मुँह बोले रिश्ते : ६ लोग अपने मन से चुने हुए परिवार के बारे में बताते हैं

अनुवाद: रोहित शुक्ल

नमिथा द्वारा चित्रण

जीवन के विभिन्न पड़ावों पर, हम कई लोगों के बहुत क़रीब आते हैं, उन्हें प्यार करते हैं। हम उनके साथ कई तरह के रिश्तों और कई अलग तरह के प्यार में बंध जाते हैं। हालाँकि समाज कुछ रिश्तों को अहम और कुछ को ग़ैर – ज़रूरी मानता है, पर प्यार इन बड़ी आसानी से बनाए दर्जों में विश्वास नहीं रखता, वो बहता हुआ अपने नए रिश्तों से जुड़ता जाता है।

हमेशा ये माना जाता है कि परिवार सब रिश्तों में सबसे अहम, सबसे महान रिश्ता होता है। हमें परिवार को सदा आगे रखना सिखाया जाता है, और हमारे माता-पिता, सगे भाई बहन, बच्चे और जीवनसाथी वे लोग हैं जिन्हें हमारे सबसे नज़दीक होने की उम्मीद की जाती है। (हमारी बात पर यक़ीन नहीं हो रहा ? तो जाकर करन जौहर और सूरज बड़जात्या से पूछ लीजिये !) । परिवार हममें से बहुतों के लिए ज़रूरी है। लेकिन क्या यही एक रास्ता है जिससे हम किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के ग्रुप से सम्बन्ध जोड़ें ? अगर आप आस-पास नज़र दौड़ाएं तो सही में आप देखेंगे कि लोग कई अलग तरीक़ों से परिवार-जैसे रिश्ते बना लेते हैं।

वो क्या है जिससे परिवार बनता है ? इस बारे में हम सबके पास अपने-अपने विचार हैं – कुछ लोगों के हिसाब से ये एक चहारदीवारी के अंदर रहते हुए साथ मिलकर भोजन करना हो सकता है। बाकी के लिए, ये शायद किसी के साथ नज़दीक़ी भावनात्मक सम्बन्ध रखना हो सकता है जो हमेशा, हरपल आपके साथ रहे। हमारे रिश्ते कभी-कभार ही स्थिर रहते हैं – उनमें से कुछ शायद गुज़रते वक़्त के साथ मुरझा या कुम्हला सकते हैं, और आप अलगाव की ओर मुड़ जाते हैं, और कुछ वक्त से साथ और भी गहरा सकते हैं।ऐसा भी होता है कि एक व्यक्ति जिसके साथ आपकी मुलाक़ात एक संयोग से हुई हो, वो आपके सबसे क़रीबी इंसान की तरह उभर आए, जिसपर आप भरोसा करें, करते जाएँ और जिससे आप अपने जीवन के सारे उतार-चढाव साझा करें। हम, लोगों को चुनकर अपने मन चाहे परिवार का हिस्सा बनाते हैं। ये नहीं होता कि वो हमेशा परिवार की परंपरागत भूमिकाओं में ही फ़िट बैठें, पर हमारे लिए वो सबसे नज़दीक, सबसे जिगरी होते हैं।       

ऐसे विभिन्न रास्ते खोजने के लिए, जिनमें लोग ऐसे रिश्ते बनाते हैं, हमने लोगों से उनके चुने हुए परिवारों के विषय में बातचीत की। उन्होंने हमसे क्या कहा, पेश है :

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

“ जब मेरे चेले के चेले हों , तो मैं उनकी नानी हूँगी ” – सौम्या गुप्ता, 39   

मेरे पास ख़ुद के चुने हुए दो परिवार हैं। हिजड़ा समुदाय मेरा पहला चुना हुआ परिवार है। और मेरा दूसरा परिवार मेरे सहकर्मी यानि मेरे साथ काम करने वाले हैं। क्योंकि घर के बनिस्पत आप अपना ज़्यादा समय ऑफिस में बितात्ते हैं, लिहाज़ा ये ज़रूरी हो जाता है।

