बेकरारी उस मसाले का नाम है जो संभोग के भोग को स्वाद देता है

पूर्णिमा लक्ष्मेश्वर द्वारा 

चित्रण: डूडलनोमिक्स 

अनुवाद: तन्वी मिश्रा

बेकरारी एक मसाला है। इसकी महक आपको पास खींचती है, और इसे आपने अगर थोड़ा सा भी चख लिया, तो तृष्णा और बढ़ जाती है। बिना बेकरारी के आखिर प्यार है क्या? मेरे लिए, और  कुछ नहीं, बस दो इंसानों का ध्यान से अपनी इच्छाओं का विश्लेषण करते हुए, और लोगों के साथ सालों के अनुभव से बनायी हुई जांच-सूची को टिक करते हुए, भावनात्मक उलझाव के डर के साथ जीना है।

जब मैं ए.डी. को क्वोरा/quora पे मिली और उसकी पिछली पोस्ट्स को देखा, तो ऐसा लगा कि उसका अपने जीवन पे पूरा नियंत्रण था। जीवन की मुश्किलों के लिए उसके मापे हुए समाधानों को देखकर लगा जैसे वह चुनौतियाँ थीं ही नहीं। मुझे यूं लगा जैसे कि वह अपनी भावनाओं को उनकी नब्ज़ से पकड़ कर उन्हें तमीज से पेश आने के लिए कह सकता था। एक पल के लिए, मैं उसकी शुचिता को लेकर इतनी आश्वस्त हो गयी थी कि मुझे लगा वह लोगों की तकलीफों को समझता था और उन्हें सुलझाने के लिये कड़ी मेहनत करने के लिए तैयार था। सिर्फ एक सुनहरे दिल वाला आदमी ऐसा कर सकता है, है ना? मेरी दिलचस्पी इस बात से और भी बढ़ गयी कि अपनी उम्र में (मुझसे ९ साल कम), वह जानता था कि उसे क्या चाहिए, जबकि मेरे ख्यालों की गाँठ को खोलने के मेरे संघर्ष हमेशा विनाशकारी फैसलों के रूप में तब्दील होते थे।

तो मैंने उसको फॉलो किया और उसने मुझे, और फिर हमारी बातचीत मैसेंजर पर होने लगी जहाँ हम सिर्फ सेक्स की बात करते थे, बिना लालसा के, बिना प्यार का एक नशा होने वाली थिओरी के, बिना उसके साथ जुड़े भावनात्मक भारीपन के। सिर्फ कामुकता, बिना सेंटिगिरि के मस्के के।

जब उसने कहा “इस दुनिया में कुछ भी अविभाज्य नहीं है”, तो मेरा दिल टूट गया। ‘वियोग’ एक ऐसा उदास करने वाला शब्द है जिससे मैं दूर भागती आ रही हूँ और ऐसा लगा कि ए.डी. मुझे प्रौढ़ होने के लिए मनाने का मन बना चुका था।

उसका फोकस था एक कवी जैसे के साथ सेक्स करना (मतलब मेरे साथ) और मेरा लक्ष्य था उसके भावनात्मक बाधाओं को गिराना,  इसके पहले कि वह मेरे सीमावर्ती क्षेत्रों की सीमाओं पार लांघ सके। वह मुझ में अपनी भावनाओं का निवेश क्यों नहीं करना चाहता था?

“मैं पहले ही अपने हाथ जला चुका हूँ, दो ऐसे रिश्तों में जो बस शादी में तब्दील होते-होते रह गए। दिल को इतना दर्द पहुंचाने का मतलब नहीं बनता। तो मैं तुमसे सिर्फ बढ़िया सेक्स की उम्मीद रखता हूँ, और कुछ नहीं।”

जब मैंने पूछा कि मैं ही क्यों, “पहले तो इस लिए क्योंकि तुम एक लेखिका हो तो मैं उम्मीद कर रहा हूँ कि तुम मेरे बारे में कोई नैतिक राय नहीं बनाओगी (काफी कड़क तर्क)। और क्योंकि मैंने तुम्हारे लेख पढ़े हैं, ऐसा लगता है कि तुम एक आवेशपूर्ण व्यक्ति हो।”

लेकिन मैं जानती थी कि वह मुझे इस लिए चाहता था क्योंकि मैं शादीशुदा थी, ‘कूल’ थी और बेशक ‘अनुभवी’ थी। उसने गणित की कि मेरे अपने प्रतिबंध मुझे किसी तरह के भावनात्मक उलझाव में फंसने से रोकने वाले थे। वो उम्र में इस लिहाज़ से छोटा ही था कि ये समझ पाए कि कैसे मुझे एक गुल्लक (सेविंग्स बैंक) चाहिए था जो मेरी भावनाओं की पूँजी को समेट सकता था, बिना दुनिया के सामने उनका प्रदर्शन किए। उसकी पहले से निर्धारित की हुई सावधानी का मतलब था कि वह लालसा और प्यार के साथ आने आने वाला वो बेरोक गिरने का अहसास, और मन को झंझोर देने वाली ऊंचाइयों का मज़ा चखना ही नहीं चाहता था, जो प्यार और बेकरारी के साथ आते हैं – लुत्फ उठाने लायक स्वाद, नाकि प्रतिबद्धता का संकेत।

लेकिन मैंने सोचा क्यों ना इसे आज़माया जाए। मैं फ़्लिंग-इंग (सेक्स के आधार पर बना रिश्ता) के खेल में नयी थी। यह एक मज़ेदार खेल है जिसमें जैसे ही भावनाएं आपकी कामुकता को रास्ता दिखाने लगती हैं, खेल ख़तम करना अनिवार्य हो जाता है। फ़्लिंग मतलब अपने पार्टनर को बदलना, और नए तरीकों और तौर को आज़माना, उनकी खोज करना। लेकिन मेरा मुद्दा यह था कि मैं एक ‘कनेक्ट’ (संबंध/संपर्क) की तलाश में थी, वह ठेठ बॉलीवुड स्टाइल वाली चिंगारी जहां कोई धुन बजने लगती है और आपका दिल हिचकोले खाता है।

