वाईज़ैग , एम. बी. बी. एस. और ग्राइंडर मेरे लिए बर्बाद हो चुके हैं। पर क्या करें!

साई कृष्ण द्वारा

अनुवाद: मिहीर सासवडकर

यह किस्सा पिछली गर्मी के मौसम में शुरू हुआ, जब मैंने मेरे पुराने और सबसे अच्छे दोस्त को मेरे समलैंगिक होने की सच्चाई बताई, और यह भी कि पिछले चार सालों से मैं उसे प्यार करता था। यह वह समय था जब मैं मेरी कामुकता को स्वीकारने लगा था और अपनी भावनाओं को खुलेआम प्रदर्शित करने को सीख रहा था। और जब मैंने उसे सब सच बताया, मुझे सुकून मिला और गर्व महसूस हुआ, चूँकि आखिरकार मैंने अपने दोस्त के प्रति उन पगलाई सी भावनाओं से औरसनक से छुटकारा पाया था और मैं मेरी ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं पर ध्यान दे सकता था। जल्द ही सब कुछ ठीक होने वाला था। मुझे तो ऐसा ही लगा।

करीब १० दिन बाद, मैंने ग्राइंडर पर मेरा नाम दर्ज़ किया। जिस किसी ने यह एप्प इस्तेमाल किया है उन्हें पता होगा कि इस एप्प पर ज़्यादातर लोग (जिनमें मैं भी शामिल हूँ) करीब करीब हरदम कामोत्तेजित होते हैं और अपनी बहुत तीव्र कामवासना पूरी करने की खोज में लगे रहते हैं। लेकिन उस रात, दूसरी रातों से अलग, मैं कामोत्तेजित नहीं था। मैं सिर्फ अलग अलग प्रोफाइल की छानबीन कर रहा था ताकि अच्छी बातचीत करने वाला मुझे शायद कोई मिल जाए। और मैं सफल हुआ – आखिरकार मुझे ऐसा कोई मिला जो आधे अधूरे नहीं बल्कि पूरे शब्द और वाक्य का इस्तेमाल कर बात कर रहा था। (क्या मैंने आपको बताया है कि मुझे अच्छा व्याकरण इस्तेमाल किया जाना बेहद पसंद है?)
तो यह रही बात: मेरी किशोरावस्था के दूसरे हिस्से में, मैं विजयवाड़ा में रहा हूँ (जिसका मैं बड़े गर्व से “आंध्र प्रदेश की वास्तविक राजधानी” कहकर समर्थन करता हूँ)। और मुझे पता नहीं दूसरे शहरों और महानगरों में ग्राइंडर पर समलैंगिक समुदाय कैसे काम करता है, लेकिन मेरे शहर में तो, ऐसे एप्प पर आप व्याकरण जैसी चीज़ों की अपेक्षा ना करें तो ही बेहतर होगा। अब, इन लोगों की आलोचना करना मेरे लिए सही नहीं होगा चूँकि सैकड़ों बार मैं ख़ुद व्याकरण की उपेक्षा कर कामवासना का पुजारी रहा हूँ। और इन हालातों में वाकई व्याकरण को कम अहमियत दी जाती है। शायद इसलिए यह लड़का – उसे एस. एस. बुलाते हैं – अलग सा लगा। जैसे वह वहां का ना हो। और मुझे यकीन है उसे मेरे बारे में भी वही लगा चूँकि वह बार बार मुझे पूछता रहता कि क्या मैं असल में विजयवाड़ा से था!


मैंने उससे उसका नंबर ज़बरदस्ती लिया, जो बात उसने ना चाहते हुए की। और उसे फ़ोन करने के पहले, मैंने उसे फेसबुक पर ढूँढा और वह मुझे तुरंत मिला। उसका प्रोफाइल पिक्चर मुझे सबसे ज़्यादा पसंद आया, जो काफ़ी स्मार्ट था। सच कहें, तो सेक्सी। मुझे बहुत ख़ुशी हुई और तुरंत उसे फ़ोन किया।