मैं आंध्र प्रदेश के एक तटवर्ती शहर से आती हूँ। 18 – 20 की उम्र के लगभग, जब मैंने अपनी कामुकता को जानना शुरू किया, मैंने अपने समुदाय को तलाशना शुरू किया।

जब परिवार (जो पैदाईशी मिला है) और समाज अपने से परे या एक समलैंगिक (होमोसेक्सुअल) को नहीं स्वीकारता, तब आप हिजड़ों के समुदाय में सहमति ढूंढ सकते हैं। हम जैसा  लोग, हम जैसा लोगों को क़ुबूल करता है।

हिजड़ों के परिवार की रूपरेखा दिलचस्प है, क्योंकि आप न सिर्फ अपने से ऊपर वालों से बल्कि नए आनेवालों से भी सीखते हैं। ये एक चेन की तरह चलता है, हम एक दूसरे का समर्थन करते हैं, एक दूसरे से सीखते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं। गुरु परिवार का सिरमौर, यानि प्रमुख होता है और हर कोई उसके अधीन रहता है। हालाँकि वहाँ अलग-अलग स्तर होते हैं – गुरु के अधीन चेले होते हैं।  मेरे चेले के लिए, मेरी गुरु उसकी नानी हुई, और जब मेरे चेले को चेले हुए, तो मैं उनकी नानी हो गई।

सन 2000 की शुरुआत में किसी विपरीतलिंगी (हिजड़े) को नौकरी मिलना कठिन था, इसलिए जब भी हममें  से किसी को भी नौकरी मिलती थी, हम एक लंच या डिनर रखते थे, मेहमानदारी करते थे, जश्न मनाते थे

। मुझे याद है पहले, मैं अपनी तनख़्वाह का एक हिस्सा उस सार्वजनिक फंड में डालती थी, जिसे हमने किसी बुरे समय, या अचानक कुछ हो जाने की परिस्थिति के लिए गठित किया था। तो उस तरह का सहयोग भी वहाँ मौजूद है। मैं वार्षिक खान-पान और मिलन-दिवस आयोजित किया करती थी – जैसे नए साल पर या कुछ वैसा ही। अब, हमारा एक पारिवारिक व्हाट्सएप्प ग्रुप है जहाँ हम सब एक दुसरे को अपनी ज़िन्दगी के बारे में अपडेट करते रहते हैं। मैं अपने हरेक काम को शेयर करती, अपने हरेक महत्वपूर्ण फ़ैसलों को जो मैं ले रही होती हूँ, और मेरा परिवार इसपर अपने विचार रखता है, इसके भले-बुरे पर बातचीत करता है, और ऐसे ही चलता। है। मेरे हिसाब से परिवार इसी को कहा जाता है – एक दूसरे के साथ और समर्थन की नींव पर खड़ा एक सच्चा रिश्ता।


“ अगर परिवार जैसा अपना कोई लगा, तो सबसे पहले वो चिंटू था, एक अद्भुत बिल्ला ” – शल्स महाजन, उम्र XX

परिवार शब्द के बारे में मैं निश्चित नहीं हूँ। क्या मैं इसका इस्तेमाल करना भी चाहूँगा ? क्योंकि समाज में जन्म लेकर या शादी करके ही परिवार बनाने का एकमात्र तरीक़ा होता है। अगर आप रिश्तों को इसके पार देख रहे हैं और समाज के उन्हीं नियमों को फ़ौलो नहीं कर रहे हैं, तो आप उस परिभाषा के इस्तेमाल पर अनिश्चित महसूस करते हैं। अलग-अलग मक़ामों पर हमने अलग परिभाषा का इस्तेमाल किया है – मेरे अंतरंग (लेखिका एलिस वॉकर की कलम ने इसे यूं पुकारा ), या मेरे घनिष्ठ, या सिर्फ़ मेरे लोग या घर या फिर कहीं-कहीं, मेरा बुदबुदा।

