ट्रांस एक्टिविस्ट स्वीट मारिया के जीवन के कलात्मक स्मारक पर बात-चीत

उस ट्रांस एक्टिविस्ट, जिसका मर्डर कर दिया गया था, की याद में बनाया गया ये अनोखा स्मारक हमें उनके जीवन की याद दिलाता है और साथ में यह भी याद दिलाता है कि भारत में किस तरह ट्रांस लोगों को हिंसा का सामना करना पड़ता है।

कोच्चि मुजिरिस बीएनाले  (Kochi Muziris Biennale) में दिसंबर 2018 को स्वीट मारिया मोन्यूमेंट पर जी ईमान सेम्मलर, राजू रागे और आर्यकृष्णन आर द्वारा किये गए परफॉरमेंस का प्रदर्शन। 
(फोटोनिखिल के सी द्वारा)

जिंदगी और लोगों के बारे में हमारे सोचने के तरीके को कला/आर्ट कैसे प्रभावित करती है? स्वीट मारिया मॉन्यूमेंट जैसा खूबसूरत प्रोजेक्ट हमें इसका जवाब देता है।

जब हम स्ट्रेट/हेटेरोसेक्सयल/ विपरीत लिंग कामी (straight) लोगों के बारे में सोचते हैं, तो हम उनकी भावनाओं, उनकी परेशानियां, उनकीकभी हाँ, कभी ना’, उनकी पसंद के बारे में सोचते हैंजो एक नार्मल जिंदगी का हिस्सा मानी जाती है। और ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे इर्दगिर्द स्ट्रेट और सिस (cis- यानी जो उसी लैंगिक पहचान को अपनाए, जो जन्म के वक्त उसको दी गयी थी) लोगों को लेकर आर्ट और मीडिया में हज़ार बातें होती हैं। यही सब देख सुन कर हम उनके इतने सारे पहलू देख पाते हैं। उनके हिसाब से हम अपनी सोच बना लेते हैं। लेकिन क्या हम क्वीयर लोगों को भी उसी भावना से देखते हैं? क्या हमको उनकी अलगअलग छवियाँ देखने को मिलती हैं? जिनके आधार पर हम क्वीयर पहचान और रुझान के बारे में एक अलग सोच बना पाएं? या  क्या हम अधिकतर क्वीयर लोगों के जीवन के बारे में बस एक ही कहानी दोहराते रहते हैं 

हाँ, आजकल हम सब ट्रांस लोगों को उनके अधिकार पाते देखकर खुश होते हैं। और हमने उनको अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए भी देखा है। तब, जब वो लोकसभा के चुनावों के लिए खड़े हुए। या तब जब भेदभाव से भरा ट्रांस राइट्स बिल खारिज़ हुआ। लेकिन अधिकारों के लिए किये गए इन जुबानी संघर्ष के अलावा भी और कई तरह के संघर्ष हैं। हिंसा की ऐसी कई कहानियां हैं जो रात के अंधेरे में गुम हो गई हैं। जब तक हम अच्छी और बुरी, दोनों कहानियों को एक साथ नहीं सुनेंगे, तब तक सही मायने में हम एक ऐसा नया साम्राज्य नहीं रच पाएंगे जिसमें वो भी शामिल हों। और ना ही हम, हमारे बीच उनकी मौज़ूदगी को सकार रूप से देख पाएंगे।

स्वीट मारिया मोन्यूमेंट ( The Sweet Maria Monument) एक कलात्मक स्मारक है जो ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट स्वीट मारिया की याद में बनाया गया है। 10 मई 2012 को कोल्लम में, स्वीट मारिया के घर पर, उसकी निर्मम हत्या कर दी गई थी। ये स्मारक बड़ी खूबसूरती से उसके जीवन को दर्शाता है। ये बस ट्रांस लोगों के खिलाफ हुई हिंसा के आंकड़े नहीं गिनाता है, बल्कि स्वीट मारिया के व्यक्तित्व को दर्शाता है। ये बताता है कि उसने अपनी ज़िन्दगी को भरपूर जीया, प्यार किया और कभी अपनी इक्छाएं नहीं दबायीं।

स्वीट मारिया मोन्यूमेंट का निर्माण आर्टिस्ट आर्यकृष्णन आर ने किया था। वे स्वीट मारिया के मित्र थे। हमने इस प्रोजेक्ट और इसके महत्त्व के बारे में आर्यकृष्णन से बात की। 

क्या आप हमें स्वीट मारिया, जो इस प्रोजेक्ट की प्रेरणा हैं, के बारे में कुछ बता सकते हैं?