“हेलो”, वह बोला। मुझे आज भी याद है कैसे मैं उसकी स्पष्ट, गहरी और मरदानी आवाज़ पर तुरंत लट्टू हो गया, जिसमें हलकी सी प्रसन्न चित्त लड़कों सी मोहकता थी। थोड़ी देर के लिए हमारी बातचीत लड़खड़ाई, जब हम एक दूसरे को अपने बारे में बता रहे थे। यह पहली दफा नहीं था जब मैं किसी अंजान शख़्स से बात कर रहा था। मैंने सौ से ज़्यादा ऐसे लोगों से बात की है। मैंने अनगिनत अंजान लोगों के साथ स्पष्ट और कामोत्तेजक बातचीत की है। मेरे हॉर्मोन तीव्र हैं और उन्हें शांत करने के लिए फ़ोन पर सेक्स हरदम तुरंत काम आता है। लेकिन एस. एस.  के साथ, बात कुछ अलग थी – मेरे अंदर की आवाज़ मुझे बता रही थी कि मुझे उसके साथ सिर्फ एक बातचीत से कुछ ज़्यादा चाहिए था।

वह बातचीत एक घंटे के थोड़े ऊपर चली, और मैंने जाना कि वह विज़ाग में चिकित्सा की पढ़ाई कर रहा था और वह मुझसे छोटा था। अब, आम तौर पर, मुझसे करीब दो साल छोटे लड़कों के साथ मैं बात नहीं करता, लेकिन यह लड़का इस सिद्धांत से छूट लेने लायक था। और क्योंकि मैं ख़ुद बायो टेक्नोलॉजी का छात्र हूँ, चिकित्सा पढ़ने वाला कोई दूसरा लड़का मुझे बड़ा कामुक लगता है! और तो और, उस लड़के का बहुत लंबा और सुंदर दिखना और भी काम कर गया।


वह गुस्ताख़ पेश आया: वह लगातार दोहराता गया कि कैसे “वह अपने कॉलेज में सबसे लोकप्रिय लड़का होने से कितना तंग आ चुका है” और कैसे लोग उसके साथ सेक्स करने के लिए पैसे देने के लिए तैयार थे और यह कि वह उस बात से भी थक गया था। वह बोला कि उसे बस दिन रात खुद को लगातार मिलने वाले तवज्जो से “ग़ायब” हो जाना था।

आम तौर पर, मैं ख़ुद की शेखी बघारने वाले इंसान के बिलकुल करीब नहीं जाता, लेकिन यह रोज़ की बात भी तो नहीं कि मैं जैसे विचित्र लोगों से मिलता हूँ। इसके अलावा, उसने मुझमें काफ़ी रूचि दिखाई, तो मैंने अपनी यह पुरानी परख भी दर किनारे की।


मैं ऐसे नहीं कहूँगा कि “बड़े सारे लोग अक्सर मुझपर पूरी तरह से फ़िदा हो जाते हैं”, लेकिन मैंने काफ़ी सारे लोगों को डेट किया है। मैं भारत के सबसे सर्वोत्तम कॉलेज में से एक में पढ़ता हूँ (तो शायद, मैं काफ़ी स्मार्ट भी हूँ) और लोग मेरी बातों में रूचि लेते हैं, भले यह कम समय के लिए ही क्यों ना हो।

उस रात की बातचीत के बाद भी मुझे ख़ुशी से चक्कर आ रहे थे। और यही एहसास दो दिन तक रहा। अगली रात मुझे उससे दोबारा बात करनी थी, लेकिन मैंने रुकना ठीक समझा। मैं चाहता था कि वह मुझे पहले फ़ोन करें, चूँकि उस तरह मुझे पक्का पता चलता कि उसे मैं अच्छा लगता था। और सौभाग्य से (या नहीं), मुझे अगले दिन व्हाट्सप्प पर मैसेज मिला। मैंने प्रोफाइल पिक्चर देखा – कपड़ों का पहनावा बढ़िया था, क़ातिल बाल थे, और वह सेक्सी था।

अब यह रही मेरी ज़िंदगी के बारे में एक छिपी हुई सच्चाई । दरअसल मैं अपने रंगरूप के बारे में मैं अरसों से आशंकित रहा हूँ। पहली बात, तो मैं गोरा नहीं दिखता, जिस कारण जिन लोगों से मैं मिलता हूँ उनमें से ज़्यादातर लोग मुझे डेट नहीं करना चाहते। और, मेरे बचपन में मैं मोटा हुआ करता था और इसलिए लंबे अरसे तक मैं मुटापे से जूझता आ रहा हूँ। मुटापा मेरे ज़िंदगी में एक हादसे सामान था और उसके बाद का तनाव मैं अब भी भुगतता हूँ। मैं चश्मा पहनता हूँ और मेरी भौंहें हलके रूप से जुड़ी हुई हैं। उन दिनों, मेरा आत्मविश्वास बहुत कम था। (अब, वह ना के बराबर है।) लेकिन मेरी बात मानो, कि बाकी सब मायनों में मैं बेहतरीन हूँ!


