िन्दगी में सहमति के होने/ना होने को माप पाई।
*( इंटरनेट अभियान जिसमें हज़ारों की तादाद में औरतों और कुछ पुरुषों ने भी यौन शोषण के शिकार होने की अपनी कहानी बताई- ये कह कर कि Me Too- यानि ऐसा मेरे साथ भी हुआ है)
मैं सोचती हूँ कि एक विवाह जैसे लम्बी अवधि के रिश्ते में सहमति का मोल-भाव करना कुछ ऐसा है जिसपर कोई बात करना नहीं चाहता। जहाँ जुड़ाव (hook ups) और अल्पावधि के रिश्तों में सहमति के बारे में ख़ूब लिखा गया है, वहीँ शादी के अन्दर सेक्स के बारे में सिर्फ़ एक वार्तालाप है - या वैवाहिक बलात्कार या फिर “आज रात नहीं जानम, मेरे सिर में दर्द हो रहा है” जैसे वाहियात मज़ाक़।
इसलिए मेरी शादी के दौरान (जो अब ख़त्म हो चुकी है), सम्भोग एक कँटीला प्रसंग था। विभिन्न कामीक्षा और जुदा ज़रूरतें। मैं सोचती हूँ कि यहाँ ज़्यादा ग़लती उस धारणा की है मोनोगैमी यानि एक समय पर एक ही जोड़ीदार का होना - को मानती है। मगर वो एक दूसरी गुफ़्तगू है। इसलिए जब भी मैंने कहा कि मुझे सम्भोग का मन नहीं है, तो मुझे एक खीज और रूखापन का सामना करना पड़ा। कोई प्रचंडता नहीं जिसे हम साधारण रूप से हिंसा समझते हैं। मगर वहाँ ये समूची भावनात्मक चालबाज़ी थी जिसका मुझे सामना करना था, और जिसके होते मुझे अक्सर तब सम्भोग करना पड़ता जब मैं नहीं करना चाहती थी।
वो एक घटना जो मुझे ख़ास याद है, जहाॅ हमने कुछ दिनों तक सम्भोग नहों किया था और मुझे अपने दोस्तों के संग एक घरेलू पार्टी में जाना था और तभी तोल-मोल का विचार मुझे तनावग्रस्त करने लगा। क्योंकि वो बहस पूर्णतया इस बारे में होती कि कैसे हमने इतने दिनों तक सम्भोग नहीं किया और कैसे आज सम्भोग नहीं हो सकता और संभवतः हम दोनों उसके दूसरे दिन सम्भोग नहीं कर पाएँगे क्योंकि मैं ख़ुमारी में होऊँगी। इसलिए मैंने किया। मैंने सम्भोग किया। सम्भोग मेरा गेट पास था। हम दोनों में से किसी को भी उसमें आनन्द नहीं आया। मैंने मशीनी तरह से हरक़तों को पूरा किया और घर से निकल पड़ी।
मैं अब तक अपने आप को विवाह में वासनात्मक आक्रमण की उत्तरजीवी नहीं पुकारती हूँ क्योंकि विचारों में भी ऐसे सोच पाना, दर्दनाक होता है। अपने आप को उस नज़रिए से देख पाना, उस बात की सच्चाई से सहमत हो पाना दर्दनाक है।
इसलिए हाँ, रोज़ की रज़ामंदी पर ज़्यादा गुफ़्तगू , मेहरबानी करके ?
“ ये सितम तभी रुका जब मैंने पुलिस और उसके अभिभावकों के पास जाने की धमकी दी उन ई-मेल के साथ जो उसने मुझे लिखे थे ”
अहंबला ( तब 16, अब 25 )
मैं 16 की थी जब मैं अपने दिल्ली के स्कूल के एक पसन्दीदा लड़के के संग एक रिश्ते में बंध गई। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं उसकी मोहब्बत में हूँ, और वो भी मुझसे प्यार करता है। उसके ठीक बाद, अभी 18 नहीं, उसने मुझे उसके साथ सेक्स करने को फुसलाया। मैं तैयार हो गई। वो रज़ामंदी से था। पर उसके बाद 5 सालों तक जो भी हुआ, वो नहीं था। एक लम्बी दूरी के रिश्ते में ज़रुरत के मुताबिक, वो हर कुछ महीनों बाद मुझसे मिलने आता था। इन समयों में, वो अपने आप को जबरन मुझपर थोपता था, वो लोगों के बीच मुझे वासनात्मक गतिविधियाँ करने को मजबूर करता था, भरे बाज़ार में अपने को मुझपर ज़बरदस्ती थोपता था, मेरे पहनावे पर व्यंग्य कसता था, जब मैं कहती थी “ नहीं, मैं सम्भोग करना नहीं चाहती हूँ”, तो नाराज़ हो जाता था, वो अपने आपे से बाहर चला जाता था जब भी मैं किसी दूसरे व्यक्ति के साथ कोई बातचीत करती थी, वो ये कहकर मेरा उपहास करता था कि मेरे पास कोई भी मर्द मित्र नहीं है, और उसने मुझे अपनी माँ से मिलवाया, जिसने मेरे शरीर पर ताने कसे थे, मुझे शर्मिंदा किया।
