दोस्ती में प्यार दिखाना मैंने बड़ी मुश्किल से सीखा - Agents of Ishq

दोस्ती में प्यार दिखाना मैंने बड़ी मुश्किल से सीखा

श्रेया द्वारा लिखित

तस्वीरें – एल्बेर्टो रुजियरी

कभी-कभी मुझे लगता है कि दोस्ती और झप्पी /आलिंगन अजीब तरीके से एक-दूसरे से जुड़े हैं। दोनों प्यार की एक ऐसी जगह में बसते हैं जो कामुक प्रेम और स्नेहपूर्ण जान-पहचान के बीच कहीं है। कुछ यारियाँ दोस्ती वाले प्यार और रोमानी दिलचस्पी के बीच झूलती भी हैं, वैसे ही जैसे आलिंगन के कई सारे अर्थ निकाले जा सकते हैं। लेकिन क्या यह इतनी बुरी बात है? अगर आपका दोस्त/आपकी सहेली आपके लिए रोमानी किस्म की भावनाएं रखता/रखती है, तो क्या यह बस एक आपदा ही हो सकती है, या एक शर्मनाक या दिक्कत तलब मसला?

झप्पी  के साथ मेरा रिश्ता हमेशा इतना अजीब नहीं था। जब मैं जवान थी, तब मेरे परिवार और दोस्तों का मुझे कसकर गले लगाना बेहद पसंद था। मुझे इससे  बेहद सुख और स्नेह मिलता था। मैंने कभी झप्पी /आलिंगन के बारे में ज़्यादा गहराई से नहीं सोचा।

लेकिन, कुछ समय से, महफ़िलों में लोगों से गले मिलने का विचार मुझे असहज, भयभीत और स्तंभित कर देता है। ऐसा मुझे तब महसूस हुआ जब मैंने अपने दोस्तों को उनके दोस्तों से मिले अजीब से आलिंगन पर चर्चा करते हुए सुना। उनके मुताबिक़ यह आलिंगन कुछ ज़्यादा ही चिपकू थे और एक तरह से आपकी निजी स्पेस का उल्लंघन कर रहे थे। इसके बाद मैं थोड़ी संकोची और सतर्क हो गयी क्योंकि मामूली और सरल इशारों का भी ग़लत मतलब निकला जा सकता था। ऊपर से ऐसे कुछ लोग थे जिनको मैंने प्यार भरी  झप्पी दी थीं , बस लगाव दिखाने के लिए, और वह इसका ग़लत मतलब निकालकर मेरा पीछा करने लगे थे।

मुझे ऐसा लगा कि मेरे दोस्तों के निष्कर्ष सही थे, कि आलिंगन रोमानी आत्मीयता और अनचाहे प्रस्ताव के विचारों को बल दे सकता है। मैं बेमन झप्पी देने वालों में से नहीं हूँ, वो तो मुझे झप्पी ना देने से ज़्यादा नीरस लगता है। तो इस हालत में मैंने किसी भी सामाजिक मौके पर आलिंगन ना ही देने का चुनाव किया। इसका नतीजा यह था कि किसी भी पार्टी या महफ़िल के पहले और बाद में, मैं ऐसे तरीके ढूंढ़ती थी जिनसे मेरी मौजूदगी छिप जाए और मैं बिना किसी के देखे वहां से निकल लूँ। यह काफी समय तक चला, बस हाल ही में बदला।

