लिपटने के ज़बरदस्त सुख का स्वाद कैसे लें

लिखित – शाल्स महाजन
चित्रण – अरुणिमा बोस
अनुवाद – हँसा थपलियाल

लिपटने के ज़बरदस्त सुख का स्वाद कैसे लें

हमें लिपटना-चिमटना बड़ा पसंद है l

यह चिपट लिपट बढ़ा शातिर सुख है. थोड़ा गर्म, मुलायम, रोयेदार, आरामदायक, लंबी आहें दिलाने वाला अहसास है जो एक ही पल में

1. सुखद भी है और

2. बदन को मीठी नींद दे जाता है

3. म्‍म्म्मम

हाँ, अब कुछ लोग कहेंगे, और उनका यह कहना लाजमी भी होगा, कि इनमें से दो सुख तो गोल गप्पे खाने से भी मिल सकते हैं l लेकिन फिर हम भी हुज्जत करेंगे कि नहीं.. वो सुख कुछ उम्म्म किस्म का होता है,  उसमें वो म्‍म्म्म वाली बात नहीं है l और तो और यह पानी पुरी वाला अनुभव नींद दिलाने में तो बिल्कुल गोल है l

अब आई सेक्स की बात l संभोग के सुख से कोई नहीं मुकरता l और संभोग के बाद आने वाली नींद में कई बार  एक लालिमा होती है l मगर अगर संभोग क्रिया कुछ फुर्तीली रही हो, तो उसके संचलनों ने आपकी सोई हुई मांसपेशियों को जगाकर आपको उनके मालिक होने का अनुभव दिया होगा ( ख़ासकर अगर आपकी उम्र चालीस पार कर गयी हो) l ऊपर से कई बार संभोग के बाद पेशाब करने को भागना पड़ता है l हाँ, वो संभोग के दौरान हो गयी तो.. लेकिन फिर भी, सफाईयाँ तो करनी पड़ती हैं l

कहने का मतलब है कि हालाँकि कुछ लोगों के लिए लिपटना चिपटना, गोलगप्पा खाना, संभोग करना एक ही कोटी के सुख हैं, हमारे लिए लिपट–चिमट-चिपट अपने अलग धुंधले वर्ग में है…

पहली बात, इसमें कामोत्तेजना का कोई रोल ही नहीं… या हो सकता है, पर ये ज़रूरी नहीं l

ज़रूरी क्या है? लिपट चिमट की चाह, चाहे अकेले, किसी चीज़ के साथ या किसी और के साथ या फिर किसी विडालवंशी- यानि बिल्ली समान- के साथ l

और

1. कोई सतह, धरातल, पृष्ट जो ठीक ठाक हो, उस पल में आराम दे

2. हाँ, और तापमान जो 36 डिग्री सेंटिग्रेड से कम हो, हो सके तो काफ़ी कम

अब हमें पता है कि यहाँ कुछ ऐसे संवेदनशील प्राणी होंगे जो हँसी ख़ुशी 48 डिग्री में लिपट चिपट करते हैं, बिन पसीने की एक बूँद टपकाए l

और बिना उन चपट थपट के सुरों की, जो दो भीगे तलों के आलिंगन का परिणाम होती हैं l

अफ़सोस यह है की हम में ना ही इतनी उच्च कोटी की शिष्टता आई है, ना सहन शक्ति l

शायद वो एक व्यवसादी- प्रोफेशनल- स्तर है l

हम  तो बस शौकीन हैं l (हालाँकि हमनें  ज़िंदगी भर बड़ी मज़ेदार और ढेर सारी लिपट चिपट की है l) इसलिए हमें ऐसा मौसम ज़्यादा पसंद है जब हमारे ठंड से जमे हुए पाँव के अंगूठे किसी की स्वप्निल जांघों से कुछ गर्मी चुरा रहे हों l

यह इस परिस्थिति से तो बेहतर  है जहाँ पसीना इतना हो कि मन करे कि कपड़े (अपने, दूसरे के भी), तकिये, चादर, कपड़े के मुलायम खिलौने, सबको पसीना पोंछने का साधन बना लें  l

