मैं (कैसे) ख़ुद से मुहब्बत कर बैठी (और क्यों चाहती हूँ कि हर कोई ये करे )

-वसुंधरा 

चित्रण – भव्या कुमार 

कुछ समय पहले तक मैंने औरतों के हस्तमैथुन के बारे में बहुत कम पढ़ा था। जब पढ़ना शुरू किया तब मैं यह देखकर हाताश हो गई कि वहाँ मशवरे तो बहुत थे, बुत बहुत कम लोग वो बात कह रहे थे जो मैं अब कहने जा रही हूँ : वो यह कि मुझे हस्तमैथुन बेहद पसंद है और मैं सबसे कहूँगी कि वोभी इससे परिचित हों!

मैंने कामोन्माद को, एक दिन, १४ साल की उम्र में, ग़लती से पा लिया। उसके कई साल बाद तक मुझे पता नहीं था कि वो है क्या, लेकिन मैं जानती थी कि मुझे वो बहुत पसंद था और मैं अक्सर उसका अनुभव चाहती थी। हमने अभी-अभी नये घर में प्रवेश किया था और मेरे कमरे में बाथ टब और हॅण्ड शाॅवर थे। उस दिन, मेरे पैरों के बीच में पानी के प्रवाह के बल के सहयोग से मुझे मेरे भग-शिश्न के बारे में पता चला; और उस दिन से अब तक हम जिगरी दोस्त रहें हैं।

वहाँ से सफर आत्मज्ञान से लेकर ख़ुद से प्यार करने तक का रहा है (या ख़ुद के लिये काम-वासना करने का) और फिर वहाँ से गरमागरम यौन ज़िंदगी तक का। जब मैं बालिका थी, तब मेरी छोटी बहन और मैं एक कमरे में रहते थे। इसलिये जिन रातों मैं ‘ख़ुद को ख़ुश करने जैसा’ महसूस करती, मैं या तो लंबे अरसे तक बाथ टब में ख़ुद को डुबोती या फिर मेरी बहन के सो जाने की राह देखती, ताकि मैं बिस्तर में ख़ुद के शरीर को जान सकूँ। शरीर को यूँ टटोलना सिर्फ कामोन्माद महसूस करने के बारे में नहीं था। मैं यह सीख रही थी किख़ुद को कैसे हाथ लगाऊँ , यह समझ रही थी कि मेरे स्तन को हाथ में पकड़ना मुझे अच्छा लगता था और यह जान रही थी कि मेरी कमर और मेरे गरदन को हाथ लगाने से मैं बड़ी कामोत्तेजित होती थी। कभी कभी बात शरीर के बारे में भी नहीं थी। मैं बिस्तर में लेटी रहती, आँखें बंद करती और यह कल्पना करती कि मैं महारानी हूँ, या योद्धा, या डाॅक्टर, या संगीतकार, या मानो जो भी मेरा मन उस दिन बनने को चाहता; और एक हद से ज़्यादा कामातुर आदमी (जिसकी बहरहाल कोई शकल नहीं है) अनोखी जगहों में मुझे प्यारी चीज़े कर रहा है। मुझे याद है कि कैसे जो किताबें मैं पढ़ रही थी या टी वी कार्यक्रम देख रही थी उनमें से किरदार हमेशा मेरे सपनों में आकर ऐसी अद्भुत किस्म की कामुक बातें करते जो उनके निर्माताओं ने उनके लिये कभी नहीं सोची होंगी। जैसे जैसे मैं अपने मन को और मुक्त छोड़ने लगी, वो मुझे मेरे ख्वाबों का परिचय देने लगा।

लेकिन मेरी सबसे प्रिय खोज यह थी कि मैं ख़ुद को हाथ लगाए बिना भी कामोन्माद महसूस कर सकती थी, अपनी जांघों को हलके से एक दूसरे से मलने पर उन्माद हो जाता। मगर मैंने किसी को यह बात नहीं बताई, शायद मुझे लगा कि मैंने मानवी शरीर का एक ऐसा रहस्य ढूँढ निकाला था जो किसी और को नहीं पता था । उन दिनों मैंने आदमियों के हस्तमैथुन के बारे में घिनौने उल्लेख देखे और सुने थे; चुटकुलों में या कुछ बदतर किस्म की किशोरों के साथ बनीं ‘काॅमेडी’ फ़िल्मों में। लेकिन चूंकि किसी ने यह नहीं कहा कि एक औरत भी हस्तमैथुन कर सकती थी, मैंने यह समझा कि मैंने जो ढूँढ़ा था वो अनूठा, बहुमूल्य और सिर्फ मेरे लिये बना हुआ था।    