स्वीट मारिया सेक्सुअलिटी और जेंडर अधिकारों की एक्टिविस्ट्स थी। वह क्वीयर प्राइड इवेंट (Queer Pride event) की आयोजक भी थी। वो नास्तिक थी, लवलैंड आर्ट्स सोसाइटी (Loveland Arts Society- कोल्लम में क्वीयर लोगों का एक संगठन) की सदस्य और उनकी रिसोर्स पर्सन थी (resource person) थी। वो पहचान (एच.आई.वी. / एड्स हस्तक्षेप के लिए एक राष्ट्रीय परियोजना) के राज्य समुदाय सलाहकार बोर्ड (state community advisory board) की सदस्य थी और हार्बर इंजीनियरिंग विभाग में लास्ट ग्रेड की सेविका थी। मारिया पब्लिक चर्चाओं में भाग लेती थी और उसने LGBTQI के मुद्दों पर टेलीविजन कार्यक्रमों में कई बार इंटरव्यू भी दिया था।

10 मई 2012 को कोल्लम में उसके घर पर ही उसकी हत्या कर दी गयी।

मैं पहली बार उससे 2010 में IDAM समारोह के दौरान मिला। IDAM सेक्सुअलिटी माइनॉरिटी के अधिकारों से सम्बंधित एक सम्मलेन है और क्वीयर लोगों का एक फिल्म समारोह है l ये समारोह सहयात्रिका नाम की एक संस्था, केरल के थ्रिसुर में आयोजित करती है। मारिया काफी प्रखर और तेजतर्रार थी और LGBTQI अधिकारों को लेकर काफी दृढ़ थी। छोटे शहर से होने के कारण उसको अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे LGBTQI आंदोलन के बारे में ज़्यादा पता नहीं था। लेकिन उसने स्थानीय ट्रांस लोगों की राजनीतिक आवाज़ उठाई। तर्कवितरक में तो वो माहिर थी। उसके बारे में जो सबसे पहली चीज़ जो मैंने नोटिस की, वह थी कि किस तरह साफ़साफ़ शब्दों में उसने यह समझा दिया कि केरल में क्वीयर लोगों को क्याक्या परेशानियां होती हैं। उसने मलयाली लोगों के प्रगतिशील होने के दावों, LGBTQI के मामले में उनकी चुप्पी और उनके दोहरे मानदंडों पर सवाल उठाया। बस फिर हम जल्द ही दोस्त बन गए।

हालांकि उसका असली नाम पुरुषों वाला था, और ज़्यादातर वह पैंटशर्ट ही पहनती थी, लेकिन उसने हमें कहा था कि हम उसको स्वीट मारिया के नाम से ही बुलाएं। वो अक्सर गर्व के साथ महिला सर्वनामों  (pronouns) का प्रयोग करती थी, और खास अवसरों पर औरतों जैसे तैयार भी होती थी। मैं कई बार अपने दोस्तों के साथ उससे मिलने उसके घर भी गया था। वो हार्बर इंजीनियरिंग विभाग के क्वार्टर में रहती थी। उसका कोई पड़ोसी नहीं था। क्वार्टर से सटा एक और रूम तो था, पर उसकी क्वीयर आइडेंटिटी के कारण, कोई भी स्टाफ उसके साथ नहीं रहना चाहता था। कभीकभी तो उसके क्वार्टर की बाहरी दीवारों को तोड़ाफोड़ा भी जाता था। और कभी उसको नीचा दिखाने के लिए उनपर गन्दीगन्दी बातें भी पेंट से लिखी होती थी।

इसके बावज़ूद उसका घर क्वीयर समुदाय के लोगों से भरा रहता था। लोग कभी भी वहां सकते थे, आराम कर सकते थे, उसके साथ खाना खा सकते थे। उसके दोस्त अक्सर वहां मौजूद रहते थे। वो बहुत अच्छा खाना बनाती थी, और अपने समुदाय के लोगों का तो दिल खोल के स्वागत करती थी। कई लोगों के मुश्किल समय में उसने उनकी मदद की।

स्वीट मारिया मोन्यूमेंट बनाने के पीछे मकसद क्या था?

