मैं अपनी अशांत किशोरावस्था से कैसे बड़ी हो गयी

शरू द्वारा
चित्रण-आयशा पंजाबी

किशोर या किशोरी होना आसान नहीं है, सब यही बताते हैं, है ना? लेकिन वे असल में क्या कह रहे हैं वह आपको सिर्फ़ तब पता चलता है जब आप १५ या १६ साल के हो जाते हो- फ़िल्मों में तो यूं ही होता है। असलियत में, हम सब कठिन प्रसंगों से अपनी अपनी गति के अनुसार गुज़रते हैं, जैसे जैसे ज़िंदगी कठिनाइयाँ पेश करती है। किसी कठिनाई का सामना करने की कोई उम्र नहीं होती, वह कठिनाई बस आ जाती है।

जब मैं किशोरी बनी, लोगों ने मुझे चेतावनी दी, जैसे उनको पहले से इसका अंदेशा था, कि बहुत ज़्यादा निराश होकर खाने का विकार ना पाल लेना। तो यह था मेरे प्रौढ़ होने का तोहफ़ा। ऐसी सलाह जो मैं समझी नहीं और उम्मीदें जिन्हें मुझे पूरा करना था। परंतु इसका मुझपर उल्टा असर हुआ। तेरह साल की उम्र में निराशा और खाने के विकारों के बारे में मुझे इतना कुछ पता नहीं था। मुझे लगा कि इसका मतलब यह था कि आइंदा से मैं दुखी नहीं रह सकती थी, क्योंकि उसका मतलब होता कि मैं बहुत ज़्यादा निराश थी। हरदम ख़ुश रहने की कोशिश से मुझे अपना व्यक्तित्व अंदर से नक़ली लगने लगा।यूँ लगता जैसे अगर मैं ख़ुद से सच कहकर ख़ुद को दुख महसूस करने देती, तो ऐसा करने से मैं मेरे इर्द गिर्द के लोगों को निराश कर रही थी। इसे छुपाने की कोशिश में, मैं जितना हो सके लोगों से दूर रहने लगी।

सबसे ‘लोकप्रिय व्यक्ति’ होना कभी मेरे ज़हन में था ही नहीं, लेकिन नक़ली बुलाए जाने का डर मुझे अधिकतर लोगों से दूर रखता। ‘सामान्य’ होने का विचार मुझपर हावी था, मैं ना किसी पर दादागिरी करना चाहती थी, ना चाहती थी कि कोई ऐसा मेरे साथ करे। मैं मेरी राय दूसरों को नहीं बताती चूँकि मुझे ख़ुद पर दूसरों का ध्यान आना पसंद नहीं था। मैं अपना दिखावा सीधा सादा रखती और मैं दूसरों से बात नहीं करती। धीरे धीरे लोग मुझसे दूर रहने लगे। तो इससे मुझे लोगों की और भी दूरी महसूस होने लगी और मैं कई गलतफ़हमियों की शिकार होने लगी।

इस सब के साथ साथ, मुझे हमारी क्लास के सबसे बड़े गधे पर प्यार आया था। वह सबके साथ हद से बुरा बर्ताव करता था, और उसे पलभर भी अपराध बोध नहीं होता था। मुझे जानना था कि वैसी ज़िंदगी कैसी थी। एक ऐसी ज़िंदगी जो आप अपने लिए जी सकते थे, जहां आपको दूसरों की भावनाओं की चिंता नहीं करनी पड़ती।

इस गधे की चाहत पाने की खोज में, मैं ख़ुद में दोष निकालने लगी। मुझे मुँहासे थे जबकि दूसरे छात्रों को वे नहीं थे, हमारी क्लास में मैं सबसे ऊंची और मोटी लड़की थी और आहिस्ता मुझे इसपर घिन आने लगी। कई सालों तक मैं चुप चाप ख़ुद से नफ़रत करती रही और चूँकि कोई यह बात देख या सुन नहीं सकता था, उन्हें लगा कि मैं ठीक थी, और मुझे भी वही लगा।

