जुगनी के गीत: यानी आज़ादियों के सफ़र करती हुई चिंगारियाँ

उमंग सबरवाल  द्वारा

अनुवाद मिहीर सासवडकर

जब मैं बच्ची थी, मुझे लगता था कि सेना के जिस कैंपस में मैं रहती थी उसके बाहर, किसी प्रौढ़ व्यक्ति के बिना जाना, आज़ादी होगी। कॉलेज में, मेरे माता पिता को यह बताना ज़रूरी न होना कि मैं कहाँ जा रही हूँ, और कितने बजे लौटूँगी एक अत्यावश्यक आज़ादी जैसी लगती। अब जब कि मैं आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिला बन गयी हूँ, मैं आज़ादियों को और भी मूल्यवान समझती हूँ और उन्हें ढूंढ़ती हूँ: घूमने की आज़ादी, चुनने की आज़ादी, बोलने की आज़ादी।

आज़ादी का कोई निर्धारित पता नहीं होता।

उसके अर्थ लगातार बदलते रहते हैं, लगातार सरकते रहते हैं ,वाह !!। जुगनी एक ऐसी हस्ती है जिससे मैं तब ‘मिली’ जब मैं आज़ादी को एक संकल्पना के रूप में देखने लगी थी, ना सिर्फ़ मेरी किसी एक पल की ज़रुरत। पंजाबी गानों में जुगनी को लेकर कई मान्यताएँ और कहानियाँ हैं। हिंदी बोलने वाले अधिकतर लोगों जैसे मुझे भी यही लगता था कि जुगनी शब्द का अर्थ एक मादा जुगनू था। टिमटिमाते हुए दियों के छोटे कण, जो बारिश के बाद आते हैं, जो बंद घरों से ज़्यादा जंगल में अच्छे दिखते हैं।

बाद में मुझे पता चला कि जुगनी की पंजाबी लोक संगीत और गानों में जड़ें और भी गहरी हैं। कुछ लोगों का कहना है कि गानों की इस प्रथा का आरंभ १९ वी सदी की शुरुआत में हुआ, पंजाब में ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ उपद्रव के दौरान। सूफ़ी विचारधारा में, जुगनी एक नारी सुलभ आत्मा है, जो अक्सर ख़ुदा (जिसे आशिक़ भी बुलाया जाता है) का प्रचार करती है, और अक्सर उन्हें खोजती हुई पाई जाती है। और नए वर्णनों में – लोकप्रिय संगीत, शादी और फिल्मों के गानों में – जुगनी एक जवान लड़की का रूप लेती है।

जैसे हम ज़िंदगी जीते हैं, आज़ादी की नई प्रतिमाओं और परिभाषाओं का निर्माण करते हुए, जुगनी भी हमारे साथ रूप और परिभाषा बदलती रहती है, लेकिन हरदम एक घुमक्कड़, रूढ़िमुक्त, नारी सुलभ ऊर्जा का प्रतीक प्रस्तुत करती हुई, जो, जहाँ भी वह जाती है, आज़ादी की चिंगारी जलाती है- फ़िर लोग जो चाहें, समझते रहें।

स्वतंत्रता दिवस के दिन, जब हम आज़ादी के अर्थों पर ग़ौर करते हैं, यह रहे जुगनी संबंधी कुछ विचार, ।

ब्रिटिश शासन से आज़ादी

सन १९०६ में, ब्रिटिश उपनिवेशी शासकों ने क्वीन विक्टोरिया की हुकूमत की ५० वी सालगिरह या सुवर्ण जयंती अलग अलग गाँवों में एक जुबिली मशाल भेजकर मनाई थी। मौखिक इतिहास में इस किस्से के एक विवरण में दो टप्पा गायक, रोला और जोगा, इस जुबिली (मशाल) के बारे में, (कहानी के अनुसार उन्होंने ‘जुबिली’ का उच्चारण ‘जुगनी’ किया था), व्यंगपूर्ण गाने गाने लगे। दूसरा वर्णन कहता है कि बिशन और मंडा, इन दो कवियों को ब्रिटिश ने देशद्रोह के लिए फाँसी पर चढ़ाया चूँकि उन्होंने उस ही प्रकार के राजनितिक रूप के विध्वंसकारी गाने गाए । इन वर्णनों ने पंजाब की आम जनता के पीड़ाओं के बारे में बात की, तब, जबकि शासकों की प्रशंसा की जा रही थी, उन्हें लेकर जश्न मनाया जा रहा था।