करीब ३ साल पहले, मैं शहर के किसी फिल्म फेस्टिवल में वालंटियर कर रही थी और वहां मेरी मुलाक़ात एक खूबसूरत नौजवान से हुई, जिसका नाम परिक्षित था। उस समय, हम दोनों अपने-अपने कमिटिड रिश्तों में थे, लेकिन फिर भी वह मेरे साथ इश्कबाज़ी करता। वह मेरी सूरत और शख़्सियत के बारे में बेधड़क तारीफें करता, बीच-बीच में कोई फ़िल्मी लाइन भी मार देता। यह बिलकुल नुक्सान ना पहुंचाने वाली, हल्की फुल्की, मज़ेदार और प्रशंसापूर्ण इश्कबाज़ी (फ्लरटिंग ) थी। क्योंकि वह मुझसे उम्र में छोटा था और किसी के साथ एक कमिटिड रिश्ते में था, मैंने इस बात को ज़्यादा तवज्जो नहीं दिया। उसका मेरे ब्रेक के दौरान खुद भी ब्रेक ले लेना और फिर ढोंग करना कि यह बस एक इत्तेफ़ाक़ था, मुझे बहुत प्यारा और मनोरंजक लगता।

फेस्टिवल के दूसरे दिन उसने मुझे बताया कि वह ट्रांसजेंडर (विपरीत लिंग प्रदर्शक व्यक्ति) पुरुष था। उसने कहा कि सत्यमेव जयते का उसने हालही में एक एपिसोड देखा था जिसमें विपरीत लिंगों और लैंगिकताओं पे चर्चा हुई थी। उस एपिसोड को देखने के बाद उसे एहसास हुआ था कि वह कौन था और आखिर उसने अपनी इस पहचान को अपना लेने का निश्चय किया था। उसने शो पर मुझे देखा था और मैं उसे बिलकुल साफ़ याद थी। जबकि यह पहली बार नहीं था कि लोगों ने मुझसे अपनी लिंग पहचान का खुलासा किया था, मुझे दिलचस्पी इस बात से हुई कि बहुत कम ट्रांसमेन थे जिन्होंने अपने पूरे परिवार को इस बारे में संवेदनशील किया था, खुलकर और गर्व से अपनी पहचान को अपनाया था और जो कोमल हिरनी सी आँखों वाले परिक्षित जैसे  रोमैंटिक्स थे।

फेस्टिवल समाप्त हुआ। हमारे पास मिलने की कोई ख़ास वजह नहीं थी। लेकिन वह मुझे इश्क़िया मेसेजेस भेजते रहता जिनमें वह मुझे डेट पर ले जाने की अपनी ख़्वाइश को ज़ाहिर करता। मुझे उसे और कोई ग़लत इशारा नहीं देना था इसलिए मैंने उसे डेट के लिए साफ़ इंकार कर दिया और कह दिया कि मुझे उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन वह फिर भी मुझे मिलना चाहता था।

काफी बार मना करने के बाद आखिर मैं कॉफी के लिए राज़ी हो गयी। तब उसने मुझे बताया कि वह सर्जरी कराने वाला था जो उसके लिंग परिवर्तन का हिस्सा थी और वह इस बारे में थोड़ा बेचैन था। हमारी कॉफी डेट पर वह एक बढ़िया काली शर्ट और अच्छे डेनिम्स पहने था। उसने भारी परफ्यूम भी लगाया था। बैठने के बाद हमने अपनी कॉफ़ी का ऑर्डर दिया। उसने थोड़ी इश्कबाज़ी की लेकिन मैं बातचीत को उसके ऑपरेशन की तरफ ले गयी। उसने बताया कि ऑपरेशन थोड़ा उलझा हुआ था जिसमें डॉक्टर उसके गर्भाशय (यूटेरस) को निकालने वाले थे। वह इस गर्भाशय को किसी ज़रूरतमंद ट्रांस महिला दोस्त को दान करना चाहता था, अगर ऐसा संभव हो। पहली बार मैंने सेक्स रीअसाइनमेंट प्रक्रिया से जुड़ी पेचीदगी को जाना, खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जो पहले से हॉर्मोन थेरेपी कर रहा था। वह थोड़ा सा घबराया हुआ था लेकिन डरा हुआ नहीं था। वह सोचता था कि ऐसा करने से वो अपनी रूह से कुछ ज़्यादा ताल मेल रखते हुए शरीर को पाएगा। उसने फिर बातचीत की दिशा बदल दी और मेरे साथ इश्कबाज़ी करने लगा। मैं हमेशा जैसे हँस पड़ी। मुझे पता है कि कुछ लोग इस तरह की ज़िद से नाराज़ हो जाते हैं और इसे सहमति की बेइज़्ज़त्ती मानते हैं, लेकिन मेरे लिए, यह सहजता का मामला है। मुझे कभी उसकी इश्कबाज़ी आक्रमक या डरावनी नहीं लगी थी। उसकी इश्कबाज़ी प्यारी और निष्कपट थी। मेरे मुताबिक़ अगर वह अपनी दिलचस्पी व्यक्त कर रहा था तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं था जब तक कि मैं अपनी दिलचस्पी को उस तरह से व्यक्त नहीं कर रही थी। उसकी इश्कबाज़ी मुझे हँसाती और मेरे मन में उसके लिए स्नेह सा कुछ उमड़ता। फिर भी, मैं अपने आप को कुछ हद तक बाँध कर रखती क्योंकि मैं उसे किसी भी तरह से ग़लत इशारा नहीं देना चाहती थी।

