क्या बच्चों को ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ सिखाना उन्हें अपने बदन से संबंधित मर्ज़ी के बारे में जानने समझने में बाधा डालता है?

सेक्सुअलिटी – यानी कामुकता, लैंगिकता और सम्बंधित विषयों-  पर काम करने वाली शिक्षक, इस बात पर ग़ौर करती है कि हमारा मुख्य फोकस तो हमारे बदन पर अधिकार बढ़ाने पर होना चाहिए ऐसा न करके जब हम अपना सारा ध्यान यौन दुर्व्यवहार और उत्पीड़न पर लगा देते हैं तो हम उस पूरे टॉपिक को बस इन दो चीज़ों तक सीमित रखते हैं तो जो हम करने निकले हैं, उसको खुद ही सीमित कर देते हैं

श्रीनिधि राघवन द्वारा लिखित

चित्रण: @theworkplacedoodler

मिहीर सासवडकर द्वारा अनुवादित

कुछ महीनों पहले मैं मेरी सात साल की भतीजी से बातचीत कर रही थी। उसने मुझे बताया कि उसके स्कूल ने उसे “गुड टच” और “बैड टच” की जानकारी दी थी (‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ यानी सही छुअन / गलत छुअन)। स्पर्श या टच, सेक्स, रोमांस और बदन संबंधित मरज़ी के बारे में मैं नियमित रूप से बात करती हूं। इसलिए मैंने उससे पूछा कि उसने क्या सीखा था। उसका जवाब आश्चर्यजनक नहीं था। उसने संक्षेप में कहा कि अगर कोई भी उसके प्राइवेट पार्ट्स को हाथ लगाता तो वह बुरा था और और ये कि ‘कुछ’ परिवार वालों और बाहरवालों द्वारा किसी भी तरह से छुआ जाना बुरा था। उस बच्ची के  हितकारी टीचर के द्वारा दिए गए उदाहरणों में दिखाया गया था कि पुरुष युवतियों को परेशान कर रहे थे और उन्हें अपना शिकार बना रहे थे। इस शिक्षण का परिणाम यह हुआ कि वह अपने दादा को अपने पाँव छूने से मना कर रही थी और नहाते समय अपनी दादी को उसे छूने की इजाज़त नहीं दे रही थी।

मुझे याद है मैंने अपनी भतीजी से पूछा था कि, “अगर मैं तुम्हें छूती हूं, तो तुम क्या महसूस करती हो?” वो उलझन में पड़ गई। उस दिन से लेकर आज तक टच और बदन से संबंधित मरज़ी पर मैंने उनके साथ कई बार खुली चर्चा की है। आज भी वो मेरे इस सवाल से जूझती है। उसे सिखाया गया था कि “अजनबियों का उसे छूना” बुरा था और “जान पहचान के लोगों का उसे छूना” ठीक था। इन दो विचारों के साथ भी वह जूझ रही थी।

मैं समझ सकती हूँ कि शिक्षक और माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे सुरक्षित रहें।कि सुरक्षित रहने के लिए बच्चे   अलग अलग प्रकार के टच के बारे में सीखें। लेकिन मुझे वाकई में लगता है कि “गुड टच” और “बैड टच” के बारे में दोबारा सोचना ज़रूरी है।

बाल यौन दुर्व्यवहार/ चाइल्ड सेक्स अब्यूज़ को रोकने पर मेरा पहला सेशन मैंने छह साल पहले किया था। मेरी भतीजी की उलझन देखकर मुझे वो सेशन याद आया। “गुड” टच और “बैड” टच के बारे में तब भी मैंने वही बातें दोहराई थीं जो अब बताईं जाती हैं। चाइल्ड सेक्स अब्यूज़ के इर्द-गिर्द हमें दी गई जानकारी ज़्यादातर इन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करती है। इसलिए वही की वही बातें दोहराना आसान था। सेशन ख़त्म करने के थोड़ी देर बाद जब मैं अपनी बैग पैक कर रही थी, तब लगभग १० साल की एक छोटी लड़की मेरे पास चली आई। वह बैड टच का मतलब जानना चाहती थी और यह कि वो कैसे जाने कि कोई उसे अनचाहे तरीक़े से स्पर्श कर रहा था। उसके चेहरे पर उलझन स्पष्ट थी। मुझे नहीं लगता कि मैंने उसे संतोषजनक जवाब दिया। ऐसा जवाब जिसमें आशा की झलक भी हो ।

