वीरा
आपने मेरे बारे में सुना होगा। शायद कोई आर्टिकल पढ़ा हो, या मुझे गूगल किया हो, या मेरी किताब के पीछे के कवर पर या किसी न्यूज़पेपर या मैगज़ीन के पन्नों पर मेरी शक़्ल देखी हो। एक टाइम था जब मैं थोड़ी-बहुत फेमस थी। शुक्र है, अब नहीं हूँ। मां-पापा के घर में बंद पड़ी गोदरेज़ अलमारी में एक फ़ोल्डर है, जिसमें बचपन के दिनों में राइटिंग की दुनिया में पड़े मेरे पहले कदम की कुछ निशानियां हैं। जैसे कि, वो पीले पड़ रहे अखबार,जिनमें मेरे न्यूयॉर्क टाइम्स के सबसे ज़्यादा बिकने वाले ग्राफ़िक नॉवेल और लिटरेचर फेस्टिवल में मेरे जाने के बारे में लिखा है। और भी बहुत कुछ।
अगर आपने उनमें से कोई भी आर्टिकल पढ़ा है, तो आपने मेरा चश्मा पहना चेहरा देखा होगा- थोड़ी टेंशन और थोड़े संकोच से भरा हुआ। साथ ही मुँहासे, हल्के-फुल्के निशान और कुछ-कुछ उभरे हुए दाँत, यानि बहुत सुंदर तो बिलकुल भी नहीं ! बोले तो ऐसी लड़की जिसे अपने दिमाग और अपनी मेहनत से काम चलाना पड़ता है। आपको लगेगा, अरे ये तो महाकाव्यों और मिथकों पर लिखती है, जरूर एक अच्छी लड़की होगी।
और सालों से, मैं वही रही हूँ- दूसरों को खुश रखने वाली एक अच्छी लड़की।
वो बाल प्रतिभा वाले दिन खत्म हुए ज़माना हुआ। अब मुझे लगता है कि मैं एक पुरानी, थकी हुई लेखिका हूँ। उम्र बढ़ रही है, बुढ़ापा पास आ रहा है। कभी-कभी असफल भी महसूस करती हूँ, खासकर जब नए, युवा लेखक तेजी से मशहूर हो जाते हैं। मुझे जलन होती है। मानती हूँ, कभी-कभी वो मुझसे बेहतर भी होते हैं। उन्होंने अपनी कला को निखारा है, मेहनत की है, शब्दों को सजाना सीखा है। वो डटे रहे, लगे रहे।
कभी-कभी मैं खुद ही सोचती हूँ कि काफी लंबे समय तक मैंने बाल प्रतिभा की प्रसिद्धि का कुछ ज़्यादा समय फ़ायदा उठाया।
इतनी भी अच्छी लड़की नहीं हूँ मैं। कभी लिखती, कभी नहीं लिखती! ना मैं कभी अपनी लिखाई को लेकर नियमित रही, ना ही दिनचर्या को लेकर। अपनी किताब के लिए भी मैंने मेरे प्रकाशक को बहुत इंतजार करवाया।
मैं सच में एक अच्छी लड़की बनना चाहती थी।
मेरे अंदर से एक आवाज़ आती है, संस्कारी नारी की, जो मुझे बताती है कि अगर मैंने सब सच बोलना शुरू दिया कि मैं दरअसल क्या-क्या करती हूँ, असल में क्या-क्या सोचती हूँ, तो यक़ीनन मुझसे सब कुछ छीन लिया जाएगा। मेरी मिथक-प्रेरित किताबें दुकानों में धूल खाती रह जाएंगी। आप अपने बच्चों या भतीजों और भतीजियों को मेरी ये बच्चों वाली किताबें नहीं पढ़ने देंगे - क्योंकि मेरा व्यक्तित्व आपको जमेगा नहीं। फिर मैं एक अच्छी रोल मॉडल नहीं रहूंगी। जब तक सबको खुश रख पायी, रख पायी। तब तक सब अच्छा ही था।
शायद इसीलिए मैंने सालों से नहीं लिखा है। अगर मैं ईमानदार, असली, और सच्ची नहीं हो सकती, तो मेरा चुप रहना ही बेहतर है।
अगर मैं तुम्हारे करीब आऊँ, आपनी हक़ीक़त दिखाऊँ – मेरे वो पहलू जो दर्द में हैं, कमज़ोर हैं, शर्म से भरे हैं – तो शायद मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़े। हो सकता है, सब बदल जाए।
तो हाँ, महंगा तो ये पड़ेगा।
भयानक
एक टाइम, जब मैं बच्ची थी…मैं उसके बारे में फिर से लिखना नहीं चाहती।
एक टाइम, गोवा के सुनसान बीच पर, मैं काफी डर गई थी, क्योंकि दो आदमी मेरा पीछा कर रहे थे।
एक टाइम, जब मेरे अपार्टमेंट में, एक पड़ोसी ने दरवाज़ा तोड़कर मेरा बलात्कार करने की कोशिश की।
कभी-कभी खौफ़ सिर्फ़ तब नहीं होता जब कोई कुछ कर दे, जैसे कि बलात्कार!
