ये कसी हुई योनि (वजाइना/ vagina ) आखिर किस को सुख देती है?

डाॅ. अनामिका प्रधान

एक डॉक्टर का सवाल: क्या हम औरतों के शरीर को मर्दों के सुख के लिए बदलने वाली विपरीतलिंग कामी/ हेटरो सेक्शुअल चर्चाओं से आगे बढ़ सकते हैं?

कल परसों की बात है, मेरे फोन पर एक दोस्त का टेक्स्ट मेसेज आया जिसे पढ़ के मैं थोड़ा सकते में आ गई। 

मेसेज में एक लिंक था, जहां कोई डॉक्टर अपने हसीन सर्विस पैकेज यानी सेवाओं को ऐडवर्टाइज कर रहा था। मिसाल के तौर पर – “16 साल की लड़की जैसी योनि बनाना यानी रि-वर्जिनेशन” (65000 रुपए), “वेजाइना को और सुंदर बनाने ये लिए हुडेक्टमी (जिसमें लेबिया पर सर्जरी की जाती है)” (20000 रुपए)। और तो और एक पैकेज था “सुपर हाइमनोप्लास्टी के साथ सुपर फीमेल (115000 रुपए)”। ऐसे ही बेतुके पैकेज के साथ पूरा ऐड भरा हुआ था, जिस में हर सर्विस के दाम रुपए में भी लिखे थे और डॉलर में भी! इस सब के अलावा, ये दयालु डॉक्टर भारी डिस्काउंट भी दे रहा था। 

अब जिस दोस्त ने मुझे इस डॉक्टर का लिंक दिया, वो खुद एक फिल्मकार हैं और औरतों से जुड़े कई मुद्दों जैसे के ख़तना यानी फीमेल जेनाइटल म्यूटिलेशन पर काम कर चुके हैं। आप की जानकारी के लिए बता दें कि आज भी हिंदुस्तान में धर्म और संस्कृति के नाम पर औरतों का ख़तना जारी है। और असलियत में ये रिवाज़ सिर्फ औरतों की कामुकता/ सेक्शुअलिटी को काबू में लाने की एक कोशिश है। और अब और बात करते हैं मेडिकल कम्युनिटी के इस सदस्य की जो औरतों के जननांगों पर फालतू के ऑपेरशन थोप रहे हैं। ना सिर्फ थोप रहे हैं, बल्कि उसके एडवर्टाइजमेंट भी छाप रहे हैं। सिर्फ इस झूठ की आड़ में कि ऐसी सर्जरी कराने से सुख बढ़ेगा। पर सोचने वाली बात ये है कि आखिर इससे किसका सुख बढ़ेगा? किसका सुख?   चलो आपको इस सवाल का जवाब खुद ढूंढने देते हैं , एक सुराग के साथ- ये डॉक्टर साहब एक ट्रेनिंग प्रोग्राम भी चलाते हैं। और इनका लिखा एक आर्टिकल एक जर्नल में भी छपा है, जो कि कुछ इस तरह से शुरू होता है: “शादी से पहले अगर हाइमन फट गयी हो, तो उसे दुबारा जोड़ने के लिए हाइमनोप्लास्टी ज़रूरी है। आज कल कुछ औरतें अपनी शादी की सिल्वर जुबली फिर से वर्जिन की तरह मनाने के लिए भी हाइमनोप्लास्टी करवाती हैं।” 

अब आप को लग सकता है के ऐसा तो कभी कभार ही होता है, इससे पूरी बात कहां पता चलती है। पर सच्चाई ये है कि ये सिर्फ इस एक डॉक्टर की कहानी नहीं है। आज के समय पर मेडिकल – कॉरपोरेट – फार्मा कंपनियों का एक जाल बिछा हुआ है। ये सब के सब लोगों में  आत्मविश्वास की कमी का फायदा उठाने के लिए हाथ धो कर पीछे पड़े हैं। इस में एक बहुत बड़ा फंडा है औरतों के शरीर को कैसे उस उचित रूप में ढाला जाए जो पितृसत्तावादी या पेट्रीआरकल ( patriarchal) समाज को पसंद आए। सबसे पहले बोला जाता है गोरे होने को। फिर कहा जाता है, त्वचा एकदम साफ सुथरी, मुलायम हो, और बाल तो सर के अलावा कहीं दिखने भी नहीं चाहिए। ये सब हो गया तो हमेशा फूलों की तरह महकते भी रहो, चर्बी हटा कर एक दम पतली बन जाओ और हमेशा इतना टिप टॉप रहो कि आदमियों को तुम्हें देखने में मज़ा आए। लेकिन औरतों पर हो रहा ये अत्याचार  – क्या करना है, क्या पहनना है, कैसे दिखना है – बस यहीं पर खत्म नहीं होता। सिर्फ बाहरी बनावट को कंट्रोल करना काफी नहीं तो और कंट्रोल भी लागू किए जाते हैं। 