आज, कई वर्षों बाद भी, मैं साफ़ साफ़ समझा नहीं पाती हूँ कि मुझे क्यों इन शब्दों का इस्तेमाल नापसंद है । लेकिन मैं कोशिश करूंगी।

पहली बात तो “गुड” टच क्या है? और “बैड” टच क्या है? कोई बच्चा इन दोनों में अंतर कैसे जाने? हम उन्हें ये फर्क कैसे समझाएं? हम उनके हाथ में सही गलत का अपना एक नुस्खा तो नहीं थमा सकते। ना बहुत मोटे तौर पर ये बात कह कर छोड़ सकते हैं । तो फिर क्या किया जाए ?

जिस तरह हम गुड टच और बैड टच की वकालत करते हैं मुझको डर है कि एक बच्चा ये सोचने लगेगा कि उसके गुप्तांगों को किसी भी तरह से छूना उत्पीड़न होता है ।ये भी कि वो किसी भी तरह की छुअन को ‘बैड टच’ से जोड़ने लगेगा । इस तरह बातों के जुड़ने से कई बच्चे कंफ्यूज हो जाते हैं  । ये कन्फ्यूषन मैंने उन बच्चों में देखा है, जिनके साथ मैंने काम किया है या जिनसे बात की है । छुअन और उत्पीड़न को जोड़ने से बच्चे कंफ्यूज हो जाते हैं, भला ही आप वो बात बहुत मोटे तौर पर कह रहे हों ।

दूसरी बात- अक्सर जो लोग बच्चों का उत्पीड़न करते हैं, वो अक्सर उनके पहचान के लोग होते हैं। तो फिर इस सन्दर्भ में बच्चों जो “जाने हुए लोग” और ‘अनजान लोग ‘ के फर्क को सिखाना बहुत फायदेमंद नहीं है ।

तीसरी बात, यह पता लगाना कठिन है कि जो टच बच्चे को नापसंद है, उसके प्रति उस बच्चे की प्रतिक्रिया कैसी होगी। कभी कभार कोई जाना पहचाना शख़्स इस तरह बच्चे को टच कर सकता है। या ऐसे भी हो सकता है कि कोई शख़्स किसी बच्चे के साथ वक़्त बिताकर उसे आरामदायक महसूस करवाता है ताकि फिर वो बच्चे का सेक्स अब्यूज़ कर सकें। इन स्थितियों में हो सकता है कि बच्चा उस टच को “बैड” टच का दर्जा ना दे सकें। जब किसी बच्चे के साथ अब्यूज़/ उत्पीड़न किया जाता है तो बच्चा उसपर खुद शर्मनाक हो जाता है, बहुत गहरे तरीके से उस शर्म को महसूस करता है और इस भावना को अंदर दबाकर रखता है। अब अगर उस टच को बड़े लोग ‘बैड टच’ का नाम देते हैं, तो हो सकता है बच्चा शर्म को और भी महसूस करने लगेगा, अपने को अपराधी मानने लगेगा । ऐसा हो सकता है कि उस ‘गलत’ छुअन मेंउसे  कुछ आनंद भी मिला हो, और इस ‘सही गलत ‘की भाषा से उस बच्चे की सोच और भावनाओं पर एक कोहरा सा बैठ जाएगा । उसका कामुक और मनोवैज्ञानिक नज़रिया पेचीदा बन सकता है।

मेरी राय में जब हम गुड और बैड टच जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं तो ऐसा लगता है कि हम एक नैतिक फैसला सुना रहे हैं। हहमारे शब्द जैसे बड़ी आसानी से ये बताने लगते हैं कि किस बात से आनंद मिलना चाहिए, किससे नहीं, क्या हिंसक है, क्या नहींl इस तरह के सही गलत वाले नैतिक ढांचे आमतौर पर मददगार नहीं होते हैं। क्या कामुक रूप से किए गए सभी टच ‘बैड’ होते हैं? और अगर वो‘बैड’ होते हैं तो क्या हमें उनसे कभी ख़ुशी नहीं मिलनी चाहिए? अगर कोई अजनबी हमें छूता है, तो क्या अपने आप हमें असहज महसूस करना ज़रूरी है, बावजूद इसके कि वो स्पर्श कामुक नहीं है? इससे सेक्स पर हमारा कैसा दृष्टिकोण बनता है?