जुगनी जा वर्हि मजीथे

कोई रन ना चक्की पीथे

पट गाभरू मुलक विच मारे

रोवन अखियाँ पर बुल्ह सी सीते

पीर मेरेया ओये जुगनी आयी आ

एहनान केहर्ही जोत जगाए आ  

जुगनी ने मजीठा पर हमला किया

उधर चक्की पर कोई भी न था

धरती के लाल मर रहे हैं

होठों को बंद रखना ज़रूरी है पर हमारी आँखें बह रही हैं

हे ईश्वर, जुगनी हमारे पास आई है

और क्या चिंगारी, क्या ज्वाला हम में जगाई है

ख़ुद की, अंदर से आज़ादी

जुगनी सूफ़ी गानों में जानी पहचानी हस्ती है। मेरे दिल के सब से करीब है नूरण बहनों का एक मज़ार पर जुगनी पेश करना। इस गीत के आख़री बोल कुछ ऐसे हैं “आप जो ढूंढ़ रहे हो वह सारे समय आप ही के संग रहा है”। ऐसा लगता है कि उस आवाज़ को ढूंढ़ पाना, अद्भुत आज़ादी जैसे होगा।

वे बोल दे दी तैनू खब्र नायिओं, वे सजना!

जेहदा नित्त तेरे विच बोल्दा ऐ

ढूंडे बाहर जाकर लब्भे घर आके

ओ मेरे प्रिया, बोलने वाले पर तुम्हारा ध्यान नहीं

वह जो हर दिन तुम्हारे अंदर बात करता है

तुम बाहर ढूँढ़ते हो, जब कि वह तुम्हारे अंदर बसा है

विद्रोह में आज़ादी

१९५५ के करीब जुगनी लोक प्रिय पंजाबी लोक संगीत और शायरी में एक साहसी स्त्री जैसे उभर कर आई, जिसे पुरुष गायक दूर से डर, प्रशंसा और शायद कुछ आश्चर्य के साथ देखते थे। वह लड़को के साथ टेनिस खेल रही है, मेक अप पहनी हुई, और सिनेमा जा रही है। वह नए ज़माने की सर्वोत्कृष्ट लड़की है, अपने समय की एक आश्चर्यजनक, असाधारण हस्ती। और नए गानों में, वह विमान उड़ाती है और हाथ में डंडा, हथियार जैसा लिए सीना तान कर खड़ी रहती है। एक औरत होने के नाते, मुझे लगता है कि जुगनी का यह रूप सबसे ज़्यादा रोमांचक है। यह जुगनी अविरल और ढीठ है, अपनी आज़ादी बेझिझक स्वीकारती है और इसलिए लोगों की ईर्ष्या का पात्र भी बनती है। वह दूर की जगहें घूम आती है, वह स्टाइलिश है और मज़ेदार भी। इन दिनों, जब औरतें ख़ुद के शरीर को लेकर, ख़ुद के निरुपणों को लेकर और जिन जगहों में वह जा सकती हैं इन सबसे संबंधित आज़ादियों से जूझ रही हैं, जुगनी का यह रूप आशा और आत्मविश्वास दिलाता है।

जुगनी फैशन दी मतवाली

थप्पे पाउडर, लावे लाली

टिड्डों पुखी, जेबों खाली

वीर मेरेया वे जुगनी

वीर मेरेया वे जुगनी बैंदी नी

ओ गल किस्सी दी सेहेंदी नई

जुगनी फैशन की पक्की है

जो पाउडर, लाली पहनती है, दिखती कितनी अच्छी है?