आज कल योनि को कसने के लिए भी बाज़ार में एक प्रोडक्ट आ गया है – 18 again – यानी वापस 18 का होना। थोड़े दिन इसके ऐड भी चले और ये आज तक खुले आम बिकता है। इस प्रोडक्ट का दावा ये है कि इसका इस्तेमाल कर के सेक्स ‘ हर बार वो पहली बार ‘ जैसा ही लगता है। इस प्रोडक्ट की सामग्री में बहुत कुछ है, और दावा तो ये भी है के इस में शुद्ध सोने का इस्तेमाल होता है। और साथ में पूनिका ग्रेनेटम भी। इस पदार्थ के बारे में वेबसाइट पे लिखा गया है कि “कहा जाता है पूनिका ग्रेनेटम ईडन गार्डन में उगने वाली एक जड़ी बूटी है। इसके फल का इस्तेमाल हज़ारों सालों से दवाइयां बनाने में किया जाता रहा है।” सब जानते हैं के ऐसे “सांप के तेल” और बाकी अजीब चीज़ें भोले भाले लोगों को बेवकूफ बना के बेची जाती है। पर आज अच्छे खासे स्त्री रोग विशषज्ञ यानी गायनेकोलॉजिस्ट डॉक्टर तक इस 18 again के एड अपनी वेबसाइट पे चला रहे हैं। 

चलिए हम एक मिनट इन प्रोडक्ट के लंबे बयानों और डींग हांकने को अनदेखा कर देते हैं। फिर भी इस सवाल का जवाब कौन देगा कि एक औरत के साथ “पहली बार” सेक्स करना इतना खास और उत्तेजक क्यूं माना जाता है कि बाज़ार ऐसे प्रोडक्ट्स से भर गया है? ये कसी हुई योनि आखिर किसके सुख के लिए है? बात साफ है – यहां सिर्फ आदमी का सुख ही देखा जा रहा है। 

अगर हम वहीं एक औरत के सेक्शुअल सुख की बात करें तो फिर फोरप्ले का होना या ना होना, रिश्तों में अनबन, या आदमियों को इरेक्टाइल डिस्फंक्शन होना (लिंग के खड़े होने में दिक्कत से जुड़ा एक विकार) – ये सारी बातें सामने आनी चाहिए ना? लेकिन ऐसा नहीं होता। उल्टा, आदमियों को कहा जाता है कि वो इरेक्टाइल डिसफंक्शन का इलाज इसलिए कराएं ताकि उनका अपना यौन सुख बढ़े। मतलब उन औरतों की तो कोई सोच ही नहीं रहा जिनके पार्टनर का खड़ा ही नहीं होता!

सच ये है कि जब वर्जिनिटी (वर्जिन: जिसने पहले कभी सम्भोग न किया हो )और शुद्धता की तराजू में सब कुछ तुलता है, तो यह एक सामाजिक वातावरण बन जाता है। इस वातावरण में एक औरत की कामुक चाहतों को नज़र अंदाज़ किया जाता है, और औरत को सिर्फ आदमी के सुख का साधन माना जाता है। फिर तो ये भी लाजमी हो जाता है कि औरतों से ये मांग की जाए कि वो अपने शरीर को बदलने के लिए उस पर ऊटपटांग चीज़ें करवाएं। और यही सामाजिक वातावरण हमारे डॉक्टरों पर भी असर करता है।