उन्हीं समयों में एक बार हमने सम्भोग किया, उसने बिना मेरी रज़ामंदी के मेरी तस्वीरें खीचीं, बिना मेरी सहमति के मेरा विडियो बनाया। इस बारे में उसने पाँच वर्षों के बाद मुझे बताया जब मैं उससे नाता तोड़ चुकी थी। उसने मुझे उन तस्वीरों और विडियो का ग़लत इस्तेमाल करने की धमकी दी, उसने धमकी दी कि मैं जहाॅ हूँ, वो वहाॅ आ धमकेगा और/या चेन्नई (जहाँ मैं पढ़ती थी) के लोगों को भेजकर मुझे ठिकाने लगाने की, उसने मेरी तुलना सड़ी हुई मछली, वेश्याओं, कुलटाओं से करते हुए मुझे ई-मेल भेजे और मुझे एक बेहूदा बेटी होने का क़ुसूरवार ठहराया जिसे अपने “परिवार के संग समझौता” करने की कोई सुध नहीं है।
ये सितम तभी रुका जब मैंने पुलिस और उसके अभिभावकों के पास जाने की धमकी दी, उन ई-मेल के साथ जो उसने मुझे लिखे थे। मैं वर्षों तक डर के साए में ज़िंदा रही, और खुलकर बात नहीं करने पर, अपने दोस्तों और परिवार को नहीं बताने पर, ऐसे ज़हरीले रिश्ते से बाहर नहीं निकलने पर अपने आप को दोषी ठहराती रही।
अपनी इस बेइज़्ज़ती के बारे में मैंने अपने नज़दीकी दोस्तों से सिर्फ़ पिछले साल ही खुलकर बात की। जब उसने और मैंने संबंध तोड़े, तो मेरे स्कूल के सभी परस्पर दोस्तों ने, भूल से, मुझसे सवाल किए, मुझे उसके पास वापस लौट जाने को फुसलाया, मुझे दोषी ठहराया कि मैंने उसको समझा नहीं और उस जैसे महान लड़के को जाने दिया। सबसे ज़्यादा बेतुकी बात तो ये रही कि मुझे अपनी सफ़ाई देने की ज़रूरत महसूस हुई।
एक दिन भी नहीं गुज़रता है जब मैं मेरे साथ उसके दुर्व्यवहार के बारे में सोचकर काॅप नहीं उठती हूॅ, जबकि वो अपने दोस्तों के दायरे में घूमता रहता है, ऐसा ढोंग रचाते जैसे मानो कि वो एक अच्छा लड़का है।
अब हम बात नहीं करते। अब हम संपर्क में नहीं हैं। लेकिन मैं अपनी ज़िन्दगी सुकून से जीने का हक़ रखती हूॅ, बिना किसी वासनात्मक समीपता के भय के, उन आदमियों के साथ जो मुझे सम्मान देते हैं। और ये, मेरे लिए, उस अंधकार से निवारण है। यहीं, मेरी दास्ताँ का अंत होता है।
“ मैं उत्तेजित और जिज्ञासु दोनों थी। वो पहली बार जब हम एक दूसरे से लिपटे चिपटे, सब कुछ बहुत बेडौल था। वो सबसे अनुपयुक्त चीज़ थी जो मैंने कभी-भी किया होगा ”
ज़ेना ( 33 तब, 33 अब )
मैं और मेरा जोड़ीदार शुरुआत से ही एक दूसरे पर पर काफ़ी आसक्त थे और हमारी आपसी सूझबूझ भी ज़बरदस्त थी। वो पहली बार जब हम आपस में लिपटे चिपटे, तब हमारा रिश्ता काफ़ी नया-नया था। वो मेरे लिए पहली दफ़ा भी था। मैं उत्तेजित और जिज्ञासु, दोनों ही थी। वो पहली बार जब हमने किया वो सबसे बेडौल चीज़ थी जो मैंने कभी-भी की होगी। वो एक निहायत ही साफ़ सुथरा और एकांत स्थान था। हम दोनों एक दुपहिए पर बैठे थे। हमने एक दूसरे को छूना शुरू किया, और एक चीज़ दूसरे की ओर अग्रसर करती गई। और बहुत कम समय में हम एक दूसरे के जनाँनगों की ओर, ज़मीन पर थे। समा गए। ये हक़ीक़त है कि ये हमारे रिश्ते में इतनी तेज़ी थी कि वो अभी-भी मेरे रोंगटे खड़े कर देता है, हालाँकि हम दूसरे को अब और डेट नहीं करते।
सेक्स सच मुच : भग्न योनि और अन्य कहानियाँ
New stories of women's unforgettable sexual encounters.
चित्र: देबस्मिता दास
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