और तब क्या किया जाए जब १६ साल के एक बच्चे के प्राइवेट पार्ट्स को हाथ लगाया जाता है और उसे वह पसंद आता है? चूँकि कानून कहता है कि वो अभी प्रौढ़ नहीं है क्या हमें ऐसे बर्ताव को अब्यूज़/उत्पीड़न कहना चाहिए? या चूँकि बच्चे को वह अनुभव पसंद आया उस टच को अब्यूज़ नहीं कह सकते? इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं, वास्तव में वे संदर्भ पर निर्भर हैं। जितनी बातचीत करनी चाहिए, उतनी करते नहीं, ठीक उसी तरह जैसे हम सेक्स पर बात नहीं करते।

और जो टच समाज स्वीकार नहीं करता उनका क्या? हस्तमैथुन का उदाहरण ले लीजिए। इस प्रकार का टच उन किशोरों के लिए आनंददायक हो सकता है जो अपने शरीर की खोज करना शुरू कर रहे हैं। लेकिन अक्सर हस्तमैथुन करना गलत माना जाता है और उसे भी ‘बैड टच’ का दर्जा दिया जाता है। यौन सुख के बारे में तो ना के बराबर बात की जाती है। और यौन स्पर्श भारी मात्रा में शर्म से बंधा हुआ है। इस संदर्भ में इस बात पर ग़ौर करना ज़रूरी है कि गुड टच और बैड टच जैसे शब्दों का उपयोग करना कितना उपयोगी है। हमें सोचना होगा कि ऐसे उपयोग से क्या फ़ायदे से ज़्यादा नुक्सान हो रहा है? स्पष्ट रूप से कहना हो, तो क्या बच्चों को दी गई गुड टच और बैड टच की शिक्षा अधूरी है? विस्तृत कामुकता की शिक्षा ना होने पर गुड टच और बैड टच की शिक्षा का बच्चे को क्या फ़ायदा होता होगा?

तुलिर नाम की संस्था चाइल्ड सेक्स अब्यूज़ रोकने में काम करती है। २००९ में, वह इस बात की वकालत करने लगी कि बच्चों के साथ टच और अब्यूज़ के बारे में बात करने की परिभाषा हमें बदलनी चाहिए। वे चाहते हैं कि इस बात पर बच्चों से चर्चा “सेफ़ टच”, “अनसेफ़ टच” और “कन्फ्यूज़िंग टच” जैसे शब्दों से शुरू की जानी चाहिए। इस प्रकार जब भी किसी बच्चे को टच किया जाता है, तो उस टच के बारे में बच्चे की समझ गुड और बैड जैसे निर्णायक ढांचों में नहीं डाली जाती। मैं अब समझ गई हूं कि यह नई टर्मिनॉलॉजी पुरानी टर्मिनॉलॉजी से और प्रभावशाली है – बच्चे और आसानी से यह तय कर सकते हैं कि वे सुरक्षित महसूस करते हैं या नहीं। और ऐसा भी नहीं होता कि अब्यूज़/उत्पीड़न की वजह से बच्चा यह समझने लगे कि वह ख़ुद बुरा है। मुझे यह दृष्टिकोण अधिक विस्तृत और उपयुक्त लगता है। लेकिन चूँकि इसमें बच्चे को तय करना पड़ता है कि उसके साथ अब्यूज़ हुआ है या नहीं, बच्चा दबाव में आ सकता है। हमारा सारा ध्यान और हमारे सभी डर हम बच्चों को अब्यूज़ से बचाने पर केंद्रित करते हैं। इसके बजाय टच के बारे में अपनी बातचीत को गहरी और विस्तारित करने के लिए हम क्या कर सकते हैं, मैं उसपर ग़ौर करती हूँ।