बड़ा होने के दौरान मैं अक्सर अलग-अलग जगहों पर रहा और कई बार मैं अपने हमउम्रों के साथ एकसार नहीं हुआ। इसलिए मेरे लिए, मेरी पैदाइश और मेरी नाभी से जुड़े मेरे परिवार के लोगों से ही मैं सबसे नज़दीक था, और मैंने सिर्फ़ उन्हें ही एक परिवार की तरह देखा है। अपने बीसवें वर्ष के दौरान, मेरे बॉम्बे लौट आने के बाद मैं एक महिलावादी और समलैंगिकों  के संगठन का हिस्सा बन गया। उनके साथ मैंने ऐसी सहजता और ऐसा साथ महसूस किया जिसका मैंने आज तक अनुभव नहीं किया था। पहली बार ऐसा लगा कि मेरी ज़िंदगी में लोग गुज़रते साए से ज़्यादा मायने रख सकते हैं।

इससे पहले, वो पहला जिसे मैंने परिवार की नज़र से देखा, वो चिंटू था, एक अद्भुत बिल्ला, जो मेरी ज़िन्दगी  में तब आया जब मैं 1993 में लुइसविल (Louisville), केंटकी (Kentucky) में एक ग्रैजुएट स्टूडेंट था । मैं उन दिनों बहुत गम्भीर रूप से उदास था। उस वक़्त वो एक नन्हा-सा बिलौटा था, मुश्किल से चंद हफ़्तों का। मेरे जीवन में बेफ़िक्र खुशियाँ लौटाने, मुझे बचाने और मुमकिन तौर पर मेरी डिग्री को पूरा करने में उसका बहुत बड़ा योगदान रहा था। हाॅ, कुछ और ख़ूबसूरत दोस्तों ने भी मेरा साथ दिया। पर वो मेरी ज़िन्दगी में कुछ अलग ही लेकर आया। जब मैं वापस लौटा तो वो भी मेरे साथ आया। मैंने उससे ज़िंदगी भर का साथ निभाने की ठान ली थी, उसकी या मेरी, जो भी पहले ख़त्म हो।  और सिर्फ़ यही वो समय रहा है, जब मुझे पक्के तौर पर लगा था कि मैं ज़िंदगी भर के लिए अपना रिश्ता निभाने को वचनबद्ध था।

इसके बाद बॉम्बे में, जब मैं अपने पार्टनर के साथ रहने आया, तो चिंटू भी साथ आया, और हम तीनों एक गृहस्थी और एक परिवार बन गए। चिंटू बीमार और मरणासन्न था, जब दिल्ली हाई कोर्ट का आईपीसी (IPC) की धारा 377 का फ़ैसला आया।वो फ़ैसला, जिसने 2009 में हमें वो सब दे डाला जिसकी हमें उम्मीद्द नहीं थी। वो तब 16 साल का था। उस रात पूरे शहर में जश्न मन रहा था और मेरी पहचान के बहुत सारे लोग हमें काॅल कर रहे थे, पूछ रहे थे कि ऐसे जश्न के माहौल में हम कहाॅ छिपे हुए थे ? हम दोनों घर पर चिंटू के पास थे, और हमारे साथ थे, हमारे सबसे नज़दीकी दोस्त और और हमारा क्वीर( queer) परिवार, हमारे लेबिया संगठन की टोली (LABIA – एक समलैंगिक महिलावादी संगठन) | हम सब एक घेरे में बैठे उत्सव मना रहे थे, हँस रहे थे, खा रहे थे, पी रहे थे और साथ ही साथ चिंटू को लेकर दुखी हो रहे थे, ये जानते हुए कि अगली बार जब हम मिलेंगे, तब वो हमारे बीच नहीं होगा। वो हमारी लम्बी लम्बी मुलाक़ातों और अड्डेबाज़ी का एक हिस्सा रहा है। मुझे लगता है कि ये साथ रहने का एहसास- यही “घर” है।

“ मेरी माँ सोचती है कि मेरी दादी और मास्टरजी जज़्बाती तौर पर आश्रित हैं ” – दामिनी*, 22   