खाली जेब, खाली पेट

पर ओ मेरे भाई, जुगनी

एक क्षण भी स्थिर नहीं बैठेगी

आप जो उसे कहते हो वह बर्दाश्त नहीं करेगी

सत्ताधारियों को चुनौती देने की आज़ादी, टिप्पणी करने की आज़ादी

जुगनी के अस्थायित्व का एक महत्त्वपूर्ण और स्थायी गुण यह है कि ज़्यादातर गाने जो जुगनी कहाँ जा रही है उसके बारे में बात करते हैं, उनमें ‘जा वर्हि’ शब्दों का प्रयोग है,  यानी कि जुगनी धावा बोलती है। जुगनी बिना किसी से पूछे यहाँ वहाँ जाती है। उसका यूँ जाना हिंसा या उल्लंघन के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यहहौसले और निश्चय के साथ अलग जगहों में प्रवेश करना है, ऐसी जगह जहाँ शायद प्रतिबंध लगे हों। पंजाबी कवि उसके आस्थायित्व के ज़रिये उन जगह गए हैं जहाँ वह सच में या रूपात्मक तरीके से जा नहीं पाते। इसका एक हाल ही का उदहारण है रब्बी शेरगिल की जुगनी  

जुगनी वा वादी कश्मीर ….

जिथे रोज़ मरन दस वी ….

सोनी बहना ते सोने वीर ….

ऊ रो रो पूछना ….

के जघदा ताई मुखना ….

जेदो झेलम पानी सुखना ….

जुगनी कश्मीर में आंधी जैसे जा पहुंची

जहाँ रोज़ सैकड़ो लोग मरते हैं

प्यारी बहनों, प्यारे भाइयों

रोते हुए वह पूछती है

क्या यह लड़ाई सिर्फ़ तब ख़त्म होगी

जब झेलम सूख जाएगी?

भटकने की आज़ादी

अस्थायित्व जुगनी का मूल स्वरूप है, उसका लगातार फिरते रहना उसकी उस आज़ादी का प्रतीक है, जो उसके रूप का सबसे यादगार हिस्सा है। पटाख़ा गुड्डी, हाईवे फिल्म में इरशाद कामिल का जुगनी गाना, इसमें हम यह अस्थायित्व करीब करीब महसूस कर सकते हैं।

मित्थे पान की गिलौरी

लट्ठा सूट का लाहोरी

फत्ते मारती फिल्लौरी

जुगनी मेह्ल मेह्ल के

कूड़ फाँड़ के

चक्क – चकौदे जावे…

मीठे पान का एक टुकड़ा

लाहोरी रुई के सूत का सूट पहने हुए

फिल्लौर के जंगल जैसी मज़बूत

जुगनी बढ़ रही है

झूमती हुई

नाचती हुई

निडरता से…

और जैसे गाने में है, चली चली चली – वह निकली! वह जा रही है, वह चलती जा रही है। वह एक अविरल चलने वाली शक्ति है, जो शर्मिंदगी महसूस करने के लिए या परिणाम सोचने के लिए नहीं रूकती, जिसकी आत्मा पवित्र है और जिसकी ख़ुद के प्रति ज़िम्मेदारी भी पवित्र है -वो भी अपने कहने से, शासनादेश जो भी हों।

जुगनी के बारे में सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह आज़ादी को किसी साँचे में सिमटाकर नहीं रखती। वह इस सिद्धांत की प्रतिनिधि है जो कहता है कि आज़ादी कभी सिर्फ़ कोई एक चीज़ नहीं हो सकती जो बस कोई एक दृष्टिकोण या जगह ही तय करे। या चाहे वह राजनीतिक, सामाजिक या व्यक्तिगत हो, आज़ादी एक ऐसा दायरा है जो हम पार करते रहते हैं, एक ऐसा पहाड़ जो हम चढ़ते जाते हैं, एक क्षितिज जिसकी ओर हम बढ़ते जाते हैं।

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