जिस रात उसने मुझे फ़ोन किया, पहले तो उसने शरमाते हुए बयान किया कि वह आभारी था कि मैंने उसके अच्छे दिखावे की इतनी प्रशंसा की थी और फ़िर उसने मुझसे मेरी तस्वीर मांगी। “मैं अपनी तस्वीर दूसरों को दिखाने के खिलाफ हूँ,” मैंने घोषणा की, और मैंने उसे मेरी तस्वीरें कभी नहीं दिखाईं। उसे दाद देनी होगी, कि उसने भी कभी दोबारा मेरी तस्वीर नहीं मांगी।


अगली सभी रातों जैसे, उस रात भी हमने झट से हमारी ज़िंदगी के बारे में बात की। मैं बहुत कुछ बताने से हिचकिचा रहा था, लेकिन उसने मुझे सब कुछ बताया। हमने सभी विषयों पर चर्चा की – उसकी शंकाओं, रूमानी खिंचाव, पढ़ाई, चहेते खाने से लेकर उसकी बहन की स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयाँ और मध्यम वर्गीय लोगों के लिए उसकी घृणा।


अब तक मैं जान गया था कि जो लड़का मुझे पसंद था वह सिर्फ खुद को महत्त्व देने वाला घमंडी था। वह मुँह में चाँदी का चम्मच लिए पैदा हुआ था और उसे लगता था कि ट्रेनों में गरीब लोग सफ़र करते हैं। मुझे हरदम गर्व रहा है मध्य वर्गीय परिवार में बड़ा होने का, लेकिन किसी कारण उसके साथ बात करने से मुझे अपने अस्तित्व के बारे में बुरा लगता। मैं समझ गया कि उस जैसे लोगों से भरी एक पूरी दुनिया बाहर मौजूद थी, ऐसे लोग जिनके अस्तित्व के बारे में मुझे पता तक नहीं था। वह जो कुछ भी कहता था उसके बारे में मैंने कभी उससे उलट कर सवाल नहीं पूछे,  कभी उसकी हाज़री न ली

चूँकि तब तक, मुझे वह पसंद आने लगा था।


इसके बावजूद, जितना मैं उससे बात करता गया, उतना ही मैं सचेत होता गया कि किन मुद्दों पर बात करूँ, चूँकि तब तक यह साफ़ हो चुका था कि हम दोनों एकदम अलग लोग थे: उसे पाश्चात्य संगीत बेहद पसंद है, मुझे शायद ही कोई गायक या बैंड पता है; वह रात को जागता है, मुझे सुबह जल्दी उठना पसंद है; उसे शानदार नए नए कपड़े पहनना बहुत पसंद है, मुझे वह सब बकवास बिलकुल पसंद नहीं, वह शहज़ादा है जिसे उन तकलीफ़ों का सामना करना पड़ता है जो  अमीर देशों के लोग अनुभव करते हैं और दूसरी तरफ मैं हूँ जिसे महंगी कॉफ़ी पर खर्च करने में भी शर्म आती है। शायद इस अलग अलग पर्यावरण के कारण ही हम दोनों एक दूसरे की ओर आकर्षित हुए थे, लेकिन फिर भी मैं अपने बारे में उसे सिर्फ चुनिंदा बातें बताता।

मुझे पता चलने के पहले, उससे बात करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था। हमारी बातचीत सुबह ५ बजे तक चलती। कभी कभार ६ बजे तक। और दिन भर जब भी हमें समय मिलता हम एक दूसरे को मैसेज करते। वह मुझे बताता कि कैसे मैं उसकी ज़िंदगी में एकमात्र अच्छी बात था (उसे अब भी पता नहीं था मैं कैसा दिखता था)। वह मुझे बताता कि कैसे वह मुझे दुनिया से “सुरक्षित” रखना चाहता था। वह मुझे यह भी बताता कि कैसे वह मुझे दर्द पहुँचाना चाहता था ताकि मैं उसके पास जाऊँ, और फिर वह मुझे शांत करेगा। कितना परपीड़क!