कभी-कभी वो छोटी खुराक में आता है। जैसे एक थप्पड़ या एक शब्द से!
कभी-कभी वो डर वजिनिस्मस (एक ऐसी समस्या जिसमें खुद ब खुद, औरत की योनि का रास्ता सख़्त हो जाता है) या सेक्शुअल संबंध बनाते समय हुए दर्द या तकलीफ़ से होता है। उस वक़्त दर्द से काँपते हुए भी मैं खुद से लड़ पड़ती हूँ। लेकिन अपने पार्टनर को इसका एहसास नहीं होने देती हूँ। उसको यही लगता है कि मैं मज़े ले रही हूँ। हाँ, मैं झूठ बोलती हूँ। क्योंकि एक और डर ये है – कि अगर मैंने अपना दर्द उसे बता दिया, तो वो मुझे ठुकरा देगा। मैं अकेली रह जाऊँगी।
वो तो खैर वैसे भी मुझे छोड़ जाता है।
कभी-कभी ये डर मेरे पेट में उठता है – किसी अंधेरी, सुनसान सड़क पर। जब मैं देखती हूँ कि एक मोटरसाइकिल आ रही है, दो नौजवान उस पर सवार हैं, हेडलाइट चमक रही है। मुझे महसूस होता है जैसे मैं कहीं फंस गई हूं।
कभी-कभी ये किसी ऑफिस में भभकता है, या किसी ऐसी जगह जहां बल मायने रखता है, कहाँ कोई मुझे किसी चक्करदार तरीके से बदतमीज़ बात कह देता है। उस वक़्त डर ये होता है कि कोई मेरी बात पर यकीन नहीं करेगा। (क्या उसका मतलब यही था? ये सब सिर्फ तुम्हारी सोच की ख़लल है– मेरे दिमाग में संस्कारी नारी की मम्मी यही सब कहती रहती है)
और भी कुछ याद करने का मेरा कोई इरादा नहीं।
अद्भुत
तुम्हारा आशिक़ जो वो प्लास्टिक ओढ़कर आता है, जिससे तुम्हारी कोख शुक्राणुओं के हमले से बचती है, दरअसल वो प्लास्टिक,मरे हुए जीव जंतुओं से बना है। करोड़ों साल पहले मर चुके, सड़ते हुए जीव और पौधों के अवशेष, जो दबकर और सघन होकर तुम्हारे हाथों तक ये अनमोल चीज़ पहुंचाते हैं।
सेक्स के बाद तुम्हारा पार्टनर जिस प्लास्टिक को इतनी आसानी से फेंक देता है – उसे बनने में 30 करोड़ साल लगे हैं।
गुज़रे ज़माने की भटकती आत्माएँ, निर्जीव चीज़ें, सब हमारी कोख़ में घुल रही हैं। अतीत, वर्तमान, जैविक, अजैविक, मानव और गैर-मानव, सब एक साथ।
अँग्रेजी और लैटिन के ये जुड़े हुए शब्द । प्रोमिसक्यूस यानी बड़े सारे रिश्तों वाले । प्रो-मिस्सर यानि मिलावट वाले । मिससैर यानि सब कुछ मिला हुआ । बोले तो सब एक साथ मिक्स करना।
बीभत्स
एक नौजवान था, जो – अब जाकर समझ आया– कि मुझ पर लट्टू था।
उस समय मैं शायद हसीन दिखती थी, लेकिन तब भी खुद को दाग-धब्बों वाली, चश्मा पहनने वाली एक किताबों में डूबी लड़की ही समझती थी। हालांकि तब मैं पतली थी और अक्सर हल्के, झीने कपड़े पहना करती थी। वो कपड़े जो सस्ते दामों में खरीदे जाते थे और जिनका डिज़ाइन बदन के उभार दिखाने वाला होता था।