सच ये है कि 5 साल लंबे MBSS और 3 साल लंबी पोस्ट ग्रेजुएट ट्रेनिंग में (चाहे वो प्रसूती और स्त्रीरोग विज्ञान हो या कोई और क्षेत्र), सेक्शुअल हैल्थ यानी यौनिक स्वास्थ्य के बारे में कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं होती है। जब औरतों की बात होती है, तो सारा ध्यान सिर्फ बच्चा पैदा करने पर होता है ।और बिलकुल रोग और उसके निदान के ढाँचे में जननांगों की बीमारियों  की बात होती है, अक्सर माहवारी से जुड़ी दिक्कतों पर एवं अन्य बीमारियों पर । औरत के शरीर को कभी सुख के सन्दर्भ में समझा ही नहीं गया है और मेडिकल फील्ड की इस हालत के पीछे एक बहुत गहरी सांस्कृतिक मानसिकता है, एक तरफदारी है, जो औरतों के खिलाफ है। 

 क्या आपने कभी पढ़ाई की किताबों पर ध्यान दिया है? फोरेंसिक मेडिसिन की एक टेक्स्ट बुक में वर्जिन की परिभाषा कुछ इस तरह से है – “एक औरत जिसके शरीर के साथ अभी तक सेक्स नहीं किया गया है”। इस परिभाषा से स्टूडेंट्स को ना सिर्फ ये सिखाया जा रहा है कि सिर्फ और सिर्फ औरतें ‘ वर्जिन ‘ होती है। बल्कि उन्हें ये भी बताया जा रहा है कि सेक्स में उनका काम बस यही है कि वो वहां मौजूद रहें । सेक्स में एक औरत बराबर की भागीदार नहीं मानी जाती, उलटा उसके साथ सेक्स किया जाता है। गौर करने की बात है कि बलात्कार जैसे मेडिको लीगल केस भी ‘फोरेंसिक मेडिसिन’ यानी कहने को एक वैज्ञानिक तरीके से सुलझाए जाते हैं – पर यही पुरानी मानसिकता भी उन तरीकों का एक हिस्सा है। 

एक पीड़िता के बलात्कार के प्रूफ यानी प्रमाण ढूंढने के लिए डॉक्टरों को “टू फिंगर टेस्ट” सिखाया जाता है  । ये टेस्ट वैज्ञानिक रूप से बेबुनियाद है। इस में दो उंगलियां औरत की योनि में डाली जाती है और ये माना जाता है कि जिन औरतों ने सेक्स नहीं किया है उनकी कसी हुई योनि होती है, और ढीली योनि का मतलब है उस औरत ने वारदात से पहले खूब सारा सेक्स किया है। इस तरह से ये तय किया जाता है कि वाकई में बलात्कार हुआ है या नहीं!  पूरी बात में अजीब सा लॉजिक ये है कि अगर किसी औरत ने पहले सेक्स किया है, तो उसका बलात्कार हो ही नहीं सकता। 

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने “टू फिंगर टेस्ट” पर प्रतिबन्ध लगाया । साथ साथ सेक्शुअल एसॉल्ट यानी यौन दुष्कर्म के पीड़ितों की जांच किस तरह से होनी चाहिए – इस गाइडलाइन में भी बदलाव आया है । फिर भी कई डॉक्टर आज भी ये टेस्ट करते हैं। अब जा कर , यानी मई 2019 में कहीं महाराष्ट्र सरकार ने इस टेस्ट को अपनी मेडिकल की टेक्स्ट बुकों से हटाया है। और शायद पूरे देश में ऐसा करने वाला महाराष्ट्र इकलौता राज्य है। 

मेडिकल के वो छात्र जो 19 साल की उम्र में ये सब पक्षपातपूर्ण  बातें सीखते, पढ़ते, समझते हैं, और फिर यही जवाब अपने इम्तिहान में लिख कर आते हैं – आखिर कैसे 27 साल के प्रोफेशनल डॉक्टर बन कर समझेंगे के वो जो कह और कर रहे हैं, वो गलत है? कि ये औरत यानी कि इस किस्म की सोच औरत को महज़ एक चीज़ के रूप में देखती है, उसका इंसानी रूप नहीं देखती। इसे अंग्रेज़ी में ऑब्जेक्टिफिकेशन ( objectification) कहते हैं

 आखिर कैसे समझेंगे हमारे भावी डॉक्टर कि वर्जिन कोई मेडिकल टॉपिक या परिभाषा नहीं, बल्कि सिर्फ एक सामाजिक और सांस्कृतिक विचार है जिसका इजाद सिर्फ और सिर्फ एक औरत के शरीर और उसकी सेक्शुअलिटी को काबू में लाने के लिए किया गया था? वर्जिनिटी के मुद्दे की की मेडिकल सिलेबस या एप्लिकेशन में कोई जगह नहीं है और ना होनी चाहिए। 