मैं शुक्रगुज़ार थी कि कुछ समय बाद वह स्कूल छोड़कर चला गया। उसके जाने के बाद, उसके दादागिरी के किस्से सामने आए। एक ऐसे शख़्स की ओर आकर्षित होना जिसने इतने लोगों को दुःख पहुँचाया- इस कारण मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई, और उसके जैसे बनने की चाहत ने भी मुझे शर्मिंदा किया। इस बात ने ख़ुद की नफ़रत की आग को और भी ईंधन दिया।मेरी समझ तो बस यही थी-  मैं मेरा शरीर उस तरह बदल दूँगी जिस तरह मुझे लगता है इसको दिखना चाहिए चूँकि वैसा करने से मैं ख़ुद से कम नफ़रत करूँगी।

और इस तरह, यह सब शुरू हुआ: कैलोरी ढूंढ़ना, गिनना, खाना कम खाना, कसरत करना और उल्टी करना। मेरा वज़न कम होने लगा और फिर से, किसी ने ध्यान नहीं दिया। जब मुझे लगता कि मैंने पर्याप्त वज़न खोया था मैं तारीफ़ के लिए इंतज़ार करती। जब कोई मेरी तारीफ़ नहीं करता, मुझे लगता कि मैंने पर्याप्त वज़न नहीं खोया और मैं और भी ज़्यादा वज़न खोने लगती। मैं इस बात का घर पर मेरा कम वज़न वाला BMI दिखाकर और खाना न खाकर ढिंढोरा पीटती। जब फिर भी किसी ने ध्यान नहीं दिया और मैं भूखी रहे बिना और वज़न नहीं खो सकती थी, तब मेरी ख़ुद से नफ़रत करने की वजह मानो आसमान छू गई।

दूसरे लोगों को निराश ना करने की लगातार ज़रुरत से उभरी बेहतरीन बनने की ज़रुरत। मुझे आइंदा से छिपना नहीं था, लेकिन अगर मुझे लोगों का ध्यान चाहिए था, तो बेहतरीन होने के लिए। मैं इस बात से नफ़रत करने लगी कि मैं उतनी पतली नहीं थी कि लोग मुझ पर ध्यान दें, कि मैं उतनी खूबसूरत नहीं थी कि लोगों को अच्छी लगूँ, कि मैं उतनी होशियार नहीं थी कि वे मेरी प्रशंसा करें, कि बस मैं किसी भी अंदाज़ से पर्याप्त नहीं थी। मैं यह मानने लगी कि लोगों की ज़िंदगी मेरे सिवा ही बेहतर है, कि मेरे परिवार के लिए मैं सिर्फ एक बोझ थी और वो इतने लायक हैं कि उन्हें मुझसे बहुत अच्छी लड़की मिलनी चाहिए थी। यह नफ़रत और गुस्सा बाहर निकालने का मुझे एक ही रास्ता मिला और वह था ख़ुद को शारीरिक रूप से हानि पहुँचाना। मैं ख़ुद को काटने लगी, और धीरे धीरे, मैं वह रोज़ रात करने लगी। मैं क्या कर रही थी मुझे तब पता चला जब किसी ने बताया कि मैं जो कर रही थी वह गलत था। उन्होंने कहा कि अगर मैं किसी और को हानि नहीं पहुँचाना चाहती थी, तो मैं वैसा ख़ुद को क्यों कर रही थी। आज तक मुझे नहीं पता वह गलत क्यों है। मैंने अपने को सिर्फ इसलिए रोका चूँकि दूसरों ने मुझसे रोकने का वचन लिया था।

दो साल बाद, जब मैं ८ वी कक्षा में थी, मुझे पता चला कि जिस तरह मुझे लड़के अच्छे लगते थे, ठीक उसी तरह मुझे लड़कियां भी पसंद थीं। जब मेरे सब दोस्त लड़कों से गले मिलने की और चूमने की बातें कर रहे थे, मैं लड़कियों को वैसा करने की सोच रही थी। शुरू में मुझे लगा कि सब यूँ ही महसूस करते थे, फिर मुझे पता चला कि वैसा नहीं था। जबसे मैं १० साल की थी तबसे मुझे वैसे लगता था, लेकिन मेरी LGBTQ+ समुदाय से पहचान होने के बाद ही मुझे पता चला कि मेरी सोच दूसरे लोगों से अलग थी। जब मुझे यह पता चला, मुझे नहीं लगा कि यह बात शर्माने वाली या छिपाने जैसी थी तो मैंने मेरे सभी करीबी दोस्तों को यह बात बताई। सौभाग्यवश, सिर्फ एक ने मेरी बात नहीं समझी, उसे लगा कि मैं एक अजीब दौर से गुज़र रही थी।