इससे मेरे अंदर एक भ्रम पैदा होता था – जो आजकल तो मनोवैज्ञानिकों के लिए कमाई का ज़रिया है। लेकिन तब इसने मुझे एक ऐसी ज़िंदगी में ला धकेला था, जहाँ सेक्स की कमी थी।
इस लड़के ने, मुझे कुछ सस्ती डेट्स पर ले जाने के बाद (हम दोनों के पास ज़्यादा पैसे नहीं होते थे), नज़दीकियों को लेकर एक ऐसा सच बताया, जिसने हमारे बीच किसी भी तरह की गुटरगूं होने की संभावना ही खत्म कर दी।
उस वक़्त मैं पूरी तरह से बे तजुरबा तो नहीं थी, लेकिन मेरे सेक्शुअल अनुभव इतने कम थे कि उँगलियों पर गिने जा सकते थे। मैं भी उस आम सोच का शिकार थी कि सेक्स शर्मनाक होता है। और उस शर्म को मिटाने के लिए शराब पीनी पड़ती है, किसी और प्यासे बदन को ढूंढना पड़ता है, अंधेरी जगह में छिपकर मिलना पड़ता है और एक-दूसरे से फीलिंग्स की ज़िक्र भी नहीं होती है। फिर इसके बारे में दोबारा बात भी नहीं की जाती है।"सेक्स लिझ लिझा होता है," उसने कहा, "क्योंकि इसमें शरीर से निकलने वाले तरह-तरह के पानी जो शामिल होते हैं।"
मेरे दिमाग में एक बेफ़िक्र और बेहतरीन सेक्स का मतलब था साफ-सुथरे, अच्छे से संवरकर बैठे मर्द और औरत। बदन से पानी तो निकलता, लेकिन वो बिना छलके एक शरीर से दूसरे में जाता। जैसे वो अदाओं वाली अमीर औरतें ख़ूबसूरत कपों में, बिना एक बूंद गिराए, चाय डालती हैं।
मेरे दिमाग में मैंने अच्छे, तमीज़दार और सही तरीके से किए गए सेक्स की कल्पना की, जिसमें पूरी शालीनता और सटीकता हो।
कभी-कभी, अगर सेक्स थोड़ा "जंगली" होता, तो मेरे दिमाग में इसका ख्याल सड़क किनारे के चायवाले जैसा होता – जो ऊँचाई से तेज़ धार में चाय को एक गंदे गिलास से दूसरे में डालता, बिना एक बूंद गिराए। वही तेज़, मजबूत, बेहतरीन लहर।
बिना किसी गंदगी के।
लेकिन अब उस लड़के ने मेरे दिमाग में तकियों के खोल पर दाग लगने की बात डाल दी थी। जिससे मेरी कई पुरानी दूसरी चिंताएँ भी उभर कर सामने आ गयी थी। जैसे कि एक टाइम जब मैं एक नफ़ीस, समाज में काफी उठने-बैठने वाली दादी के साथ रहती थी (किराया बचाने के लिए), जो किसी भी तरह के दाग-धब्बों के सख़्त ख़िलाफ़ थीं। बस, मेरा गृहिणी वाला दिमाग जाग उठा: वो दाग हटेंगे कैसे?
मुझे याद है, मैंने इस घर में सफेद चादरों से पीरियड के दाग हटाने के लिए कितनी मेहनत की है। कौन सा सबसे कस के धुलाई करेगा – एरियल, कम्फर्ट स्टेन रिमूवर या वैनिश?
क्या इसके लिए टिशू की जरूरत होगी? और क्या कूड़ेदान रखना चाहिए ताकि सेक्स के बाद इस्तेमाल किए हुए टिशू सीधे उसमें जाएँ?
इन सवालों ने मेरे अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित और सेक्स से वंचित दिमाग में हड़कंप मचा दिया।
बाकी लोग आख़िर कैसे संभालते हैं ये सब कुछ?
