विकट बालदार कहानियाँ: एक रोमहर की डायरी।

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लिखित – दीपाली तनेजा

अनुवाद – नेहा वी झा 

 

१९५९

जब पहली बार मैंने शरीर पर बालों को किसी अनचाहे और असामान्य जगह पर देखा था, तब मैं शायद कुछ साल की थी और लंदन की एक बस में सफर कर रही थी। आज भी जब मैं याद करती हूँ तो मेरे मन में उस छोटे बाल वाली महिला की धुंधली सी छवि बन जाती है, जिसने पिंडली तक लंबी पैंट पहनी थी, और जिसके पैर के दिखाई दे रहे हिस्से पर काफी सारे बाल थे। इतने, कि मेरी बहन और मेरा ध्यान उस ओर खिंचा था,  और आज कुछ पचास साल बाद भी मुझे ये घटना याद है। जहां तक हमारा सवाल था, हमारी माँ के पैरों की तरफ हमारा ध्यान कभी नहीं गया था। हाँ, उनके पास पैर थे, और हम दोनों बहनें उनकी फैंसी चप्पलो में उछलकूद करती थीं। लेकिन वो केवल साड़ियाँ पहनती थीं, इस लिए काफी सालों बाद ही हमें ये एहसास हो पाया कि उनके पास भी पैर थे, वो भी बाल से ढके। लेकिन हमारा बचपन जो कि इंग्लैंड में बीता था, उसने हमें चिकनी, नायलॉन मोजा पहने, ऊंचे एड़ी वाले, मनोहर पैरों का ही अनुमान दिया था। माँ की चिकनी बाहों पे छोटी सुनहरी रोयें थीं जो उनके या हमारे लिए कभी चिंता का विषय नहीं बनीं। पैरों पर बाल वाली वो महिला हमारी दुनिया में एक विषमता थी। माँ को कभी अपने पैरों या काँखों को शेव करने की ज़रूरत नही पड़ी। उनके पैर के निचले हिस्से में काफी बाल थे, लेकिन वे हमेशा छिपे रहते थे, ठीक वैसे ही जैसे बाकी सभी जानपहचान वाली देसी आंटीज के। जहां तक मुझे याद है, उनमें से केवल एक ऐसी थीं जो काफी फैशनेबल थीं और अपने चेहरे पर नियमित रूप से मेकअप लगाती थीं। बाकी सब बस अपने चेहरे पर शायद चलतेचलते थोड़ी सी लिपस्टिक थपथपा लेतीं थी। तो मूल बात ये है कि कोई देसी पैर हमें कभी दिखाई ही नहीं दिए।

 

१९६३

धूल धूसित दिल्ली की गर्मी में लौटने के बाद ही माँ बिना आस्तीन वाले ब्लाउज पहनने लगीं और अपने कांख के बाल हटाने लगीं। बिन आस्तीन वाले ब्लाऊज़ उस समय काफी उग्र माने जाते थे। माँ, आमतौर पर, थोड़ी ठण्डक महसूस करने के लिए उन्हें केवल घर पर ही पहना करतीं थीं। मेरी किसी भी बुआ ने कभी ऐसे ब्लाऊज़ नहीं पहने; हालांकि, उनके बाद की पीढियां पहन रही है।

 

१९६६

गर्मी की एक छुट्टी के दौरान अचानक अपनी कांख में एक काला झुंड देखकर मैं चौंक गई थी। मैं उस समय कुछ ग्यारह साल की थी, और अपनी बहन के शरीर की आकस्मिक बालवृद्धि देख कर, आश्चर्य में थी। वह एक काले धागे का गुच्छा निकला जो सिर्फ मेरी एक कांख में गया था। मुझे कुछ पता नहीं थामेरी बहन ने ऐसा कर मुझे डराने की कोशिश की थी क्या, या वह कैसे मेरी कांख तक पहुँचने में कामयाब हुआ। बाल अपने समय से एक उचित गति में जड़, उग और बढ़ रहे थे। मैंने उन बालों को अपने बड़े होने का ही एक हिस्सा मान लिया था। किशोरावस्था में पैर के बालों के कहर ने मुझे पिताजी के रेजर को चोरीछिपे उधार लेने पर मज़बूर किया था। हालांकि वो व्यर्थ ही साबित हुआ था। हमारे स्कूल की कोई यूनिफार्म नही थी। स्कर्ट अनिवार्य नहीं थीं, और घुटने तक की लंबाई वाले सफेद मोज़े स्कूली फैशन की चरम सीमा माने जाते थे। कुछ लड़कियों ने बाल हटाना शुरू किया था। मेरे लिए कॉलेज का मतलब पजामा और साड़ी और सलवार कमीज़ थे। स्कर्ट तो हमारे बीते हुए बचपन का हिस्सा बन गयी थी। हालांकि खेलकूद करने वाली लड़कियां अपने  चमकदार चिकने पैरों पर छोटी स्कर्ट झुलातीं थीं। मैंने एक  चिमटी/ ट्वीज़र कहीं से जुगाड़ ली थी, और अपनी भौंए (जो कि किसी भी तरह से घनीं या अनियंत्रित नहीं थीं) को आकार देने में कामयाब रही थी। मैं चश्मा भी पहनती थी, जिससे वो और भी छुपी रहती थीं।