मेरी दादीमाँ मेरठ में एक छोटे बंगले में रहती है। वो जवानी में ही विधवा हो गई थी, लेकिन उसने अपने परिवार और दोस्तों की मदद से अपने दो बच्चों की परवरिश की, और अपना निजी वक़्त शास्त्रीय संगीत के अपने जुनून को समर्पित कर दिया। मेरी याद में तो हमेशा से मास्टरजी, जो लगभग मेरी माँ की उम्र के थे, हमारे कंपाउंड के छोटे से आउटहाउस में रहते आये हैं। वो अपना खाना ख़ुद बनाकर खाते हैं और बाहर में उनका एक अलग वॉशरूम है,  लेकिन वो हमारे परिवार के एक अभिन्न अंग हैं। वो मेरी दादी के साथ जुटे रहते हैं, उन्हें संगीत सिखाते हैं और साथ ही साथ उनकी और उनके घर की देखभाल उनके बच्चों से बेहतर करते हैं। मैं हमेशा से उनको अपने परिवार का एक सदस्य मानती आई हूँ, जबकि मेरी माँ आजकल ज़ोर देकर कहती हैं कि नहीं, वो नहीं हैं।

मैंने अपनी माँ से पूछा था कि उनका वहाँ कैसे आना हुआ। मेरी दादीमाँ को एक शिक्षक की ज़रुरत थी क्योंकि वो संगीत में निपुण (म्यूज़िक की एक मास्टर डिग्री) कर रही थी, इसलिए वो वहाँ आए। घर ढूंढने की उनकी कोशिशें क़ामयाब नहीं हो पा रही थीं, और तभी सिक्योरिटी गार्ड ने दादीमाँ के बंगले का वो छोटा सा आउटहाउस ख़ाली किया था, तो मास्टरजी ने राय दी कि वो एक बेहतर गार्ड भी साबित होंगे और आ गए। चूँकि मेरे चाचा बाहर कॉलेज में पढ़ते थे, तो मास्टरजी को बतौर सुरक्षा माना गया, जैसे कि घर में एक मर्द तो रहेगा। मेरी माँ सोचती है कि मेरी दादीमाँ और मास्टरजी जज़्बाती तौर से एक दूसरे पर आश्रित हैं। कभी-कभी उनको उन दोनों के बीच प्रेम-सम्बन्ध का  शक़ हुआ, पर वो कभी किसी यक़ीन पे नहीं पहुँच पाई। वो कहती है कि वो मेरी दादीमाँ का दोस्त अधिक है और वो उन्हें उनका अपना गुरु मानती हैं। मुझे लगता है कि उनका ये रिश्ता महज़ दोस्ती या प्रेम-सम्बन्ध या हमारे जाने-माने सम्बंधों के दायरों से ज़्यादा गहरा है। फिर परिवार के लोग भले ही “ कौन परिवार का हिस्सा हैं, कौन नहीं “ की कितनी भी रेखाऍ बनाते रहें।

अगर मेरी मानें, तो परिवार सिर्फ़ ख़ून से ही नहीं बनता। मैं निश्चित नहीं हूँ कि परिवार और ना-परिवार की रेखाएँ खींचने के कोई मायने होते हैं, क्योंकि वो जो परवाह करते हैं, वो आपके साथ जुड़े रहते हैं और किसी हाल में आपके जीवन का एक हिस्सा बन जाते हैं – बग़ैर कुछ कहे, एक अटूट तरीके से। मैं सोचती हूँ कि अगर कोई ख़ून के रिश्तों की वजह से परे आपकी परवाह करता है, तो वो रिश्ता आपके परिवार के रिश्ते से कुछ बेहतर है।

“ हमारे अड़ोस-पड़ोस में, हम एक दूसरे को भाई/बहन कहकर पुकारते हैं, और हमें सही में वैसा महसूस होता है ” – रफैल*, 26

मैं एक ऐसे समुदाय में रहता हूँ जो मेरे बहुत नज़दीक है, एक बहुत बड़े फैले हुए परिवार की तरह। यहाँ हम एक दूसरे के घर बार-बार आते-जाते हैं, और हर तरह के सहयोग की ज़रुरत, या रूपए -पैसों की मदद वगैरह हमेशा उपलब्ध रहती है। उदहारण के लिए,  अगर आधी रात, चाहे वो रात के दो ही क्यों न बजे हों, मेरे परिवार में कोई बीमार पड़ जाए, तो मैं अपने उस पडोसी के पास, जो गाड़ी रखता हो, मदद के लिए जा सकता हूँ और वे निश्चित हमें हॉस्पिटल लेकर जाएँगे। इस आश्वासन लिए मैं बहुत आभारी हूँ। कितना अजीब है कि बहुत-सी जगहों पर लोग अपने पड़ोसियों को जानते तक नहीं।