अजीब ढंग से, मैं उस परपीड़न की ओर आकर्षित हुआ। वह घंटों भर मुझसे चर्चा करते बैठता: कैसे वह मुझे गले से सटा लेना चाहता था और सिर्फ़ पागलों सा संभोग करना चाहता था। और कुछ समझने के पहले, मैं उसे कई बार “आय लव यू” कह चुका था। और चंद अवसर पर जब मेरा नसीब अच्छा था, उसने भी मुझे “आय लव यू” कहा।

मुझे यह समझने में कुछ समय लगा कि मैं – भले ही यह बात कितनी पागल और छिछोरी लगे – ऐसे आदमी के साथ प्यार में था जिसे मैं असलियत में मिला भी नहीं था।

वह मुझे मिलने के लिए बहुत उत्सुक था, लेकिन मैं उसे टालता रहा यह मानते हुए कि मुझे हमारा बना बनाया रिश्ता बिगाड़ना नहीं था। और तो और, उसे ढूंढ़ने में मैंने बहुत कष्ट उठाए थे – वो रोज़मर्रा की ज़िंदगी से मेरी मुक्ति का प्रतीक था। उसे मिलने से उस सब को मैं जोखिम में नहीं डालना चाहता था। वह ख्वाब इतना बढ़िया था।

मेरे ख्याल से मध्य अगस्त में मुझे पता चला कि उसके साथ मेरी रंग रेलियों से मेरी पढ़ाई पर कितना बुरा असर हुआ था। जबकि मेरे दूसरे दोस्त जी तोड़ मेहनत कर GRE और TOEFL की तैयारी कर रहे थे, मैं मेरे आशिक़ के साथ गुलछर्रें उड़ा रहा था।

मेरे तर्कसंगत मन ने मुझे कहा कि कैसे यह सब बेवक़ूफ़ी थी और कैसे अगर हम मिलते तो शायद एक दूसरे को पसंद भी नहीं आते। समय समय पर, मैं उसे मैसेज भेजता यह कहते कि ऐसा डगमगाता हुआ “रिश्ता” आगे बढ़ाने से अच्छा था कि हम जुदा हो जाएं, लेकिन वह ऐसे पेश आता जैसे कि उसने वह मैसेज देखा ही ना हो। ऐसा उस दिन तक चला, जिस दिन मैंने रिश्ता तोड़ने की ठान ही ली – मेरी अपनी इच्छा के बिलकुल विरुद्ध – यह कहकर कि मेरे कॉलेज में कैसे किसी ने मुझे डेट पर जाने का न्योता दिया था और यह भी कि मैं कैसे किसी “खरे” शख़्स को डेट करना चाहता था। शायद वह मेरी आशंकाएं थी जिनके कारण इससे पहले कि हममें दरारें आएं, मैं हमारा रिश्ता तोड़ना चाहता था, या शायद मैं ऐसी स्थिति में वर्चस्व पाना चाहता था जिसमें मेरे खयाल से मेरे पास कम प्रभाव था।

उस दिन वह फूट फूटकर रोया। मुझे याद है कि उसे रोते हुए सुनकर मैं कितना दुखी था। मेरा एक हिस्सा उसके संग रोया। लेकिन मेरा दूसरा हिस्सा चोरी छिपे ख़ुश था चूँकि उसके आँसू यह बयान कर रहे थे कि वह मेरी कितनी परवाह करता था। मुझे तो यही लगा।

उस दिन हमने ब्रेकअप नहीं किया। और हमारा रिश्ता आहिस्ता ठीक होता चला जा रहा था। लेकिन इस बार मैंने कुछ अजीब महसूस किया। मैंने देखा कैसे जब वह घर विज़ाग चला जाता वह मुझसे बात करना बंद कर देता। इसके पीछे का राज़ बाद में बाद मैं जान गया। यह इसलिए था चूँकि कॉलेज में, वह भोंदू लोगों से घिरा हुआ था: “गांव के गँवार”। और मुझसे बात करना उनसे दूर रहने का एक ज़रिया था। एक बार वह विज़ाग चला जाता, उसके इलाके में, उस जैसे लोगों से घिरा, उसे मेरी ज़रुरत नहीं थी।

अगस्त के आखिर में मेरे जन्मदिन के एक हफ्ते पहले, हमने हमारे “रिश्ते” को सीरियस कहने का निर्णय लिया। “हम दोनों अब एक साथ हैं,” वह बोला। “ये, अब औपचारिक रूप से मेरा बॉयफ्रेंड है,” मैंने कहा। और तब भी हमारी आपस में मुलाकात नहीं हुई थी।