मैंने एक ऐसी दोस्त से बात की, जिसे सेक्स का ज्यादा अनुभव था। जब मैंने शरीर से निकलने वाले पानी का ज़िक्र किया, तो उसने घिन से "छी!" बोलकर नाक सिकोड़ ली।
दूसरी दोस्त ने सुझाव दिया कि मैं कोई होटल बुक कर लूं (मेरे पास उतने पैसे नहीं थे), ताकि दाग हटाने जैसी मुश्किलें होटल के स्टाफ की हो जाए। उसने मज़ाक करते हुए कहा कि शायद उन लोगों न किसी गुप्त किताब में सेक्स से जुड़े दाग हटाने के खास तरीके भी लिख रखे होंगे। मेरी आँखों के सामने जैसे पूरा सीन बन गया। होटल के सफाई कर्मचारियों का एक गुप्त समूह, जो एक रहस्यमयी अनुष्ठान कर रहा था— लंबे चोगे पहने, एक सुनहरे बर्तन में वैनिश लिक्विड डालकर दाग हटाने की जादुई प्रक्रिया को अंजाम देते हुए।
जब मैंने बोला कि हमारे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं, तो दूसरी दोस्त बोली, "यही तो तुम्हारी असली प्रॉब्लम है। तुम्हें ऊंचे क्लास के मर्दों को डेट करना चाहिए।" यानी ऐसे मर्द जो अमीर हों और अपनी सेक्स लाइफ पर पैसे उड़ा सकें— ना कि वो गरीब लेखक और कवि, जिनसे मैं आमतौर पर मिलती थी।
पैसा कुछ समस्याओं का हल निकाल सकता है, जैसे सेक्स के दाग हटाना या शरीर से निकलने वाले पानी को साफ करना। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि वो मर्द बिस्तर में दिलदार होगा—या किसी और मामले में भी। लेकिन उस समय मुझे ये सब पता नहीं था। इसलिए हमने कभी सेक्स नहीं किया।
हास्य
मेरी सुनहरी कल्पनाओं में, जहाँ सेक्स पूरी तरह परफेक्ट होता है, वहाँ बदन भी हॉलीवुड की सुंदर हस्तियों की तरह बेदाग़, चिकने, नर्म और पूरी तरह से मॉइस्चराइज़, बोले तो मुलायम होते हैं।
लेकिन मेरी त्वचा में एक समस्या है, जिसे इचथियोसिस कहते हैं (जिसमें पैरों की त्वचा रूखी और पपड़ीदार हो जाती है)। (कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैं प्रसिद्ध मेलुसीन जलपरी की वंशज हूँ—जिसकी टांगें भी शायद ऐसी ही रही होंगी। कहा जाता है कि हर रविवार नहाने के लिए वो किसी अलग-थलग बाथटब में घुसी रहती थी। लेकिन फिर भी वो अनोखे तरीके से सुंदर थी और एक फ्रांसीसी शाही लड़के से शादी भी की। इस तरह, मेरे हिसाब से, वो यूरोप के सभी राजघरानों की पूर्वज बनी—जिसका मतलब ये हुआ कि प्रिंसेस डायना और सारा फर्ग्यूसन भी उसकी वंशज हुईं। सारा फर्ग्यूसन के बारे में सुना है कि उनको पसंद है अगर उनका कोई पैर चाटे। क्या पता ये भी इचथियोसिस की खुजली की वज़ह से रहा हो!)
(शायद मेरा ये क़बूल करना उसी तरह का क़बूलनामा है जैसा मेरे एक पुराने आशिक़ ने किया था, कि वो गंजा होने वाला है। पर चूंकि मैं आपको, यानी मेरे पाठक को, जानती नहीं, तो ये मुनासिब नहीं कि हम असली जिंदगी में कभी सेक्स करेंगे। इसलिए आपको इस बात से क्या फ़र्क पड़ेगा।)
तो, मैं हर रविवार मेलुसीन को समर्पित करते हुए बाथरूम में बंद हो जाती हूँ—त्वचा पर ढेर सारी क्रीम और पेट्रोलियम जेली लगाकर इसे मुलायम बनाने की कोशिश करती हूँ, फिर शेविंग करती हूँ। लेकिन… मैं तो चश्मा लगाती हूँ, और नहाते वक्त, जब मैं खुद को "परफेक्ट" बनाने की कोशिश कर रही होती हूँ, तो गर्म पानी से चश्मे पर भाप जम जाती है, और मैं अपने पैरों को अच्छी तरह शेव ही नहीं कर पाती हूँ।
यकीनन फिर वो दुःखद हादसा होता है— कभी-कभी रोमांस के बीच, अचानक मुझे अपने घुटनों के पीछे या पिंडली पर बिन छिले बालों का हिस्सा/पैच दिख जाता है! और तब मानो मेरी तमाम पूर्वज गृहणियों की आत्माएँ भूतों की तरह चीखने लगती हैं—और सेक्स एक कॉमेडी नाटक में तब्दील हो जाता है, जहाँ मैं अपने प्रेमी से उस बालों वाले पैच को छुपाने की कोशिश करती फ़िरती हूँ।
एक बार इस कोशिश में, मैंने अपने बिल्ली को, जो पास ही बिस्तर के इर्द-गिर्द घूम रही थी (शायद मेरे मर्द पार्टनर से जल रही थी), अपनी पिंडलियों पर रख लिया। लेकिन उसने पंजे निकाल लिए और वहां से भागने की कोशिश करने लगी। कोशिश नाकाम साबित हुई। फिर मैंने वहां तकिया रख लिया, फिर तौलिया।
आखिरकार, मेरे प्रेमी ने झुंझलाकर पूछा— "आख़िर ये हो क्या रहा है?"