औरतों के कामोन्माद के औपचारिक अस्तित्व के बारे में मुझे कुछ सालों बाद पता चला। मैं मानती हूँ कि मुझे यह जानकर निराशा हुई कि मैं एक रहस्यमय ‘सुपरवुमन’ संगठन की सदस्या नहीं थी। लेकिन ऐसा लगता है कि सेक्स के समय कामोन्माद पहुंचने वाली औरतें अब भी (ख़ास) विशेषाधिकार प्राप्त अल्प संख्यक हैं, यानि गिनी चुनी हैं। इसकी तुलना में आदमियों के लिये यह एक सामान्य बात है।

मैं करीब १२ सालों से एक सुखद, संतुष्ट प्रेम संबंध में रही हूँ और हर बार जब हम सेक्स करते हैं, मैं कामोन्माद पा लेती हूँ; वो भी सिर्फ एक बार ही नहीं, कई बार! मैं मानती हूँ कि मेरा पार्टनर एक ध्यान देने वाला और संवेदनशील प्रेमी है। लेकिन मैं सच्चे दिल से हमारी काम क्रियाओं की राह देखती हूँ और हम एक दूसरे के शरीर का जो मज़ा लेते हैं, उसका आनंद लेती हूँ। यह दो बातें मुख्य कारण हैंहमारे सभी ( चलो, करीब करीब सभी) कामुक क्रियाओं का विशेष होने का। मैं अब भी अक्सर हस्तमैथुन करती हूँ; जैसे मेरी आम ज़िंदगी में मेरे अपने शौक़ हैं जो मैं अपने पार्टनर के बिना पूरी करती हूँ, उस ही तरह मैं अब भी, उसके सिवा, ख़ुद को शारीरिक रूप से उत्तेजित करने की भी ज़रूरत महसूस करती हूँ । मैं काम के लिये कई बार दौरे पर जाती हूँ। और वहाँ हाॅटेल के कमरे के स्वच्छ शुभ्र बिछौने जैसे मुझे आमंत्रित करते हैं। मैंने हस्तमैथुन ट्रेन में नींद ना आते समय किया है, और उस समय एकदम चुप रहने की ज़रूरत मुझे बड़ी रोमांचक लगती है। अब मैं हमारे बेडरूम में हस्तमैथुन करने में भी मज़ा लेती हूँ। उन दीवारों के बीच बीते हुए कामोन्मादों की यादें और आने वाले कामोन्मादों की राह देखना, यह दोनों ही ग़ज़ब किस्म के उत्तेजक हैं। पिछले शनिवार ही मेरे पति सुबह को मोटरसायकल चलाने बाहर गये और मैं बिस्तर में लेटकर ख़ुद को उत्तेजित करती रही। मैं हस्तमैथुन में इतना लुत्फ़ लेती हूँ कि मुझे लगता है कि अधिकतर महिलाओं को ऐसा ही लगता होगा।

मैं जब पिछले साल बॅंगकाॅक में मेरी सहेली की बॅचलरेट पार्टी में गयी थी तब मैं समझी कि अक्सर यह सच नहीं होता। हम सभी लड़कियाँ सालों से एक दूसरे को जानती थीं और हमने बहुत ज़्यादा शराब पी रखी थी। हम ‘नेवर हॅव आय एवर’ (‘मैंने कभी भी नहीं”)नाम का खेल खेल रहे थे। जैसे रात बीतती गयी, हमारी घोषणाएं और बेशर्म होती गयीं। सार्वजनिक जगहों में सेक्स से लेकर सेक्स करने के विचित्र आसन, हमने ऐसी बातें बतायीं जो शायद पहले कभी नहीं बतायीं थीं। लेकिन मुझे इस बात का आश्चर्य हुआ कि हमारे मदोन्मत्त अवस्था में भी, अधिकतम औरतें हस्तमैथुन के बारे में बात करने से शर्मा रहीं थीं। कुछ औरतों ने कभी अपने आप को स्पर्श नहीं किया था और दूसरों ने कहा कि उन्होंने वैसा किया तो था लेकिन उन्हें उसकी ‘ज़रुरत’ नहीं थी चूंकि वो प्रेम संबंधों में थीं। हम में से सिर्फ कुछ ने अपनी पी हुई हालत में हस्तमैथुन की प्रशंसा की।

ज्येष्ठ अभिनेत्री और नृत्य-निर्देशिका ज़ोहरा सेहगल ने ९७ साल की उम्र में कहा, ‘सेक्स ज़िदगी चलाने के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है। मैं अब भी सेक्स चाहती हूँ’। मेरी आशा है कि उस उम्र में मैं भी सेक्स चाहूँगी। मुझे लगता है कि एक संतोषजनक काम जीवन का हमारे प्रेमी और ख़ुद के साथ के रिश्तों पर बड़ा असर होता है। इसको हम जितना देना चाहिये उतना महत्त्व नहीं देते। हमें अपने पर हाथ लगाया जाना कैसे अच्छा लगता है और कैसे नहीं, इस बारे में बिना कोई रोक के बात कर पाना बड़ा आनंदायक होता है । ऐसा करने से एक ऐसा वातावरण बनता है जहाँ सेक्स के दौरान एक दूसरे से सक्रिय रूप से अनुमति पूछी जाती है और कुछ भी बिना पूछे नहीं किया जाता। मैं कत्तई नहीं कह रहीं हूँ कि हस्तमैथुन एक सुखद प्रेम संबंध के लिये जादुई दवा है, लेकिन उससे कुछ हद तक दोनों को समान अवसर मिलता है, जिससे बेडरूम के बाहर का नाता खुला और ईमानदार बनता है!! हम दोनों को अक्सर ‘लव बर्ड’ कहा गया है और हम पर सभी जगह ‘प्यार की गुटुर गू’ करने का आरोप लगाया गया है। यह इसलिये कि हम जैसे एक दूसरे के साथ पेश आते हैं उससे हम दोनों में शारीरिक और भावुक आत्मीयता साफ दिखाई देती हैं।