मैं अपने परिवार के बाक़ी सदस्यों के, जो यहाँ नहीं रहते, उतना नज़दीक नहीं हूँ जितना कि अपने पड़ोसियों से हूँ। हम अपनी ज़िंदगियाँ, अपनी परेशानियाँ, अपनी खुशियाँ साझा करते  हैं। हरेक त्यौहार साथ मनाते हैं – अगर कोई दीवाली की मिठाई बना रहा हो, कोई ईद के लिए मटन या क्रिसमस का केक बना रहा हो, वो सभी के लिए बनाएगा। क्रिसमस पर मैंने 30 परिवारों के लिए केक बनाया। जब मेरे चचेरे भाई-बहनों ने सुना, जो कहीं और रहते हैं, तो वे अचंभित हो गए क्योंकि ज़्यादातर लोग अपने नज़दीकी दोस्तों या रिश्तेदारों के लिए ही कुछ बनाते हैं। वे मुझसे पूछते हैं, तुम अपने पड़ोसियों के लिए इतना सब क्यों करते हो? लेकिन भले ही हमारा समुदाय बड़ा है, ये मज़बूत धागों से बंधा है। हमारा वो पहला घर था जिसमें फ़ोन लगा था, सो सभी आकर उसे इस्तेमाल करते, और हर कोई हमारे घर टी.वी. देखने भी आता।

हमारे गाँव से जो रोज़गार की तलाश में मुंबई आते थे, मेरी दादी हर किसी को घर में आश्रय दिया करती थी। और दादी तब तक उनके रहने और खाने की व्यवस्था करती जबतक वो इस शहर में अपने पैर न जमा लें। और वे भी उन्हें अपनी माॅ समझते और उनके साथ वैसे ही प्यार और इज़्ज़त से पेश आते थे। हम भी आपस में एक दूसरे को भाई/बहन कहकर बुलाते हैं, और सच में ऐसा ही लगता है। बेशक़ हमारा रिश्ता ख़ून का नहीं, पर हममें बहुत जुड़ाव और आपसी भरोसा है।

“ मेरा मुँह बोला भाई और मुँह बोली बहन मेरा परिवार हैं ” – सुनीता सबरवाल, 48

भारती और मैं बचपन के दोस्त हैं। हमारी दोस्ती को 45 वर्ष हो चले हैं। अगर मेरे पास एक बहन होती तो भी मुझे नहीं लगता कि मैं उसके इतने नज़दीक होती, जितना मैं भारती से हूँ। हम साथ पढ़े, साथ बड़े हुए हैं। हम समय के साथ विकसित हुए, लेकिन हमारे सोचने का तरीका तब भी तालमेल रखता रहा | अपने आप को ज़ाहिर करने लिए मुझे उसके सामने ज़्यादा कुछ नहीं कहना पड़ता है, क्योंकि वो फ़ौरन समझ लेती है। मेरी बेटी जबतक चौथी कक्षा में थी, ये जानती तक नहीं थी कि भारती उसकी सगी मौसी नहीं है ।

मेरा मुँह बोला भाई पवन (मेरे होमटाऊन में हम पड़ोसी हुआ करते थे) और मेरी मुँह बोली बहन भारती से मेरा परिवार बनता है। हाल में ही, जब मेरी माँ की मृत्यु हुई, तो मुझे सिर्फ़ एक कॉल करना पड़ा और वे दोनों अपने-अपने शहरों से फ़्लाईट लेकर तुरन्त मेरे पास आ पहुंचे, और बिना मेरे कहे अगले 10 दिनों तक मेरे साथ रहे। अब जबकि मेरे माता/पिता जा चुके हैं, फिर भी मुझे मायके की कमी नहीं खलती, क्योंकि मेरे पास पवन और भारती हैं।