स्वीट मारिया मोन्यूमेंट, स्वीट मारिया के जीवन और उसके किये गए कामों के प्रति एक श्रद्धांजलि है। ये उसके जीवन की छाप है। और ये एक सवाल भी है, उन स्मारकों पर, जो आज के युग में बनाये जा रहे हैं। 

मेरे मन में जो सवाल उठा था वो ये था कि मैं स्वीट मारिया की यादों को, जो लगातार ही बढ़ी चली जा रही थींजिन्हें बांधा या रोका नहीं जा सकता था, उन यादों को एक स्मारक में कैसे बांध पाऊंगा। और यहीं से मुझे एक ऐसा स्मारक बनाने का ख्याल आया। ऐसा स्मारक जो मारिया के सौंदर्य और सोच दोनों को ऐसेऐसे रूप और भाव में दिखाए, जैसे वो कोई जीवंत अनुभव हो, ना कि सिर्फ एक खाली मक़बरा। इस कोशिश में स्मारक के आसपास सुरक्षित माहौल बनाना, रचनात्मक समुदाय और परम्पराओं का निर्माण करना, शामिल था। 

ये प्रोजेक्ट पहली बार दिल्ली के अंबेडकर विश्वविद्यालय में मेरे मास्टर्स इन विजुअल आर्ट्स (Masters in Visual Arts) की पढ़ाई के दौरान दिखाया गया था। उस समय मैंने  पूरे चार लोगों के साथ इसको पूरा किया था ।उनमें से दो ट्रांसजेंडर समुदाय से थे मुंबई के क्लार्क हाउस में, मैंने एक और प्रदर्शनी की थी, जिसमें मैंने स्मारक के संग्रह के पहलू को अक्काची शाश्त्रम के रूप में दिखाया था। (अम्माई शास्त्रम्जिसका शाब्दिक मतलब होता है  ‘चाचीओं का ज्ञान‘ – एक शब्द जो केरल में अक्सर अंधविश्वासों के लिए प्रयोग किया जाता है।अक्काची शाश्त्रम‘  शब्द की रचना मैंने ही की थीजिसका मतलब है क्वीयर लोगों का ज्ञान। ये नाम उनकी भावनाओं और उत्तेजनाओं को एक शब्द में केंद्रित करने का प्रयास था।अक्काचीजिसका शाब्दिक मतलब है, बहन, उसे केरल के कुछ हिस्सों में ट्रांस महिलाओं के लिए भी उपयोग किया जाता है।) मैंने विश्वविद्यालयों, कई कला स्थानों और LGBTQI  समुदाय के कार्यक्रमों में भी इसका प्रदर्शन किया और इस कार्य को अभिनय के रूप में भी दिखाया।

मेरे प्रोजेक्ट की अंतिम प्रदर्शनी कोच्चिबीएनाले  में थी। वहां मैंने तीन महीनों तक चले प्रोग्राम में स्मारक के ऊपर टॉकशो और पर्फॉर्मन्सेस की एक श्रृंखला तैयार की थी। मैंने उस प्रदर्शनी को LGBTQI के लोग जिस माहौल में रहते हैं, उसी तरह डिज़ाइन किया था। उस जगह मैंने किताबें, कुछ और ज़रुरी सामान, एक बिस्तर, ड्रेसिंग टेबल, चाय के लिए एक मेज़ और मेरी कुछ पेंटिंग्स डालीं थीं। दर्शकों को वहां बैठने, कुछ समय बिताने, चाय बनाने, मेकअप करने और कमरे में रखी किताबों, पैम्फलेट और पेंटिंग को देखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।

मैं चाहता था कि जो लोग वहां रहे हैं, आपस में वो बातें करें जो उनके लिए वाकई में मतलब रखती हैं, और थोड़ा लम्बा समय बिताएं। ना कि उस प्रदर्शनी को बस देख कर वहां से चले जाएँ–  जैसा कि किसी भी प्रदर्शनी में अक्सर लोग करते हैं।

मार्च 2019, कोच्चि मुजिरिसबीएनाले  में, अलीना आकाशा मित्तई और कुणाल दुग्गल “दिसिडेंटिफिकेशन्स( disidentifications: जाति और क्वीयरता पर एक बातचीत’ नाम के इवेंट में चर्चा करते हुए। (फोटो: स्वीट मारिया मोन्यूमेंट)

प्रदर्शनी वाली जगह पर जो बिस्तर लगा हुआ था, उसकी क्या भूमिका थी?