सच बोलूं तो ये सफर बहुत लंबा है और बहुत मुश्किल भी। ज़्यादातर डॉक्टर केवल अपने फील्ड से जुड़ी बायो मेडिकल बातों की जानकारी रखते हैं। उनको जो सिखाया जा रहा है, उसके सांस्कृतिक या सामाजिक संदर्भ या लैंगिक अधिकारों के बारे में अधिकतर डॉक्टर सोचते भी नहीं।

ये बदलते दौर का प्रमाण है  कि आज कल डॉक्टरों (खासकर के गायनेकोलॉजिस्ट) के बुरे बर्ताव और औरतों की सेक्स लाइफ के बारे में उनके जजमेंटल तरीकों के बारे में इतना कुछ लिखा जा रहा है। ऐसे डॉक्टरों के खिलाफ लिखना लाजमी भी है । 

भले ही हमारे सुप्रीम कोर्ट ने निजता का अधिकार यानी राइट टू प्राईवेसी ( Right to Privacy)  घोषित किया हो, पर मेडिकल प्रोफेशनल्स को कब औरतों की निजता, खुद के इर्द गिर्द जगह जिसका बिन इजाज़त किसी को उल्लंघन नहीं करना चाहिए यानी पर्सनल स्पेस ( personal space)  और कामुक निर्णयों में अपनी चॉइस का होना यानी सेक्शुअल चॉइस ( sexual choice) की इज्जत करना आएगा? कब मेडिकल टेक्स्ट बुक वर्जिनिटी और टू फिंगर टेस्ट जैसे घिसे पिटे बे- बुनियादी तरीकों के बारे में बात करना बन्द करेंगी? कब डॉक्टर्स भी उस समाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक वातावरण के बारे में बात करना शुरू करेंगे जो एक इंसान के स्वास्थ्य और इलाज से जुड़े हर फैसले पर कई तरह से असर करते हैं?

हिसाब से तो ऐसा होना चाहिए था कि मेडिकल और नर्सिंग के क्षेत्रों से जुड़े प्रोफेशनल ही सामाजिक बदलाव लाने की शुरुआत करते। आखिर ये वो लोग हैं जो हर रोज़ अपने काम के दौरान, अपनी आंखों के सामने ये देखते हैं कि हर रोज़ घिसे पिटे, पुरातनपंथी धारणाओं और दकियानूसी जेंडर नॉर्म की वजह से औरतों और लड़कियों पर कितने अत्याचार होते हैं। 

मेडिसिन वो क्षेत्र है, जो हमें इंसानों को देखने का एक नया नज़रिया से सकता है, जिससे हमें इंसानी ज़िंदगी को सही रूप में देखने का मौका मिल सकता है। मेडिसिन की इसी खूबी की वजह से हम तभी बेहतर डॉक्टर बन सकते हैं जब हम लोगों को पूरी तरह से स्वस्थ रहने यानी होलिस्टिक हैल्थ में मदद कर सके। 

सब जानते हैं कि खूबसूरती सिर्फ बाहरी है, लेकिन इसका असर अंदर तक होता है। खूबसूरती पर इस तरह ज़ोर देना एक तरह से औरतों से नफरत कहलाया जा सकता है। फिर सुंदरता के सामाजिक मापदंडों पर खरे ना उतरने से कई औरतें अपने आप से ही नफरत करने लगती हैं। औरतों के शरीर और उनकी सेक्शुअलिटी से जुड़े सारे दकियानूसी ख्याल आप के आस पास की लगभग हर लड़की और औरत के मानसिक स्वास्थ्य को हानि पहुंचाते हैं। डॉक्टरी के पेशे का सिर्फ एक धर्म है – अच्छा स्वास्थ्य। तो याद रखिए के अब समय आ गया है सिर्फ वो कहने और करने का,  जो सच में औरतों के स्वास्थ्य और उनके हक की बात हो । वो सब नहीं जो समाज के झूठे आदर्शों की आड़ में उनके शरीर और दिमाग से खेलें। 

 

डॉ. अनामिका प्रधान मुंबई में काम करती है। इन्होंने मुंबई में ही एक मेडिकल कॉलेज से अपनी डिग्री ली है। समाज में बदलाव लाने के लिए समझदार और ज़िम्मेदार डॉक्टरों की भारी ज़रूरत है, और इसी विषय पर बात करना अनामिका को पसंद है। 

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