लोग सरोगेसी विधेयक/Surrogacy Bill का विरोध क्यों कर रहे हैं ?

(सरोगेसी- जब एक औरत, अक्सर कानूनी रज़ामंदी से, किसी  के लिए, उनके, अपने या किसी और के भ्रूण को अपनी कोख में जगह देती है, और बच्चे को जन्म भी देती है) 

क्या आप सोच रहे हैं कि लोग सरोगेसी (स्थानापन्न मातृत्व) अधिनियम के विधेयक का विरोध क्यों कर रहे हैं, जो फ़िलहाल राज्य सभा के आगे रखा गया है ? तो लीजिए, यहाँ प्रस्तुत है एक गाइड, जो इसे समझने

में आपकी मदद करेगा।   

पहले, एक छोटा-सा परिचय, इस बिल के हालात से आपको अवगत कराते हैं। 

सरोगेसी यानि स्थानापन्न मातृत्व क्या है ?

सरोगेसी एक क़रार-नामा यानि एग्रीमेंट होता है जिसमें एक व्यक्ति (जो  सरोगेट या सरोगेट मदर या किराए की कोख देने वाली माँ कहलाती है), वो किसी जोड़ी या किसी अकेले के लिए संतान को जन्म देती है और जन्म के बाद उसे उनके हवाले कर देती है। बच्चा भ्रूण (यानि embryo) बनाने से निर्मित हो सकता है – जो अंड (Eggs) और शुक्राणु (sperms) से बनाया जाता है। ये अंड (Eggs) और शुक्राणु (Sperms) किसी के भी हो सकते हैं, भावी माता-पिता के, या कोख देने वाली के, या फिर किसी शुक्राणु (Sperm) या अंड (Eggs) दान करने वाले यानि डोनर के। फिर इस भ्रूण को सरोगेट यानि कोखदाता की बच्चेदानी में स्थापित किया जाता है, जिससे बच्चे का जन्म होता है।

लोग-बाग आम तौर पर सरोगेसी का तब सहारा लेते हैं जब वो जैविक या मेडिकल कारणों की वजह से ख़ुद से बच्चा पैदा नहीं कर पाते। कई लोकप्रिय जोड़ियाँ जैसे आमिर खान – किरण राव, शाहरुख़ खान – गौरी खान और प्रसिद्द सिंगल व्यक्ति जैसे करन जोहर ने सरोगेसी के ज़रिये ही माँ या बाप होने का सुख प्राप्त किया है।   

“परोपकारी सरोगेसी” और “व्यवसायिक सरोगेसी” क्या होती है ?

जब कोई दोस्त, कोई रिश्तेदार या कोई इंसान किसी दूसरे व्यक्ति या किसी जोड़ी को एक संतान पाने में मदद करने के लिए, बिना कोई रक़म लिए सरोगेट बनने को तैयार हो जाता है, तो उसे परोपकारी सरोगेसी का नाम दिया जाता है। वहीँ जब किसी को, मेडिकल ख़र्चों के अलावा, सरोगेसी के काम के पैसे दिए जाते हैं, तो उसे व्यावसायिक  सरोगेसी माना जाता है।

ये विधेयक एक क़िस्म की सरोगेसी , यानि व्यावसायिक सरोगेसी पर प्रतिबन्ध लगाना चाहता है  

इस वक़्त, भारत एक ऐसे विधेयक पर विचार कर रहा है, जो किराए की कोख (कमर्शियल सरोगेसी) को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर देगा।  साथ-साथ परोपकारी सरोगेसी का हक़ केवल उनको होगा जो सिर्फ़ शादी-शुदा जोड़ों के लिए परोपकारी कोख-दान (Altruistic सरोगेसी) को स्वीकृति देगा। वो भी तब, जबकि सरोगेट कोई ऐसी महिला हो जो कि उस जोड़े की “नज़दीक़ी रिश्तेदार” हो। हालाँकि दिसंबर 2018 में लोक सभा में इस विधेयक में कुछ फेर-बदल किये गए हैं,  फिर भी