मुझे ‘सेक्स एण्ड द सिटी’ की समांथा जोन्स बेहद पसंद है। मेरे ख़याल से उस फ़िल्म में वो अपने प्रेमी स्मिथ से कहती है, ‘मैं तुम से प्यार करती हूं… लेकिन मैं ख़ुद से ज़्यादा करती हूँ। ४९ सालों से मेरा ख़ुद के साथ नाता रहा है और मुझे उस पर ध्यान देना है’। मैं मेरे प्रेमी को बिना किसीशर्त के प्यार करती हूँ लेकिन ख़ुद को उसी तरह प्यार करना – यह एक अलग ही बात है। मैं एक ऐसे वातावरण में बड़ी हुई जहाँ मुझे बिना बाँहों का टाॅप पहनने के लिये घरवालों का विरोध करना पड़ा, छोटी स्कर्ट पहनना तो दूर की बात थी – और मुझे चोरी-छिपे मेरे पैर शेव करने पड़ते। मुझे सिखाया गया था कि नेक लड़कियाँ अपने शरीर पर इतना ध्यान नहीं देती I लंबे समय तक मैंने मेरे शरीर की प्रशंसा और उससे प्यार सिर्फ एकांत में किया। ख्वाबों की दुनिया ने मुझे लंबे समय तक यह शारीरिक सुख यूँ महसूस करने दिये जैसे कि वो मेरे साथ नहीं,  किसी और के साथ हो रहे हों। यानी तब तक, जब तक मुझे यह सब नाॅर्मल सा लगने लगा।

मेरे लिये हस्तमैथुन अजीब तरह से मुक्ति पाने जैसा था; उससे मुझे यह बात ठोस रूप से समझ आयी कि मेरा शरीर सुंदर है और खुशी का हकदार है। अब जब मैं वयस्क हूँ, मुझे उससे कहीं ज़्यादा मदद मिलती है, खासकर तब, जब मैं अपने रूप रंग से असंतुष्ट होती हूँ, अपनी निंदा करती हूँ या फिर किसी असंभव तरीके से सुंदर देखने की कोशिश कर रहीं होती हूँ। हस्तमैथुन करते समय मैं मेरे शरीर की आलोचना नहीं करती ना ही उसे पसंद और नापसंद हिस्सों में विभाजित करती हूँ।

तनावपूर्ण दिनों में वो मुझे मानसिक रूप से भी शांत करता है और नींद आने में भी मदद कर सकता है। मालिश, या सॅलोन में दिन बिताना हमारे शरीर के प्रति प्रेम दिखाने का तरीका है। उसी तरह ख़ुद को ऐसी तरह से हाथ लगाना कि हम ख़ुशी से उन्मत्त हो जाएं ख़ुद की देख-भाल की महत्त्वपूर्ण युक्ति है। मेरा प्रेमी कभी कभार मज़ाक करता है कि अगर मैं ख़ुद को कामुक खुशी देने में निपुण हो गयी, मुझे उसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन सच इससे विपरीत है; मुझे मेरे शरीर के बारे में अच्छा लगना और मेरे शरीर को क्या अच्छा लगता है यह जानना, मुझे एक ज़्यादा कामुक व्यक्ति बनाता है। इससे मेरे प्रेमी के साथ सेक्स करने की चाह बढ़ती है। प्रशंसित कलाकार और देवी फ्रीडा कालो ने कहा, ‘मैं ही ख़ुद की प्रेरक शक्ति हूं, मैं वो विषय हूँ जो मैं सबसे अच्छे से जानती हूँ। वो विषय जो मैं और अच्छे से जानना चाहती हूँ’ और मैं कैसे इससे प्रेरित ना होऊँ।

वसुंधरा एक जोशीली डिवलपमेंट प्रोफ़ेशनल हैं, एक अनिच्छुक चार्टर्ड अकाउंटैंट और शिक्षण की दुनिया बदलने की ताकत पर विश्वास करती है। जब वो काम में व्यस्त नहीं होती, वो नये देश, नयी भाषाएँ और खाना खोजते हुए पायी जा सकती हैं।

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