फिर मुझे उसे सबकुछ बताना पड़ा कि कैसे शेविंग के दौरान मेरी पिंडली पर बाल का एक पैच छूट गया था। इसके बाद हम शरीर के बाल हटाने के तरीकों और उसमें जेंडर के भेदभाव को लेकर चर्चा करने लगे। मैंने उसे बताया कि एक बार जब मुझे पेडीक्योर करवाना था, तो इचथियोसिस की वज़ह से पेडीक्योर करने वाले को उस्तरे से मेरे पैरों के तलवे शेव करने पड़े—और ये सब एक यूनिसेक्स सैलून में हुआ था। वहां पीछे एक लंबी कतार में खड़े जवान मर्द लोग अपनी पीठ वैक्स करवाने का इंतजार कर रहे थे।
सेक्स में और भी अजीबोगरीब स्थितियाँ होती हैं, जिनके बारे में कोई बात नहीं करता—जैसे पेशाब जैसी गंध वाले जननांग!
जब मैं छोटी थी और हार्मोन उबाल पर थे, तो सेक्स को लेकर कोई अंदाज़ा या अनुभूति तो थी, लेकिन अब, सिर्फ उसकी मजेदार बातें ही याद हैं।
मुझे एक लड़का याद है, जो इस फिक्र में था कि कहीं सेक्स के बाद मेरे कपड़ों पर सिलवटें न पड़ जाएँ—और मुझे इस्त्री की ज़रूरत ना पड़े। क्योंकि उसका इस्त्री खराब हुआ पड़ा था! उसे लगा कि अगर मैं सिलवट वाले कपड़ों में उसके घर से निकली, तो ये एक तरह का बदनाम करने वाला सिग्नल होगा कि वहाँ सेक्स हुआ था!
करुणा
बालों से जुड़ी और भी मुश्किलें रही हैं। मुझे एक और अनुभव याद है—एक जवान मर्द से मुलाकात, जिसे बिना बालों वाले जननांग पसंद थे।
जब मैंने इस चाह को समझने की कोशिश की, तो पहले मैंने शेव किया, लेकिन उसकी निराशा दिख गई। उसे खुश करने के लिए, मैंने ब्राज़ीलियन वैक्स करवाने का सोचा। सेक्स से ज्यादा तो मुझे उसका अनुभव याद है— जब पूरे एक घंटे, उस वैक्सिंग करने वाली औरत ने कैसे सब्र बनाये रखा, और आराम से दूसरी औरतों के बुर के बालों की वैक्सिंग के किस्से मुझे सुनाती रही।
उस समय, मुझे एक अज़ीब सा अपनापन और बहनापा महसूस हुआ था। हम सब औरतें, समाज के तय किए गए सेक्शुअल मानकों को पूरा करने के लिए गरम मोम लगाती हैं, और प्राइवेट अंगों से इसे खींचकर निकालने का दर्द सहती हैं।
जब तक वो वैक्स लगाकर हटाती रही, वो संग- संग अपनी ज़िंदगी के बारे में बताती रही। उसकी दो बेटियाँ थी, जिनमें से एक दिव्यांग थी। उसके पति से झगड़े, और महामारी के दौरान उसकी बेटियों की रुकी हुई पढ़ाई को लेकर उसकी चिंता।
हम दोनों भारतीय औरतें थीं, लबालब गर्मी में बैठी थीं, और फिर भी इस क्रिया को ब्राज़ीलियन वैक्स का नाम दिया गया था। क्या था इसमें ब्राज़ीलियन? या हमारे बालों में? या हमारे प्राइवेट अंगों में? मुझे समझ नहीं आया। उसने बताया कि वो ख़ुद भी ब्राज़ीलियन वैक्स करती थी। WAX KAरने वाली औरत ने कैसे सब्र बनाये रखा, और आराम से दूसरी औरतों के बुर के बालों की वैक्सिंग के किस्से मुझे सुनाती रही।