कई लोग राज्य सभा से इस विधेयक को स्वीकृत नहीं करने को कह रहे हैं।     

ये विधेयक कहता है कि  व्यावसायिक सरोगेसी = बुरा और परोपकारी सरोगेसी = अच्छा 

भारत में गंभीर आर्थिक विषमताएँ हैं और ये कहा जा रहा है कि

सरोगेसी में ग़रीब महिलाओं के गर्भ के शोषण का ख़तरा है और पैसा कमाने के लिए उनकी सेहत को इस तरह खतरे में नहीं डाला जा सकता है। जैसा भी हो, सरोगेटों हक़ के लिए काम करने के बजाय और उस अभ्यास को नियमित करने की बजाय, विधेयक की कोशिश उसे पूरी तरह से प्रतिबंधित कर देने की है । इस सोच के साथ कि बतौर एक सरोगेट, महिलाओं का शोषण नहीं किया जा सकता। एक ओर जबकि कुछ एक्टिविस्ट्स ने इस प्रतिबन्ध को सराहा है, वहीँ दूसरी ओर कुछ का कहना है कि ऐसा करने से व्यवसायिक सरोगेसी समाप्त नहीं हो जाएगी बल्कि कानून के छिप कर जारी रहेगी।      

ये बिल, परोपकारी सरोगेसी को ही लाजमी मानता है, ये मानता है कि अगर सरोगेट नज़दीक़ी रिश्तेदार है, तो इसमें कोई भी शोषण शामिल नहीं है।ये सोच प्रजनन के श्रम और पीड़ा( Reproductive labour) की सच्चाई से मुँह मोड़ती है। साथ ही साथ इस वास्तविकता को भी नकारती है कि बहुत सी महिलाएं अपने परिवारों द्वारा कई तरीकों से कण्ट्रोल की जाती हैं l ये सोच इस बात को भी  ध्यान में नहीं लेती

कि औरतों को उनके रिश्तेदारों के दबाव की वजह से सरोगेट बनने पर राज़ी किया जा सकता है ।  

महिलाओं के प्रजननीय अधिकारों की रक्षा करने के बजाए और औरतों को सरोगेट होना है कि नहीं, ये उनकी पसंद पर छोड़ देने की जगह, ये विधेयक इस बात को विशेष तौर पर कहता है कि सिर्फ़ एक ख़ास क़िस्म की महिला – मतलब एक ‘सही’ तरह की महिला: जो शादी-शुदा और एक बच्चे के साथ हो, और जो निस्वार्थ ये काम करे – वो ही एक सरोगेट हो सकती है।       

इसपर शादी का भूत सवार है

ख़ास तौर पर, विपरीतलिंगी (Heterosexual) विवाह। ये विधेयक कहता है कि आप सरोगेसी के ज़रिए बच्चा तभी पा सकते हैं, जबकि आप 5 वर्षों तक एक विवाहित जोड़े की तरह रह चुके हों। वो जोड़ा, (इसका कहना है), एक मर्द और एक औरत का होना चाहिए। इसका ये भी कहना है कि आप तभी एक सरोगेट बन सकती हैं, यदि आपकी शादी हो चुकी हो।

यानी इस बिल का आशय कहीं न कहीं ये है कि  सेक्स केवल शादी और प्रजनन से जुड़ा है।

ये सिंगल लोगों और सेक्स को लेकर भिन्न रुझानों वाले अविवाहित जोड़ों के अधिकारों को नज़रअंदाज़ करता है और उनके माँ बाप बनने की इच्छा को भी l सरोगेसी के ज़रिए  अभिभावक बनने की उनकी कोशिशों पर पाबन्दी लगाकर। और जिसके भी पास कोख है , ये ऐसे हर इंसान को सरोगेट बनने की संभावना और चॉइस नहीं देता l इस बिल के मुताबिक़ मौक़ा उन्हीं को मिलेगा जो इस बिल की सीमित परिभाषाओं के अनुसार शादी, नातेदारी और मातृत्व के दायरों में फिट बैठें।

अब अगर हम इसकी तुलना भारत में एडॉप्शन- गोद लेने – से करें तो हम पाते हैं कि हालांकि तरीक़ा सख़्त है, पर ये अविवाहित लोगों, लिव-इन में रहने वाले जोड़ों और ऐसे जोड़ों के लिए, जो 2 वर्षों से विवाहित हों, उन सबके लिए मान्य है। योग्यता के ये अलग-अलग नियम क्यों ? जबकि गोद लेना और सरोगेसी परिवार को बढ़ाने के ही तरीक़े हैं ? 