 

१९७९

हमारे विवाह के कुछ हफ्ते बाद, एक दिन मैंने अपनी भौहें चिमटी से हटानी शुरू कीं; मेरे पति और उनकी बहन के अनुसार इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। वो कई दशक पहले, आखिरी बार था, जब मैंने अपने माथे पर उस चिमटी का इस्तेमाल किया।जहां तक मेरे ​​पति की बात थी, रोमांस के लिए बाल हटाने के अवसाद की ज़रूरत नहीं थी। जब हमारी आत्माओं, दिलों और हार्मोन का संगम हो चुका था,तो किसी तरह का शारीरिक गुण या उसकी अनुपस्थिति कोई मायने नहीं रखता था; सर्जिकल निशान, बालों या बिना बालों वाला अंग, टेढ़ेमेढ़े दाँत, मोटापा या दुबलापन, सब महत्वहीन थे।

मुझे कुछ ऐसे आपरेशन करवाने पड़े जिनकी वजह से, मुझे अपनी इच्छा से कहीं ज्यादा लोमशातन – शेव – करवाना पड़ा। बालों के वापस उगने पर काफी खुजली हुई, बड़ा बेआराम सा लगा।

मेरे लिए, कुछ कपड़े, जैसे कि स्विम्सुट, स्कर्ट और बिना आस्तीन वाले कुर्ते, बाल हटाने की मांग सी करते थे। यह पहला ऐसा वर्ष रहा है जब मैं अपने पैरों और काँखों में बाल लिए पूल में गई हूँ, जब मैंने जानबूझकर ये फैसला किया है कि मैं बालों को हटाने की परेशानी नहीं उठाउंगी।

 

२०१६

शरीर के बाल हमें इतना परेशान क्यों करते हैं? एक ऑन्टी ने हमें बताया कि छोटी बच्चियों के हाथ और पैरों पर विभिन्न आटों का मिश्रण और ताँबे के कटोरे का उपयोग करने से बाल नहीं आते हैं।

आधी मानव जाति की यह ट्रेनिंग कितने दिनों से चल रही है

मेरी मां, अस्सी की होने के बाद भी, होंठ के ऊपर आये कुछ छोटे बालों से परेशान हो जाती थी। जब तक वह पूर्णतया खुद चलफिर सकतीं थीं और स्वतंत्र थीं, तब तक वो कभीकभी अपने ऊपरी होंठ को थ्रेडिंग करवातीं थीं। फिर जब उनकी उम्र कुछ और ढली और वो बाहर जाने में असमर्थ हो गईं, तब उन्हें सिर्फ मेरे आश्वासन से काम चलाना पड़ता था कि सचमुच कोई रोंआ नज़र नहीं रहा है।

मैंने ये तय किया है कि मैं अपनी वृद्धावस्था को अपने इन बालों समेत ही अपनाउंगी। ठीक उसी तरह बेबाक होकर जैसे कि मेरे पिताजी, जिनके कान पे हद से ज्यादा बाल थे, (उतने,जो  कि मैंने आज तक किसी पर  नही देखे) फिर भी उन्हें कभी उन बालों से कोई शिकायत नहीं थी। 

 

दीपली तनेजा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से बाल विकास में स्नातकोत्तर की डिग्री उपलब्ध की है। वह तीन कुत्तों और एक युवा की दादी हैं। उनकी लघु कहानियां टाइम्स ऑफ इंडिया कोची के ओणम स्पेशल सप्लीमेंट, कोची में (नब्बे के दशक मेंप्रकाशित की गई थी। और अगस्त २००७ से वह दीपालितनेजा.ब्लॉगस्पॉट.कॉम पे ब्लॉगिंग कर रही हैं।

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