अगर सच कहूँ, तो सबसे अच्छे पलों में एक कड़वी सी मिठास थी और बुरे पलों में यह अत्यंत दुखदायी था। यह सोच कर कि वह इसलिए मेरे साथ है क्योंकि वह अब तक मुझसे मिला नहीं है, मैं अपने आप को ढोंगी महसूस कर रहा था। मुझे अपना यह ढोंग घिनौना लगता। लेकिन मैंने खुद से वादा किया कि मैं जिम जाऊँगा और किसी चमत्कार से, खुद को सुंदरता के आदर्श में परिवर्तित करूंगा। आखिरकार, यह सिर्फ उसके लिए मेरी भावनाओं का सवाल नहीं था, लेकिन मेरे स्वाभिमान का भी – जो उस समय भी एक पतले धागे के रूप में सही, लेकिन मौजूद था।

और फिर आई गणेश चतुर्थी, और एस. एस. घर चला गया। और जैसे अपेक्षित था, उसने कोई मैसेज नहीं भेजे, ना कॉल किए।

मेरे जन्मदिन की रात, १२ बजने से पहले, मैं डरा हुआ और उत्तेजित था चूँकि, मेरी ज़िंदगी में पहली बार, मेरे जन्मदिन के दिन मेरा कोई बॉयफ्रेंड था। चारों ओर से मुझे कॉल आए। लेकिन उसका कॉल आया ही नहीं। एक मैसेज तक नहीं।

उस रात मैं रोते रोते सो गया। जब मैं उठा तब मेरे फ़ोन पर यह मैसेज मेरा इंतज़ार कर रहा था “सॉरी, मेरा अलार्म बजा नहीं, हैप्पी बर्थडे”। उस रात, पहली बार मैं उसपर गुस्सा हुआ; मैंने उसे कहा कि उसकी तकलीफ़ों के लिए सलाह देते देते मैं तंग आ चुका था। वह बोला कि उसकी मेरे लिए चाहत ख़त्म हो चुकी थी।

उस रात मेरे खाते और भी वेदनाएं थी: मैं बहुत मायूस हुआ जब मुझे पता चला कि एस. एस. मेरे ही क्लास के दूसरे लड़के को भी मैसेज कर रहा था, जो भी समलैंगिक है। इस लड़के को पता नहीं था कि मैं समलैंगिक हूँ और मेरा एस. एस. के साथ रिश्ता है। मैंने उसे सब सच बताया और मुझे वह मैसेज दिखाने का तकाज़ा किया जो एस. एस.  और वो एक दूसरे को भेजते थे। एस .एस. ने कैसी बेशर्मी से मेरे दोस्त के साथ इश्क़ लड़ाया था, यह देखकर मुझे घिन लगी। जब मुझे पता चला कि उसने हम दोनों को एक जैसे मैसेज भेजे थे, मुझे और बुरा लगा। हमने रिश्ता तोड़ दिया। और आखिरी बार ब्रेकअप करने के पहले दो बार फिर साथ आए।


आज, जब मैं उस घटना पर गौर करता हूँ और अपने किए को सही साबित करने की कोशिश करता हूँ, मैं सोचता हूँ कि क्या वह प्यार था, या क्या केवल खुद पर दया खाने की बेबस भावना। क्या मेरी अतिरंजित हीनभावना के कारण मुझे लगा कि मुझे उसके जितना अच्छा लड़का फिर से कभी नहीं मिलेगा। यह सब करते हुए क्या मैंने खुद के मूल्य को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ नहीं कर दिया था?

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे लगता है उसके साथ सभी नाता तोड़ना समझदार होता। लेकिन मैं उससे इतने गहरे रूप से बंधा हुआ था, या शायद उसके उस छवि से जो मेरे मन में थी, कि मैं उससे नाता नहीं तोड़ सकता था। वह भी बात करते गया, चूँकि यार, किसे अच्छा नहीं लगता जब उसे इतना मनोरंजन और नौटंकी देखने का मौका और ध्यान मिलता है?