उस समय, मुझे एक अज़ीब सा अपनापन और बहनापा महसूस हुआ था। हम सब औरतें, समाज के तय किए गए सेक्शुअल मानकों को पूरा करने के लिए गरम मोम लगाती हैं, और प्राइवेट अंगों से इसे खींचकर निकालने का दर्द सहती हैं।
जब तक वो वैक्स लगाकर हटाती रही, वो संग- संग अपनी ज़िंदगी के बारे में बताती रही। उसकी दो बेटियाँ थी, जिनमें से एक दिव्यांग थी। उसके पति से झगड़े, और महामारी के दौरान उसकी बेटियों की रुकी हुई पढ़ाई को लेकर उसकी चिंता।
मुझे याद है जब उसने एक चिपचिपा हिस्सा खींचा, दर्द से मेरी आंखें सिकुड़ गईं। मैंने छिपाने की कोशिश की, लेकिन उसने देख लिया। मुझे याद है उस नरम दिल औरत ने माफी मांगी और ठंढे गीले कपड़े से दबाकर आराम देने की कोशिश की।
अजीब बात यह है कि उस पल मुझे जो नज़दीकी, अपनापन और परवाह मुझे महसूस हुई, वो अक्सर मेरे आशिकों के साथ भी नहीं हुई थी।
शायद वो उस खास दोस्ती और अपनापन का एहसास था—एक साथ दर्द सहने और देखने का अनुभव, जिसने वैक्स करने वाली और वैक्स करवाने वाली को जोड़ दिया था। ये भेदभाव और जीवनशैली के अंतर को मिटाकर, उन औरतों को एक साथ ले आया, जिन्होंने एक जैसी तकलीफ़ अनुभव की। जो औरत मेरे साथ इतनी कोमलता से पेश आ रही थी, वो शायद मेरी जाति की नहीं थी। मुझे ऐसा अंदाजा था, लेकिन मैंने पूछा नहीं। मैं जाति जैसी चीजों को भूलना चाहती हूँ, लेकिन कभी-कभी सोचती हूँ—कहीं इसे भूलना ही असली अंधापन तो नहीं?
सोचने की बात है—अगर ये किसी और समय, किसी और जगह होता, तो शायद उसका मुझे ऐसी प्राइवेट जगहों पर छूना भी अपराध माना जाता।
मार्क्सवाद का होना, एक पूंजीवादी, वर्गवादी, जातिवादी समाज में।
रौद्र: या क्रोध की सूची
मुझे उन लम्हों पर गुस्सा आता है जब लोगों ने कहा कि जो मैंने किया वह असली सेक्स नहीं था (तो फिर, छोकरे, वो क्या था?) और उसका कोई "मतलब" नहीं था।
मुझे उस शारीरिक और मानसिक दर्द पर गुस्सा आता है जिससे मैंने खुद को गुज़ारा।
मुझे उस वक़्त गुस्सा आता है जब किसी ने कहा कि मैं "काफ़ी" नहीं थी, कि मैं एक प्रेमी की उनकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी।
कई बार, थकावट सिर्फ दबा हुआ क्रोध होता है। मैं "अच्छी लड़की" बनने के पाखंड से थक चुकी हूँ। मैं इस बात से थक चुकी हूँ कि एक "अच्छी लड़की" संस्थानों, पितृसत्ता, जातिवाद को बनाए रखने में मदद करती है और अनजाने में, कभी इन संरचनाओं पर सवाल नहीं उठाती, उनकी ज़िम्मेदारी नहीं लेती।
मुझे उन नियमों पर गुस्सा आता है जिनका पालन हमें सदियों से करवाया गया है—नियम जो किताबों में दर्ज हैं, जो बताते हैं कि हमें कहाँ छुआ जा सकता है, कौन हमें छू सकता है, और अगर हम इन सीमाओं से बाहर गए तो हमें कैसी सज़ा मिलेगी। ये नियम सौंदर्य मानकों से अलग नहीं हैं।