शायद एक डुएट की संभावना? मैं हर बार कामोन्माद तक पहुँचने तक सीमित नहीं रहना चाहती थी (जबकि ऐसा होता तो मुझे अभूत आनंद होता) लेकिन मैं वह भावनात्मिक तीव्रता भी चाहती थी जिससे यह सब और कीमती बन जाता।

मैं ए.डी. से उसकी ध्यान से पाली हुई विरक्ति की वजह से नफरत करती थी लेकिन उससे मिलती हुई उन चंद घंटों की आज़ादी की वजह से उसे चाहती भी थी। साथ में कुछ सिगरेट्स, शराब और ज़ाहिर सी बात है, कामोन्माद। यह चीज़ें  मेरी प्राथमिकता थीं। हाँ, सही तरीके से करी हुईं। उसके साथ मेरा कभी प्यार-कभी तकरार वाला रिश्ता मेरी ऊपरी समझ के बाहर था। एक तरफ जहाँ मुझे इस बात से आनंद मिलता था कि वह हर बार मुझे देख कर हिल जाता था, वहीँ मुझे उससे नफरत थी क्योंकि वह मेरे नज़रिये को बदलने की कोशिश करता रहा था। वह अपनी लैंगिक प्राथमिकताओं के बारे में स्पष्ट था लेकिन मैं फिर भी उससे एक भावुक निरुपा रॉय की तरह चिपकी रही, अपनी भावनात्मिक तीव्रता को छोड़ने के लिए बिलकुल नामंज़ूर।

फिर वह वापस क्यों आता रहा? बेशक मैं सेक्स की कला में निपुण थी और वह एक कारण रिश्ते की कई कमियों की

भरपाई करने के लिए काफी है। सेक्स एक अजीब तरह से अंतरंग भी है, खासकर जब नफरत और प्यार का अनुपात एक अजब गुणोत्तर में हो।

फ़्लिंगिंग की लत इस लिए लगती है क्योंकि यह हल्का है – वही इसकी खासियत है। यह इतना आसान है कि लगता है जैसे आप अकेले सफर करते हुए आज़ादी में साँस ले रहे हैं और अपनी मनपसंद जगहों की तरफ भटकते हुए पहुँच रहे हैं। लेकिन बिना लालसा के, यह मुझे थोड़ा बेतुका लगता है। आप अपने पसंदीदा फ़ूल की खुशबू को साथ लिए चलते हैं लेकिन आप इस खुशबू को ज़्यादा देर तक महकने/ठहरने की अनुमति नहीं देते हैं।

मैं ए.डी. से सिर्फ एक ही सवाल पूछती – “तुम अपने आप को किसी से पागलपन वाला प्यार क्यों नहीं करने देते? दिल टूटने के बाद जो दर्द होता है, क्या वह इतना बुरा है? क्या इससे यह नहीं मालूम होता कि हम कितनी आसानी से चोट खा सकते हैं ? क्या फोन पे कुछ हसीन पल या फिर शानदार सेक्स कभी इनमें से किसी भी भावना की जगह ले सकते हैं?”

वह कहता कि मैं पुराने ख्यालात रखती थी। कि मैं अब भी अप्रचलित आमने-सामने होने वाली बातचीत, हाथ से लिखे हुए लम्बे खत, क्लासिक्स के पन्नों में गुलाब की पंखुड़ियों को संभाल के रखने और रिकॉर्ड प्लेयर पर पुरानी धुनों को चुनने में विशवास और इन तरीकों से गहरा लगाव रखती थी। इसलिए उसकी आवाज़, उसकी छुअन, उसके अल्फ़ाज़ों के लिए तड़पने का कोई मतलब नहीं बनता था – यह सब तो यार पुराने तौर थे। अगर मुझे लगता कि मेरे अंदर बेकरारी पनप रही थी, तो मुझे या तो उस रिश्ते को वहीँ पे ख़त्म करना चाहिए  या किसी और को फ़्लिंग करने के लिए ढूंढना चाहिए। शायद मैं फ़्लिंगिंग के इन विनिर्देशों के हिसाब से नहीं बनी थी। अभी भी मुझे प्यार में पड़ना अच्छा लगता है ठुकराए जाने पर अपने सम्मान को चोट पहुंचने, और जब मुझे प्यार को छोटा हिस्सा भी मिले तो उसका जश्न मनाने  के ख्याल मुझे पसंद हैं। तो अगर सेक्स एक शानदार दावत हो, तो ये बेकरारी, ये तृष्णा ऐसी सामग्री है जिसे मैं उसमें डालना कभी ना भूलूँ। मैं उसका मज़ा उठाऊँ बिना किसी और महत्वपूर्ण स्वाद को भूले जो मेरी इस भूख को और भी बढ़िया महसूस करवाए और मेरी लालसा को बढ़ाए, बिना कैलोरी को गिने। मैं इस सब का हिसाब नहीं रखना चाहूंगी और प्यार करने के पूरे अनुभव को एक ऐसी शानदार दावत बनाना चाहूंगी जिसका मज़ा मैं आखरी निवाले तक उठा सकूं।

लेखिका के बारे में: पूर्णिमा लक्ष्मेश्वर ‘गार्डन सिटी’ में निवास करती हैं और अपनी जीविका एक कंटेंट राइटर की भूमिका निभाते हुए कमाती हैं।

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