मुझे ये लगने लगा है कि मैं सात साल जितनी कम उम्र के बच्चे के साथ भी मरज़ी के बारे में बात करूँ। मुझे नहीं लगता कि कई लोग इस बात को स्वीकार करते हैं, क्योंकि उनका ध्यान बच्चों की सुरक्षा पर केंद्रित होता है। वे बच्चों के आसपास के वातावरण को नियंत्रित करने के बारे में चिंतित हैं – और अक्सर, स्वयं बच्चों को नियंत्रित करने में भी। मैं यह नई राह इसलिए नहीं चुनती हूं चूंकि वह आसान है, लेकिन इसलिए कि उससे बच्चे की स्वयं की पहचान और मज़बूत होती है। जब हम किसी बच्ची को सिखाते हैं कि जब वो ना कहता है तो किसी बड़े तो भी उसकी बात माननी होगी, तो बच्चे को एक रास्ता मिलता है।  वो ऐसे व्यवहार सीख पाता है जो हाँ -ना और उन समझौतों या सौदों में काम आता है, जो हर एक को बड़े होकर करने पड़ते हैं । इनमें कामुक समझौते भी शामिल हैं ।

संक्षेप में, यह बच्चे की मरज़ी को मज़बूत करता है, और उम्मीद है कि उन्हें ख़ुद की देखभाल करने के लिए और सामर्थ्य मिलता है।

अब्यूज़ पर बातचीत अक्सर बच्चे की सुरक्षा के साथ शुरू और ख़त्म होती है। लेकिन मरज़ी पर बातचीत आजीवन चलती है। यह बातचीत कम उम्र में शुरू होती है और अनिश्चित काल तक चलती है। हम बच्चे को ना सिर्फ़ “प्राइवेट पार्ट्स को छूने” के बारे में सिखाते हैं, पर मरज़ी के ख़िलाफ़ किए गए टच के बारे में भी। यह हम उन्हें दूसरों और ख़ुद के तजुर्बों के उदाहरणों की मदद से करते हैं।

मैंने अपनी भतीजी को बताना सीखा कि अगर उसका ऐसा करने का मन नहीं है, तो उसे मुझे गले लगाने की कोई ज़रुरत नहीं। आख़िर लोगों का अपने बदन पर अधिकारपे अधिकार का निर्माण करना है, तो फिर ये सब तो करना पड़ेगा, न?  इससे यह सवाल पैदा होता है कि हम लोगों को कामुकता पर शिक्षा क्यों देते हैं। क्या वह शिक्षा हम उनका अब्यूज़ रोकने के लिए देते हैं? क्या हम वो इसलिए देते हैं कि लोग और बच्चे अपने और दूसरों के बदन की (उनकी मरज़ी से) खोज-ढूंढ कर सकें? मेरी सोच तब बदली जब कुछ साल पहले मेरी भतीजी चाहती थी कि मैं उसे हाथ ना लगाऊँ। मैंने उसकी वजह कभी नहीं जानी, लेकिन वो ना छुए जाने के बारे में अड़ियल थी। उसके आसपास के सभी लोगों ने उसे बताया कि मैं एक “अच्छी इंसान” थी, ताकि वो मुझे उसे छूने दे। मुझे उसे वक़्त देना पड़ा। जब बच्चे हमसे गले नहीं मिलते या उनके गाल नहीं खींचने देते, तब हम बड़े लोग बुरा मानते हैं। लेकिन मेरे लिए यह बात बहुत स्पष्ट है – अगर बच्चा यह नहीं सीखता कि उसकी राय मायने रखती है, तो फिर वो अपने पे घटी एब्यूज़ या असहज करने वाली छुअन के बारे में आपको नहीं ही बताएगा।

बच्चों को ये  सिखाना कि उनकी ‘ना’ हम सबके लिए मायने रखती है, कि उनका जवाब गंभीरता से लिया जाएगा, यह बात मेरे लिए मूल्यवान है। बच्चों को सम्मान, मरज़ी और ख़ुद के बदन पर अधिकार के बारे में सिखाना – भला हम इन शब्दों का प्रयोग ना करें – एक लंबी, मुश्किल प्रक्रिया है। इसके बावजूद कि हम उन्हें यह बातें स्पष्ट शब्दों में नहीं बताते। लेकिन  उन्हें इन बातों की समझ देना शायद फ़ायदेमंद ही है।

 

श्रीनिधि राघवन को कहानियां सुनना बेहद पसंद है। वो पार्ट-टाइम लेखिका है और अपने विचारों में फुल-टाइम डूबी रहती है। वहां वह काम करती है, जहां लिंग, कामुकता, टेकनॉलॉजी, अधिकार और विकलांगता एक दूसरे से मिलते हैं ।

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