संस्कारी नारी गोरी होती है, ऊँची जाति की होती है, वह समाज में जातिवाद के प्रति अंधी बनकर पेश आती है, लेकिन उसके अवचेतन में गहराई से बैठी एक अदृश्य समझ उसे जाति का भेदभाव करने में सक्षम बनाती है। संस्कारी नारी दूसरों के लिए बॉडी पॉज़िटिव होती है, लेकिन खुद के खाने को लेकर सतर्क रहती है, वजन बढ़ने से डरती है, खुद को संवारते-संवारते अपना अस्तित्व मिटा देती है। वह एक पाखंडी है।)
मुझे अपनी शर्म पर गुस्सा आता है।
मुझे गुस्सा आता है कि मैंने अपनी योनि की वैक्सिंग सिर्फ एक निर्दयी, स्वार्थी और असंवेदनशील प्रेमी को खुश करने के लिए की।
संस्कारी नारी मेरे अंदर भी मौजूद है, जो सब कुछ परफेक्ट, साफ-सुथरा, शुद्ध चाहती है, जो अपने ही संस्कृति की प्राचीन असमानताओं पर सवाल उठाने से डरती है। जो अव्यवस्था और जटिलता को स्वीकार नहीं कर सकती, जो इतनी डरी हुई है कि वह अपनी सीमाओं को तोड़ने, हजारों सालों से मौजूद पूर्वाग्रह और विशेषाधिकारों को परखने की हिम्मत नहीं कर सकती।
मुझे इस सोच पर भी गुस्सा आता है कि हमें अपने करियर में और अपने प्रेम जीवन में जुनून को तलाशना चाहिए। हर किसी के लिए यह संभव नहीं होता।
मुझे उन मर्दों पर गुस्सा आता है जिन्होंने कहा कि वे मुझसे प्यार तो करते थे, लेकिन उनमें मेरे लिए जुनून नहीं था। आज मैं उनसे वह कहती हूँ जो उस वक्त कहने की हिम्मत नहीं कर पाई— मेरे लिए जुनून और क्रोध बहुत करीब हैं। जुनून भी एक तरह का क्रोध ही है।
जब मैं किसी और में गुस्सा देखती हूँ, तो मेरी प्रतिक्रिया डर होती है। क्या यह सुरक्षित है? ये प्यार कैसे हो सकता है ?
क्या सुरक्षित आनंद और क्रोध व डर एक साथ मौजूद हो सकते हैं? शायद, इसे संभालने के लिए एक कलाकार चाहिए।
मुझे खुद पर गुस्सा आता है।
शांतम
जैसे-जैसे मैं बड़ी हो रही हूँ, मुझे उस मज़ाकिया, अजीब और अपूर्ण अंतरंगता की यादों में ठहरना अच्छा लगता है। मुझे अब यह समझ में आया है कि जो लोग सेक्स में सबसे ज़्यादा आनंद लेते हैं, वे उसकी बेढंगी, असामान्य, अजीब सुंदरता को अपनाते हैं। वे सेक्स को इंसानी अनुभव मानते हैं, उसे परिपूर्ण बनाने की कोशिश नहीं करते, खुद को गुड़िया या मूर्ति नहीं बनने देते।
सेक्शुअल अनुभव का अर्थ क्या है?
क्या इसका मतलब कई प्रेमी होना है?
या फिर एक आध्यात्मिक, दिव्य ऑर्गैज़्म चरमसुख(जो मैंने खुद को ऑनलाइन खरीदे गए वाइब्रेटर से दिया है, धन्यवाद ऑनलाइन शॉपिंग!)
या फिर यह सब कुछ एक साथ है—
इच्छाओं की मूर्खता, जुनून की अजीबता, उन अप्रत्याशित जगहों पर मिली अंतरंगता और करुणा, जहाँ हमें उम्मीद भी नहीं होती—और फिर उसे महसूस कर, उसे जाने देना?
क्या यही शांति है?
क्या यह "देख लिया, कर लिया" वाला दृष्टिकोण, आत्मबोध से जन्मी शांति है?
या यह परिमेनोपॉज़ के कारण हार्मोनल बदलाव और घटती कामेच्छा है, जिसे मैं मोहभंग के कारण उपजी वैराग्य समझ रही हूँ?