प्रदर्शनी वाली जगह पर जो बिस्तर था, वो स्वीट मारिया के घर के बिस्तर जैसा बनाया गया था। मारिया अकेली रहती थी और उसके घर के दरवाजे दोस्तों और अजनबियों के लिए हमेशा खुले होते थे। वो जगह, जहाँ वो रहती थी, उसे परफॉरमेंस की जगह मान लो। और उसके बेडरूम को उसके अपने लवर्स से मिलने या जानकार और एक्टिविस्ट्स लोगों के साथ विचारविमर्श करने की जगह। लेकिन इस तरह रहना उसके लिए असुरक्षित था। और वही हुआ, जिसका डर था। उसके घर में  ही उसकी हत्या कर दी गई। 

जब पहली बार स्मारक को दिखाया गया था, तो वहां रखे एक गद्दे पर कई तरह की चीज़ें और तस्वीरें रखी गई थीं। उन्हें एक बड़े लाल स्कर्ट से ढक दिया गया था। मैं दर्शकों को अंदर आने और अपने साथ बिस्तर पर बैठने के लिए कहता था। फिर उस स्मारक और स्वीट मारिया के बारे में बात करता था। लेकिन फिर ये बातें दूसरी चीजों की ओर भी मुड़ जाती थी, जैसे कि प्रेमसम्बन्ध, दृष्टिकोण, खाना पकाना, स्पेस और मौत।

बीएनाले ( biennale) में बिस्तर को बेडरूम में रखा गया था, जहाँ आराम भी किया जा सकता था। आये हुए लोग अपना सामान/बैग बिस्तर के नीचे खांचे में रख सकते थे। कुछ लोग इस पर सो जाते थे, कुछ बस बैठे रहते थे और कुछ तस्वीरें लेते थे। कुछ इस पर बैठ कर किताबें पढ़ते थे तो कुछ बातचीत किया करते थे। इनमें से कुछ बातचीत पहले से तय होती थी और और उनका प्रचार भी किया जाता था।

उस बड़ी सी, लहराती लाल स्कर्ट का क्या मतलब है?

एक दिन स्वीट मारिया मेरे सपने में आई और उसने मुझसे पूछा, “तुम क्या कर रहे हो?”  थोड़ा हैरान होते हुए मैंने कहा, “क्या?” उसने फिर से पूछा, “हम जो साथ कर रहे थे उसके बारे में तुम क्या कर रहे हो?” मैंने जवाब दिया, “कुछ ख़ास नहीं।उसने फिर कहा, “यह सही नहीं है, तुम इस तरह आराम से नहीं बैठ सकते हो।और उसने मुझे एक बात बताई, जो लगा जैसे कि सपने में मैं एक और सपना देख रहा हूँ। उसने कहा–  “एक बिस्तर लगाओ जो 5000 लोगों के लिए पूरा हो। ठीक वैसे जैसे मेरे स्कर्ट के नीचे मैं कर पाती हूँ। 

मेरे सपने में उसकी पेटिकोट/अंडरस्कर्ट लहरा रही थी। वो कहाँ शुरू हो रही थी और कहाँ ख़त्म, कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। वो बिलकुल अपारदर्शी थी। वहां काफी सारे लोग थे, लेकिन मुझे ठीक से याद नहीं कि कौनकौन थे। मुझे यह भी याद नहीं कि वो लोग स्कर्ट के अंदर थे या बाहर। मैं सालों तक सोचता रहा कि इस सपने का क्या मतलब था, लेकिन मैं आज भी उसे पूरी तरह समझ नहीं पाया हूँ।

मेरे काम में भी उस अंडरस्कर्ट को जगह मिल गयी। अंबेडकर विश्वविद्यालय में यह पेटिकोट 16 फीट लंबा था, और नीचे से 10 फीट x 10 फीट फैला हुआ था। यह गद्दे के ठीक ऊपर छत से लटका हुआ था। हालांकि प्रदर्शनी और विश्वविद्यालय एक सार्वजनिक जगह थी, लेकिन इस स्कर्ट के नीचे छात्रों को इंटिमेसी (intimacy- अंतरंगता) और प्राइवेसी का समय मिलता था, थोड़ी देर के लिए ही सही।