इस बिल में बहुत-बहुत सारी अनुचित शर्तें हैं  :

ये रहीं, सरोगेसी के ज़रिए माता-पिता बनने की शर्तें 

–       आपको भारत का नागरिक होना चाहिए। विदेशी नागरिक और एन.आर.आई. इसके लिए योग्य नहीं हो सकते   

–       आपको कम-से-कम 5 वर्षों तक एक विपरीतलिंगी विवाह जोड़े के रूप में रहना चाहिए  

–       आप संतान विहीन होने चाहियें, या फिर आपको कोई ऐसी संतान होनी चाहिए, जो मानसिक या शारीरिक या किसी जानलेवा बीमारी से ग्रसित हो।  

–      आप या आपकी पत्नी को बाँझ होना चाहिए। यदि आप एक औरत हैं जो अपने पति के साथ गर्भधारण में सक्षम हैं परन्तु उस बच्चे को नौ महीने की गर्भावस्था तक संभल नहीं पाती हैं (साथ ही आपको कई एक गर्भपात हो चुके हों), तो आप अयोग्य हैं। ये बिलकुल वैसा है जैसे कि पूरी अवधि तक पेट में बच्चे को नहीं संभाल पाने में उस व्यक्ति का दोष हो। 

–       अगर आप पत्नी हैं तो आपको 23 से 50 वर्षों के बीच का होना चाहिए। 

–      यदि आप पति हैं तो आपको 26 से 50 वर्षों के बीच का होना चाहिए। 

–      इसके अलावा, आपको वो सारी शर्तें पूरी करनी होंगी जो प्रस्तावित राष्ट्रीय सरोगेसी बोर्ड (National Surrogacy Board) तय करके निर्णय लेगा। जैसा कि अभी तक बोर्ड शुरू नहीं हुआ है, तो ये शर्तें भी अभी निर्देशित नहीं हैं। 

–    आपको “उचित अधिकारियों” (जो कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा नियत किये जायेंगे)” से अनिवार्यता के प्रमाणपत्र (“Certificate Of Essentiality”)” और योग्यता के प्रमाणपत्र (“Certificate Of Eligibility”) की ज़रुरत होगी। अगर आपको ये पत्र न मिले तो

 फ़िलहाल अपील करने का कोई तरीका ईजाद नहीं किया गया है । 

सरोगेट मदर बनने की निम्नलिखित शर्तें हैं : 

–       आपका एक ऐसी औरत होना आवश्यक है, जो सरोगेसी का विकल्प चुनने वाली जोड़ी की नज़दीक़ी रिश्तेदार हो। 

–       आपकी उम्र 25 से 35 वर्ष के बीच होनी चाहिए। 

–       ये ज़रूरी  है कि आप विवाहित हो या फिर कभी अतीत में आपकी शादी हुई हो l 

–       आपकी अपनी ख़ुद की एक संतान होनी चाहिए 

–      आपकी ये पहली सरोगेसी होनी चाहिए ( औरत सिर्फ़ बार सरोगेट हो सकती है) 

–       आपके पास एक ऐसा सर्टिफिकेट होना चाहिए जो ये दर्शाता हो कि आप शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ हैं  

क्या हो अगर आप अपने रिश्तेदार की मदद के लिए एक सरोगेट की भूमिका निभाना चाहें, परन्तु आप विवाहित न हों? या आप विवाहित हों पर बच्चा नहीं चाहती हों, या शायद अभी नहीं  चाहती हों? ये विधेयक किसी सरोगेट के प्रजनन अधिकारों को नियंत्रित करने में खामख्वाह दिलचस्पी लेता है। इसको विवाह और नैतिकता के ढाँचे में ढालकर।

ये महिलाओं के स्वास्थ्य को मुख्य स्थान नहीं देता है

इस विधेयक का नियम है कि भ्रूणों को जमा करके रखा नहीं जा सकता। ये एक समस्या हो सकती है क्योंकि एक औरत (जो कि उस जोड़ी का एक हिस्सा है, जिसने सरोगेसी का विकल्प चुना हो) से अंडाणु (Eggs) को निकालने के क्रम में, बहुत ही बड़ी हॉर्मोन चिकित्सा की ज़रुरत पड़ती है। अगर ढेर सारे भ्रूण एक ही बार में बनाकर जमा नहीं किये जा सके, तो शायद एक महिला को बार-बार हॉर्मोन के इलाज से गुज़ारना होगा, जिससे शरीर पस्त  हो जाएगा और जिससे स्वास्थ्य के गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं।