मुझे नहीं पता।
श्रृंगार
"काम भाव हमारे आत्मबोध की शुरुआत और हमारी सबसे तीव्र भावनाओं के बीच एक पुल है।"
—ऑड्री लॉर्डे
मैं यह जानती हूँ:
मेरी सेकशुअलिटी सिर्फ मेरी है।
कई बार, मैं इसे किसी के साथ साझा नहीं करना चाहती। इस पर सिर्फ़ मेरा हक है। कभी यह नीले समंदर के बीच एक चमकदार हरे द्वीप जैसा लगता है। कभी यह रेगिस्तान के बीच एक नखलिस्तान। कभी यह एक चमचमाता, बहुआयामी हीरा जो मेरे लिए है, सिर्फ मेरे लिए।
उस मंद अंधेरे में, अकेले, जब मैंने अपने कमरे के पर्दे गिरा दिए हैं, मेरा यह हीरा एक साँप में बदल जाता है। मुझे उसका रेंगना महसूस होता है, उसकी जकड़न, उसकी गति। यह मेरी रीढ़ में ऊपर उठता है, मेरी आत्मा को छूता है, मेरे अंदर एक कंपन पैदा करता है।
जैसे-जैसे यह बढ़ता है, जैसे-जैसे मैं अपने आप से और करीब, और कोमल, और संवेदनशील महसूस करती हूँ, मुझे लगता है, कि यही तो सौंदर्य है। सौंदर्य कोई दृश्य नहीं, एक अनुभूति है। यह आत्मा का अपनी सही जगह पे बैठने में, अपने भीतर के सबसे गहरे हिस्से को छूने में, उस कोमलता में, उस अनुभूति में सौंदर्य है। इसके लिए कोई दूसरा शब्द नहीं है।
मैं पिघल जाती हूँ।
लड़कियों, औरतों—जो भी यह पढ़ रही हो, अपनी सुंदरता को मत खोना।
यह सच नहीं है कि तुम इसे खुद नहीं महसूस कर सकती।
कभी-कभी, किसी प्रेमी के साथ, शायद एक स्पर्श, एक क्षण, एक त्वचा से त्वचा का संपर्क, तुम यह महसूस करोगी। क्षणभर के लिए।
लेकिन दुनिया तुमसे इसे छीनना चाहेगी। कर्तव्य, परिवार, प्रेम के नाम पर। तुमसे कहा जाएगा कि इसे दूसरों के साथ बाँटो, कि उनकी खुशी को अपनी खुशी से ऊपर रखो, या फिर इसे पूरी तरह छोड़ दो।
मत करना ।
रस
रसों को एक ढांचे की तरह इस्तेमाल करने का मतलब क्या होता है?
यह एक शास्त्रीय सौंदर्य मानक है—जहाँ भावनाओं को अलग-अलग बाँटा जाता है, उन्हें नाम दिया जाता है, वर्गीकृत किया जाता है—एक ऐसा तरीका जो ज़िंदगी की बेतरतीब, उलझी हुई भावनाओं को साफ़-सुथरे खांचे में बाँधने की कोशिश करता है।
यह एक तरह की संवेदनहीन सजावट है—जिसमें बीते हुए और वर्तमान की परतें, पीढ़ियों का मेल, अतीत का वर्तमान में पलना, सब एक तर्कपूर्ण शैली में बाँधा जाता है।
मैं "शास्त्रीय" शब्द से सतर्क रहती हूँ।
मुझे उन शास्त्रीय कथानकों और साहित्यिक विचारों से परहेज़ है, जो सब कुछ साफ़-सुथरा, संयमित और श्रेणियों में बाँटना चाहते हैं, और इस प्रक्रिया में उन धुंधली सीमाओं को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जो न तो ये हैं, न वो। मैं उन श्रेणियों से डरती हूँ जो आगे चलकर नियमों में बदल जाती हैं। मैं नियमों से डरती हूँ, खासकर हमारे सांस्कृतिक और सभ्यतागत संदर्भ में, जहाँ नियमों का मकसद अक्सर अलग करना होता है, मिलाने की अनुमति नहीं देना होता। आखिरकार, यही कठोर श्रेणियाँ ही तो ऊँच-नीच बनाती हैं।
क्या वीर रस बिभत्स रस से श्रेष्ठ है? क्या करुणा अद्भुत से ऊँची है? क्या भावनाओं की भी कोई जाति व्यवस्था होती है?
मैं डरती हूँ—उन चीज़ों से जो छूट जाती हैं, जो साथ हो सकती हैं, लेकिन होने नहीं दी जातीं।
जबकि असल ज़िंदगी में, हर अनुभव, हर एहसास घुल-मिलकर, एक गाढ़े, चिपचिपे, जटिल रस में बदल जाता है— भले ही दिखने में असुविधाजनक हो, लेकिन स्वाद में बेहद रसीला, बेहद असली।
यही तो सच है, है ना?
संस्कारी नारी, जिसे बिल्लियाँ प्रिय हैं, असल ज़िंदगी में लेखिका है । ये बच्चों के लिए लिखी गई और नए सिरे से सुनाई गई मिथक कहानियों के लिए मशहूर है । वो आशा करती है कि अगर आपको ये लेख पसंद आया, तो शायद वयस्क जनों के लिए उसकी लिखी ये दो किताबें भीं रोचक लगेंगी - The Prince और The Missing Queen। ये बंगलोर में अपनी दो बिल्लियों के साथ रहती हैं ।