मिलने के बाद, उसने मुझे ऑटो तक छोड़ने का फैसला किया। हमारे बीच एक असहज पल आया क्योंकि मुझे आभास हुआ कि वह अतिसंवेदनशील महसूस कर रहा था और अपने इस दोस्त से एक तसल्लीब्ख़्श स्नेहपूर्ण इशारा चाहता था। मैं ऑटो में बैठने की जल्दी में थी, और उस असहज विदाई वाली झप्पी  से बचना चाहती थी, जो हमारे बीच की हवा में आतुर, मंडरा रही थी । मैं हिचकिचाई, फिर उसका हाथ मिलाया, उसे बेस्ट ऑफ़ लक कहा और ऑटो में बैठ गयी। लेकिन जैसे ही ऑटो वाले ने ऑटो को गियर में डाला, मुझे लगा कि शायद मुझे उसे गले लगाना चाहिए था। शायद वह फैसला इतना भी बुरा न होता। उस पल में मुझे ऐसा लगा कि सही समय पर सही बात करते हुए और एकदम पक्के दिखने के लिए किसी अतिसंवेदनशील व्यक्ति को गले ना लगाना शायद एक बुरा फैसला था।

अगले दिन मैं सिंगापुर जा रही थी। जब मैं सिंगापुर में लैंड हुई, तो मैंने होटल पहुंचकर अपना वाई -फाई ऑन किया – तब मैंने परिक्षित के पार्टनर से एक मेसेज देखा। उसने मुझसे कहा कि परिक्षित अब इस दुनिया में नहीं था और वह चाहती थी कि मैं हमारे काम के ग्रुप में सबको यह खबर दे दूँ। ऑपरेशन टेबल पर उसने अपनी आख़री सांसें भरीं थीं।

मुझे विशवास ही नहीं हुआ। मेरा रोना शुरू हुआ और कुछ घंटों तक चला और अगले कुछ दिनों में भी कभी कभी मैं रो पड़ती। उन आंसूओं के साथ यह ख़्याल भी मिला जुला था कि मैंने किसी ऐसे व्यक्ति को अपने आलिंगन से वंचित रखा जिसकी मैं सच में परवाह करती थी। मैं अपने आप को माफ़ नहीं कर पाई। कुछ दिनों बाद मैंने अपने पछतावे की इस भावना को उसकी शोक सभा में व्यक्त किया। वहां जो मेरे दोस्त थे, उन्होंने मुझे समझाया कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए अपने आप को अलग-अलग परिस्थितियों में माफ़ करना ज़रूरी है। उन सबने उसकी इश्कबाज़ी की खुशनुमा कहानियां और उसका मेरे बारे में निरंतर बात करना साझा किया।