कोच्चि में, स्कर्ट को लटकाया नहीं गया था, बल्कि इसे परफॉरमेंस ड्रेस के रूप में इस्तेमाल किया गया था। धीरेधीरे स्कर्ट का इस्तेमाल अलगअलग जगह पे अलगअलग तरीके से किया जाने लगा। एक परफॉरमेंस में, यह ऐस्पिनवाल हाउस (Aspinwall House) के इर्दगिर्द एक लाल आकृति के रूप में घुमाई गई। उसके घूमने के साथ एक मरे आदमी की चीख भी आती थी। घूमतेघूमते वो ओछा (Ocha/Voices) के पास पहुंच जाती है। वी. वीनू की कलाकृतियां सेरबेरा ओडोलम ( Cerbera odollam) पेड़ की लकड़ी से बनाई गई हैं। इस पेड़ को, जिसे आत्महत्या का पेड़ (suicide tree) भी कहते हैं, उन लोगों को आवाज़ देती है, जिनके साथ केरल में काफी अत्याचार हो रहा था। जिनको उनके अधिकारों से दूर रखा जा रहा थाजैसे कि प्रवासी मजदूर, क्वीयर समुदाय, साथ ही एक ऐसा दलित युवक जिसपरब्लैक मैन‘ (एक ऐसे आदमी के बारे में वायरल हो रही अफवाह कि वह आदमी रात में महिलाओं और बच्चों पर हमला करता है) होने का संदेह था। स्कर्ट और परफॉरमेंस के सहारे, स्वीट मारिया स्मारक ओछा (OCHA) में बसी आत्माओं के साथ बातचीत कर सकता था।

स्वीट मारिया स्मारक में आये लोग। (फोटो: कोच्चि मुजिरिस बीएनाले  द्वारा)

लोग लाइब्रेरी में क्या करते हैं। उसमें किस तरह की किताबें होती हैं?

लाइब्रेरी में समाजशास्त्र, क्वीयर थ्योरी, पैम्फलेट, कॉमिक्स, फिलोसोफी, फिक्शन (fiction), जीवनी, आत्मकथा, यात्रा से सम्बंधित, कविता, कैटलॉग, आदि जैसी अलगअलग करीब 150 किताबें थीं। इसमें LGBTQI से सम्बंधित पत्रिका के साथसाथ LGBTQI के खिलाफ लिखने वालों की भी किताबें थी। इसमें मलयालम पुस्तकों का एक सेक्शन था, कुछ किताबें हिंदी में थीं, और बाकी अंग्रेजी में।

हालाँकि ज़्यादातर किताबें LGBTQI विषयों पर थीं, लेकिन वहां अम्बेडकर और दलित फेमिनिस्ट्स आदि द्वारा लिखी गयी कुछ और किताबें भी थीं। वैसे तो यह सारी किताबें मेरे निजी कलेक्शन की थीं और कई साल लगे थे इन्हें इकठ्ठा करने में , लेकिन स्मारक पर स्मारक के हिसाब से इनको चुना भी गया था।

लोग वहां किताबों के साथ समय बिता सकते थे। कई लोग वहां बैठकर पढ़ने आते थे, और कभीकभी उन किताबें पर चर्चाएं भी किया करते थे।

आप किन वजहों से मानते हैं कि ये स्मारक भारत में ट्रांस लोगों पर होते रहे हिंसा के खिलाफ़ आवाज़ उठाता है?

ये स्मारक LGBTQI के संघर्षों और न्याय के आंदोलनों की जगह नहीं ले सकता है। लेकिन यह एक मोनेरे (monere- एक तरह की चेतावनी) है, एक संकेत है, आभास है और शायद एक ऐसा माहौल है जहां आप थोड़ा थम सकें, उस पल में जी सकें। जो आपको धीरेधीरे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करे।

हर बार इस स्मारक के इर्दगिर्द होने वाली चर्चाओं और दूसरे इवेंट्स भी इसमें भूमिका निभाते हैं। केरल के एक इंटरसेक्स एक्टिविस्ट चिनजू असवथी को एक चर्चा  में स्पीकर के रूप में आमंत्रित किया गया था। टॉपिक थाडिसऑयडेन्टिफिकेशन्सकॉन्वेरसशन्स ऑन एवरीडे कास्ट एंड क्वीयरनेस (Disidentifications: Conversations on Everyday Caste and Queerness यानी पहचान ले लेना : रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जाती  और क्वीयरनेस) चिनजू उस डिस्कशन में नहीं पाए क्यूंकि एक सार्वजनिक शौचालय में जाते समय उन पर हमला हुआ था और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। यह LGBTQI समुदायों पर हर रोज़ हो रहे हिंसा का एक उदाहरण हैमारिया की कहानी ऐसी अकेली कहानी नहीं है। 