ये गर्भपात की की संभावना या चॉइस को जगह ही नहीं देता

सरोगेसी का विकल्प चुनने वाली जोड़ी गर्भ के बच्चे को गिरवाने को नहीं कह सकती। अगर पेट के अंदर बच्चे का असामान्य विकास हो रहा हो, तब केवल सरोगेट महिला और अधिकारीगण ये तय करेंगे कि गर्भावस्था को भंग करना है या नहीं। जबकि बच्चे को पालने पोसने की की ज़िम्मेदारी उस जोड़ी को लेनी होगी।  

शुरुआती आलोचनाओं के बाद के संशोधन

दिसम्बर में संशोधन के ज़रिये कुछ अनुचित नियमों को को सुधारा गया और फिर इन संशोधनों का प्रसार हुआ। इन संशोधनों में शामिल थे: 

व्यावसायिक सरोगेसी की सज़ा को 10 साल से घटाकर ५ साल करना; लिंग (सेक्स) के चुनाव पर प्रतिबन्ध लगाना;  सरोगेट को भ्रूण के उसकी कोख में दाखिल होने के पहले नकारने का विकल्प देना, और अधिकारियों को ९० दिनोंकी समय सीमा देना जिसके अंदर ही उन्हें योग्यता का प्रमाण पत्र के प्रमाण पात्र को जारी करने की कार्यवाही ख़त्म करनी होगी, इत्यादि।    

कुछ लोग ट्राँस अधिकारों के विधेयक (Trans Rights Bill), सेक्स दुर्व्यापार (Trafficking) विधेयक और सरोगेसी के विधेयक का एक साथ क्यों विरोध कर रहे हैं ?

(Photo courtesy Shals Mahajan)

इन सब में से हर एक विधेयक एक अलग विषय के बारे में है। पर ये एक दूसरे से कई मायनों में जुड़े हैं, एक घिसी पीटी नैतिकता को अपना आधार बनाकर, LGBTQ+ के अधिकारों को नकार कर, बेवजह उन सामाजिक विषयों को अपराध का नाम देकर, जिन्हें ज़्यादा बारीक़ी से समझने की ज़रुरत है l हर एक का अपनी बॉडी पर हक़ और उसके साथ कुछ करने की चॉइस को नज़रअंदाज़ करके :  चाहे वो हॉर्मोन चिकित्सा से सम्बंधित हो, चाहे सेक्स के काम की मर्ज़ी हो या फिर सरोगेट बनके बच्चे जानने की मर्ज़ी। ट्राँस अधिकार, महिलाओं के अधिकार, प्रजनन के अधिकार और सेक्स कामगारों के अधिकार, सब एक के ऊपर एक जैसे चढ़े हुए हैं। इसलिए अनुभव कहता है कि इन विधेयकों का एक साथ विरोध करना चाहिए, जो इन अधिकारों को एक साथ रौंद रहे है।

आप क्या कर सकते हैं  

1. ऑनलाइन (Online) अपनी आवाज़ बुलंद कीजिये, विधेयक की   मर्यादाओं की जागरूकता फैलाइए  

2. राज्य सभा के सांसदों को लिखिए और मांग कीजिये कि वो इस विधेयक को रोक दें या इसपर ज़्यादा खोज-बीन करवाके इसे दोबारा निर्धारित करें  

3. अपने इलाक़े में इस विरोध को आयोजित कीजिये या उससे जुड़िये 

अपने आप को ज़्यादा शिक्षित और जागरूक कीजिये 

– सरोगेसी विधेयक और उसके विवादों के बारे में ज़्यादा जानकारी के लिए यहाँ (here) और यहाँ (here) देखिये 

– ट्राँस अधिकारों के विधेयक की ज़्यादा जानकारी के लिए यहाँ (here) देखिये 

– दुर्व्यापार (Trafficking)- विरोधी विधेयक की अधिक जानकारी के लिए यहाँ (here) जाइये 

– भारत में सरोगेसी और वास्तविक जीवन में उसकी क्या भूमिका है, इसपर एक विस्तृत दृष्टिकोण के लिए पढ़िए, गीता अरवमुदन की 2014 में लिखी क़िताब “बेबी मेकर्स : द स्टोरी ऑफ़ इंडियन सरोगेसी”  (“Baby Makers: The Story of Indian Surrogacy”)

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