उस दिन से लेकर आज तक, मैं सबको गले लगाती हूँ। मैं ऐसा बहुत करती हूँ। महफ़िलों से निकलते समय मैं अजनबियों के भी गले लगती हूँ -सिवाए उनके जो ऐसा करने पर असहज महसूस  करें । सिर्फ प्यार भरी झप्पी की वजह से अगर कोई मुझपर अनचाहे प्रस्ताव का आरोप लगाए और मैं उस परिस्थिति को संभाल ना सकूँ तो क्या होगा? – इस बारे में मैंने अपने आप पर शक का दबाव डालना बंद कर दिया है। पहले मुझे डर था कि अगर मैंने किसी ऐसे दोस्त को गले लगाया जिसकी मुझ में दिलचस्पी थी और वह उसी रोमानी राह पर आगे बढ़ गया/गयी तो यह अजीब हो जाएगा। मैं तब कल्पना करती कि आगे जाकर जब मैं साफ़ इंकार कर दूंगी तो ये और भी बुरा और कठोर होगा। इससे जो भावनात्मक गड़बड़ हो सकती थी, मैं उस से बचना चाहती थी और इस चक्कर में मैंने उन दोस्तों को एक सरल, तरल दोस्ती तक का मौक़ा नहीं दिया।

मैं सोचती हूँ कि क्या दोस्ती इतनी सरल है कि यह हमेशा प्यार भरी भावनाओं और आत्मीय छुअन से आज़ाद हो सकती है? ‘सिर्फ दोस्त’ का मतलब असल में क्या है? क्या हमसे प्यार करने वाले इंसान आखिरकार हमारे लिए ‘सिर्फ दोस्त’ बन सकते हैं ? इस असमंजस को संभालने के डर से क्या हम अंतरंग यारियां बनाने से और अपने प्यार को बांटने से भी अपने को रोकते हैं?

कभी कभी मैं सोचती हूँ कि हम हर तरह की छुअन को एक तरह से लैंगिक मानते हैं और किसी चीज़ के लैंगिक होने को बहुत मायनों में समस्यात्मक मानते हैं। समाज भी ऐसा बर्ताव करता है जैसे कि खून के रिश्तों के अलावा सिर्फ शादी और रोमानी रिश्ते ही आत्मीय अंतरंग रिश्ते कहलाये जा सकते हैं। दोस्ती और उसकी मिश्रित आत्मीय भावनाओं और परतों के बारे में हम ना ही चर्चा करते हैं और ना ही गहराई से सोचते हैं।

अब मेरा यह मानना है कि आलिंगन सचमुच एक खूबसूरत इज़हार है। अगर प्यार के जादू भरे मानवीय रूप से मिलता जुलता कुछ है, तो वो यही आलिंगन है। और किसी को सबसे बड़ी सज़ा जो आप दे सकते हैं, वो भी, उनसे अपनी छुअन को छीनना है। जब हम दुखी हों या बेचैन हों तब एक आलिंगन/झप्पी  हमें बहुत सहारा दे सकता है। यह सूचित करता है कि हम प्यार भी करते हैं और परवाह भी। कि हम सोचते हैं कि जिस व्यक्ति को हम गले लगा रहे हैं वह ख़ास है और हम चाहते हैं कि उनके साथ सिर्फ अच्छा हो। कि हमारे दिल में बस उनका हित है।

और अगर कुछ भावनत्मक उलझन है, तो हमें उनपर और अपने आप पर और हमारी प्यार भरी दोस्ती के संकल्प पर इतना विशवास है कि हम इन उलझनों के आने पर उनको सुलझा भी सकते हैं।

मैं उम्मीद करती हूँ कि आपको कभी प्यार भरी झप्पी  की कमी महसूस नहीं होगी और ये भी कि आप कभी किसी को अपने आलिंगन से वंचित भी ना रखेंगे।

श्रेया ३० वर्षीय हैं और उन्हें तैरना, खाना पकाना और फेसबुक करना बेहद पसंद है।

अनुवाद: तन्वी मिश्रा

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