बात इससे बनती है कि मुश्किल वक़्तों में कौन आपके साथ रहा, तब, जब आप दुखी थे। मैं उनके साथ सहज महसूस करती हूँ। ऐसा नहीं कि आपका परिवार ऐसा नहीं हो सकता, बात ये है कि हर एक को थोड़ा हटकर सोचना पड़ता है। और ये मुमकिन है, मुश्किल नहीं।

स्वीकार करना बहुत ज़रूरी है। अगर आप उस व्यक्ति को चुनते हैं तो ऐसा नहीं है कि उसमें कुछ ग़लत नहीं होगा। लेकिन अगर आपने उन्हें चुन लिया है, तो आप उन्हें उनकी ख़राबियों के साथ स्वीकार करते हैं, जैसा कि आप अपने परिवार के साथ करते हैं जिसमें आप पैदा हुए हैं।

“मेरे माता/पिता और उनके दोस्तों ने आजीवन पड़ोसी बने रहने की क़सम ली है” – शेफ़र्ड*, 21

मेरे माता/पिता और अरुण मेशो और माशी (मौसा और मौसी) अपनी डॉक्टरी की पढाई के बाद के रिसर्च के दौरान US (यूनाइटेड स्टेट्स) में एक साथ थे। तब वो एक दूसरे के उतने क़रीब नहीं थे। मेरे माता/पिता मेरी पैदाईश के बाद पुणे वापस लौट गए थे और मेशो और माशी ने भी वैसा ही किया था जब शुभो पैदा हुआ था। उन्होंने एक ही यूनिवर्सिटी में नौकरी पाई और यूनिवर्सिटी के हाउसिंग सोसाइटी में 17 वर्षों तक एक साथ रहे। किसी एक मुक़ाम पर पहुँचकर, वहाँ रहने वाला हर व्यक्ति भविष्य के बारे में सोच रहा था और जायदाद खड़ी करने की ओर देखता था। तो सोसाइटी के चार या पाँच लोगों ने एक साथ जायदाद ख़रीदने और मकान बनाने का फैसला लिया। लेकिन मेरे पिता ने कुछ किफ़ायती खोजने के लिए क़दम पीछे खींच लिए। जब उन्होंने वो फैसला किया तो मेशो ने कहा, रतन दा जहाँ जाएँगे, मैं भी वहीँ जाऊँगा। उन्होंने एक साथ एक प्रॉपर्टी ख़रीदी, इसलिए दोनों ने मानो आजीवन एक-दूसरे के पड़ोसी बने रहने की क़सम ले ली थी। अपने एक-दूसरे से सटे हुए प्लॉट पर घर बनाने के लिए उन्होंने आर्किटेक्ट भी एक ही रखा।

शुभो (जिसे मैं अपना भाई मानती हूँ) – और मैं हर जगह उसके साथ जाती थी। बंगाली क्लास, स्विमिंग। भाई फोटा (भाई दूज) और रक्षा बंधन पर, उसे यहाँ रहना ही है। पर वो सबसे कठोर बात जो हम सबने सहन की, वो थी माशी की माँ की मृत्यु। क्योंकि उसके बाद हमने उनमें बदलाव देखे। माशी मेरी दादीमाँ के और क़रीब आ गईं, मेरी माँ से भी ज़्यादा। और जब वो भी चली गईं तो ऐसा लग रहा था कि माशी दोबारा अपनी माँ को गुज़रते देख रही हों।

 

अब जबकि हमलोग प्रवासी बंगाली परिवार हैं, जो बंगाल में नहीं रहता है, तो हमारे रिश्तेदार भी हमसे बहुत दूर हैं। इमेशो, माशी और शुभो जैसों ने उस रिक्त स्थान को भर दिया है। मैं सोचती हूँ  कि वो दोस्तों और संगी-साथी से आगे निकलकर परिवार-मित्र बन गए हैं। और परिवार का मित्र परिवार ही तो होता है।


* नाम बदल दिए गए हैं

 

 

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