दो साल बाद जब मैं एक लड़की को डेट करने लगी, मैंने मेरे पिता को यह बात बताना सही समझा, चूँकि वे मेरे दूसरे बॉय फ्रेंड और जिन लड़कों पर मैं लट्टू थी उनके बारे में जानते थे। तब तक, मैं ढेर सारी कहानियां पढ़ चुकी थी, उन माता पिता के बारे में जो अपने बच्चों की समलैंगिकता के बारे में सुनकर बच्चों को दरकिनारेकर देते, इसलिए मैं बहुत डरी हुई थी कि मेरे पिता मेरे द्विलिंगी होने का सुनकर क्या प्रतिक्रिया देंगे।

मुझे आश्चर्य हुआ, जब मैंने उन्हें बताया, उन्होंने कहा कि वह ऐसी बात थी जो वे बदल नहीं सकते थे और इसलिए उसके बारे में शिकायत करने का या उसका विरोध करने का उन्हें कोई हक़ नहीं था। आखिरकार मुझे लगा कि उनकी संगत में मैं ईमानदार रहकर उन्हें सब बता सकती थी, इसलिए मेरा उनके साथ रिश्ता और मज़बूत होता गया। इस कारण मैं उनके साथ इतना सहज महसूस करने लगी कि मेरे ख़ुद को हानि पहुँचाने और खाने के विकार के साथ अपने संघर्ष के बारे में मैंने उन्हें सब बता डाला। सही दिशा में यह मेरा पहला कदम था। मेरे तकलीफ़ों के लिए मदद मिलने के लिए मुझे एक मनोवैज्ञानिक से हफ़्ते में दो बार और एक मनश्चिकित्सक से हफ़्ते में एक बार मिलना पड़ा। इसके अलावा, मेरे दोस्तों और परिवार के सहारे के कारण, दुनिया की ओर देखने का मेरा नज़रिया पूरी तरह से बदल गया। मैं अब जान गई कि मुझे सब से बेहतरीन होना ज़रूरी नहीं था, कि ‘सब से बेहतरीन’ होना नामुमकिन था।

अगर कोई मुझे पूछे कि मेरे किशोरावस्था के दिनों के बारे में मुझे क्या गम है, मैं यह नहीं बोलूंगी कि मुझे कोई गम नहीं है। इतना कुछ था जो मैं कर सकती थी और इतना कुछ जो मुझे नहीं करना चाहिए था। लेकिन मैं मानती हूँ कि मेरे अनुभवों ने मैं आज जो हूँ, उसे बनाने में मदद की है। हालाँकि किशोरावस्था से प्रौढ़ बनने का सफर मैंने पूरी तरह से तय नहीं किया है, मैंने दूसरों को निराश करने के और ख़ुद से नफ़रत करने के कठोर विचारों का सामना करने के तरीके ढूंढ़ लिए हैं और अब मैं भविष्य की राह देख रही हूँ। मैंने सीखा है कि मैं ऐसे लोगों से घिरे रहने की लायक हूँ जो मेरे लिए अच्छे हैं, ऐसे लोग जो सच में मेरा ख्याल करते हैं। ऐसा नहीं कि मैं बुरे दिनों से नहीं गुज़रती, अब भी वैसा होता है। लेकिन उन दिनों, मैं जो भावनाएं महसूस कर रही हूँ उन्हें एक लहर के समान उतरने और लौट जाने का वक़्त देती हूँ। मैंने समझा है कि जबकि ऐसे लोगों का होना अच्छा है जिनपर आप निर्भर हो सको, आत्म निर्भरता ही सबसे अच्छी स्थिति है।

अनुवाद: मिहीर सासवडकर

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