चूंकि यह स्मारक एक परमानेंट ढांचा नहीं है, इसलिए इसमें बदलाव किया जा सकता है। इससे नई कहानियाँ, एकजुटता और भावनाओं के नए उफान का इज़हार हो सकता है ।

आपके लिएक्वीयरशब्द का मतलब क्या है? और वो क्या चीज़ है जो स्वीट मारिया मोन्यूमेंट को भी क्वीयर बनाती है?

मेरे लिए, क्वीयर एक प्रकार का आंदोलन है, जो चलते ही जा रहा है, और जिसकी कोई स्पष्ट मंज़िल नहीं है। यह ऐसी चीज है जिसके लिए हम बस कोशिश करते चले जाते हैं, लेकिन वहां कभी पहुँच नहीं पाते। और यही इसको सेक्सुअल पहचान/आइडेंटिटी से अलग करती है। पहचान हमें श्रेणियों में बांट देती है। जबकि क्वीयर होना हमें छूट देता है, जैसा चाहो वैसा बनने की छूट, किसी भी पहचान से मुक्त होने की छूट, कोई भी बात ना मानने की छूट।

वैसे मैं सेक्सुअलिटी के अल्पसंख्यक समुदायों को नज़रअंदाज़ तो नहीं ही कर सकता हूँ।क्वीयर‘ LGBTQI के पहचान और परंपरा से एक जुड़ा शब्द है, जो एक्टिविस्ट्स और मीडिया के कारण लोकप्रिय हो गया है। लेकिन साथ ही यह उन लोगों पर भी लागू होता है जो विषमलैंगिकता (heteronormativity) पर सवाल उठाते हैं। यह इतना विस्तृत है कि कभीकभी तो इसका इस्तेमाल पहचान और परम्पराओं में अंतर को दबाने के लिए भी किया जा सकता है। 

क्या हम क्वीयर शब्द के प्रयोग से बचने की कोशिश सिर्फ इसलिए करते हैं क्यूंकि इसे संस्थापित (institutionalised) कर दिया गया है? या हम ये चाहते हैं कि आज हम इसके नए मतलब निकालें? मुझे लगता है, हमें ज़रुरत हैक्वीयरशब्द के नए मतलब तलाशने की, नए समुदाय बनाने की। ये ऐसा शब्द है जो असमानताओं के आधार पर लोगों को जोड़ सकता है, न कि समानताओं के आधार पर

मुझे यह भी लगता है किक्वीयरएक परमानेंट पहचान नहीं हो सकता है। ना ही ये किसी व्यक्ति कीपैदाइशीविशेषता पर निर्भर हो सकता है। एक व्यक्ति को क्वीयर की श्रेणी में गिना जाए, इसके लिए उसे अपने जीने के तरीकों को क्वीयर बनाना पड़ेगा।

आप क्या चाहते हैंजब लोग स्वीट मारिया मोन्यूमेंट को देखने जाएँ, तो उन्हें कैसा महसूस हो?

मैं तो यही चाहूँगा कि ये स्मारक लोगों के दिल को छू जाए। वो उस कला की ओर खींचे चले आएं, ना कि उसे खुद से अलग पायें। मैं चाहता हूँ कि ये स्मारक लोगों के आपस में बात करने का एक जरिया बने, और दुनिया को लेकर हमारी सोच में बदलाव लाने का ज़रिया बने। जरूरी नहीं कि हर किसी को इसके साथ अपनी पहचान को जोड़ना पड़े, लेकिन ये चीजों को देखने और पहचानने के नार्मल तरीकों पे सवाल उठा सके।

मुझे उम्मीद है कि इससे एक अलग तरह का समुदाय बनाने में मदद होगी। रोज़मर्रा के सुंदर एहसास और उसकी एहमियत समझने में भी आसानी होगी।

इस स्मारक की अगली प्रदर्शनी कहाँ होगी?

मैं इस साल 1 अगस्त से 4 अगस्त तक बैंगलोर में होने वाले क्वीयर फिल्म फेस्टिवल में इस स्मारक के कुछ हिस्सों का प्रदर्शन करूंगा।

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