मुझे पूरी तरह पता था कि यह स्थिति कितनी ज़हरीली थी। मेरे ज़हन का एक हिस्सा सचमुच में उससे दूर हो जाना चाहता था। लेकिन मैं चाहता था कि उससे ब्रेकअप की पहल मैं करूँ और चाहता था कि उसे मेरे चले जाने से दुःख हो और इसकी दुष्ट संतुष्टि से मुझे ख़ुशी मिले।

मेरा GRE का इम्तिहान सर पर था और मुझे सांस लेने का समय चाहिए था, इसलिए कुछ हफ्तों के लिए हमने बात करना बंद किया। मुझे लगा कि इस जुदाई के कारण वो मुझे और चाहेगा, लेकिन मुझे दूसरों से पता चला कि वह मुझे भूल चुका था और वह दो और लड़कों से बातें कर रहा था। और कैसे हमारा रिश्ता अहम ना होते हुए “सिर्फ टाइम पास” था।

तब मुझे पता चला कि उसके लिए मैं इतने दिन क्या था। टाइम पास। वह रिश्ता और क्या हो सकता था, मैंने खुद से कहा, बेवक़ूफ़ी पर खुद को कोसते हुए।


मुझे बहुत तीव्र तीखा दर्द हुआ। मुझे बहुत निराशा महसूस हुई और मैंने तय किया कि मैं फिर से उसके साथ नहीं रहूँगा। मुझे मदद चाहिए थी। मुझे ठीक होना था। एक रात मैंने मेरे माता पिता को मेरी कामुकता का सच बताकर खुद ही को आश्चर्यचकित कर दिया। मुझे और भी आश्चर्य हुआ यह जानकर कि मेरे ब्राह्मण माता पिता को अपने बेटे का समलैंगिक होना स्वीकार था।

लेकिन उससे मेरा घाव नहीं भरा। मैं लगभग पागल हो रहा था। मैं सभी जगह रोता रहता, हर रोज़। यह घाव मेरे दिल पर ही नहीं बल्कि मेरे स्वाभिमान पर भी लगा था। मेरे GRE और मास्टर्स के एप्लीकेशन भी बर्बाद हो गए। मैंने डॉक्टर से सलाह ली और मनश्चिकित्सा भी ली, लेकिन उससे भी मुझे इतनी राहत नहीं मिली। हमारे ब्रेकअप को ५ महीने हो चुके हैं और मेरे ज़हन का एक हिस्सा अब भी टूटा हुआ है। शायद वह सच कह रहा था जब उसने मुझे एक “भावात्मक मुसीबत” बुलाया।

अब जब मैं उस घटना पर गौर करता हूँ, मैं समझ गया हूँ कैसे एस. एस. भी गहरे रूप से दोष भरा है। मैं बहुत आसानी से कई पन्ने लिख सकता हूँ इस बात पर कि कैसे वह सभी मायनों में मेरे लिए अच्छा नहीं है। उसके कारण मेरी सभी आशंकाएं बाहर निकल आईं, जबकि मैंने उसे मानो सिंहासन पर रख दिया था। लेकिन ऐसा करने से मैंने स्वयं को बहुत नीचा दिखाया। चीज़ें और लोग मुझपर ऐसा असर न करें, यह संतुलन बनाना मैं अब भी सीख रहा हूँ।

तो, हाँ, यह बात कहने में मुझे घिन आती है, लेकिन हाल ही में, वह फिर मुझसे बात करने लगा और मैंने उसे जवाब दिया। मुझे लगा कि मैं उसे पूरी तरह भूल चुका था, लेकिन मेरे दोस्तों ने मुझे बताया कि उस दिन जब मैं नशे में धुत था, मैं रात भर उसी का नाम गुनगुना रहा था। उफ़!

मैं लफ़्ज़ों में बयान नहीं कर सकता इस पूरी घटना से मैं कितना पीड़ित हूँ। लेकिन मैं फिर भी एस. एस. को बहुत चाहता हूँ। हालाँकि, हाँ, प्यार में सब तरह का पागलपन चलता है – मुझे पता है कि मुझे बहुत सारे मामलों में बहुत तरक्की करनी है। मेरी ज़िंदगी की कहानी अब भी जारी है, लिखकर बयान करते हुए भी। कल रात ही मैं और एस. एस. डेट पर जाने की सोच रहे थे! अब आगे जो होता है वह मेरे अगली कहानी का हिस्सा बन सकता है।

साई कृष्ण हद से ज़्यादा गपशप करता है, दिन रात सुंदर लड़कों को ताकता रहता है और पार्ट टाइम जीव विज्ञान की पढ़ाई करता है। उसे उन लोगों से नफरत है जो समोसों पर ढ़ेर सारा सॉस डालते हैं।

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