तापमान की इस चर्चा का माने यही है कि लिपटने चिपटने में आपके साथ जो दूसरा है, आप उसकी ओर बढ़ना चाहें ना कि मुकरना l

 

चलो यह तो कह दिया- हमें यह भी कहना होगा कि हम कई बार सोचते हैं, कि गर्मियों में ठंडे पथरीले फर्श पर फैलने की बिल्लीनुमा आदत को हम कैसे मापेंगे या ऐसी दीवार से लग जाने की आदत, जो उस वक्त हमसे कहीं ज़्यादा ठंडी है l

यानी कि :

सोचने के लिए पहला सवाल: क्या यह कहना जायज़ होगा कि हम  उस फर्श/ दीवार से लिपट चिपट रहे थे?

यहाँ भी अपने (हाय!) उबास तरीके से, मैं उनका समर्थन करता हूँ जो मानते हैं कि कुछ कपड़ों का होना इस अनुभव को और (ना कि कम) सुखद बनाता है  l

हमें यकीन है कि  नग्न अवस्था  में लिपट चिपट मज़ेदार होती है, कामुकता सहित या रहित  l

पर कपड़ों की बुनावट, उनका लहरों सा उठना गिरना, उस आलिंगन में एक अलग भीनी, मद्धम कामुकता लाते हैं  l

इसलिए सूती के पुराने कपड़े और झीनी, घिसी हुईं पुरानी चादरें: तकिये, खिलौने, लोग, बिल्लीसमान जीव जो आपसे लिपटना जानते हैं और आप उनसे- यह सब लिपट चिपट के अच्छे साथी हैं l

पर रुकें, हम कुछ ज़्यादा आगे तो नहीं चले गये?

हाँ, तो हमें मुलायम, आरामदायक कपड़े चाहिए  l

और अगर आपका आराम रेशमी पाजामों या पॉलयस्टेर की चादरों से है- तो कोई गल नहीं- आप आगे बढ़ें! जहाँ हमारा सवाल है, हम बिल्ली की गीली मुलायम नाक को इस मामले में  मापदंड मान कर चलते हैं  l

अब हम सोच रहे हैं, क्या एक पेड़ को आलिंगन में लेना इस लिपट चिपट के अंतर्गत आएगा या नहीं? (और क्यों नहीं? हमें कल्पना इस लिए दी गयी है ताकि हम उसकी सीमाओं को और विस्तृत करें! हाँ, शायद पेड़ कपड़े की बुनावट पर इतना ध्यान ना दें जितना की आप…

 

सोचने के लिए दूसरा सवाल: झप्पी और इस लिपट चिपट में कोई अंतर है, ये अंतर रखना भी चाहिए?

मन तो बड़ा कर रहा है कि बड़ा सीधा सा जवाब दूँ-

(ऐसा जवाब जिसके स्वागत में शायद आपकी भौहें उठ जाएँगी) कि जब लंबरूप( वर्टिकल) काफ़ी नहीं होता, तब आत्मा आगे बढ़ने के लिए क्षैतिज ढूँढती है- तब शायद कह सकते हैं कि हम झप्पी से लिपट चिपट की ओर चल पड़े हैं l

तात्पर्य यह है कि उस जगह की खोज रहे जहाँ साथ हो, आराम और अपनापन मिले, ऐसा, जो हल्का भी हो, कौमुक भी, कोमल भी हो, और आपको बल भी दे l आलिंगन जिससे उस पल के जीने का सुख मिले. बोलें तो, बस, होने का सुख.

अब इस बात से जूझते हैं कि यह लिपट चिपट क्या कौमुक है या निष्काम? या इन दोनों के बीच के किसी धुंधले देश की वासी है l

कुछ लोगों को किसी से लिपटने की आत्मीयता तक पहुँचने के लिए जान पहचान का एक लंबा समय चाहिए होता हैl

कुछ और ये लिपटने की क्रिया सिर्फ़ उन जनों के साथ करते हैं जो संभोग में उनके साथी हैं. कुछ और इस लिपट चिपट से इनकार करते हैं (हाँ वो हमेशा इस लकीर के फकीर नहीं होते) l

फिर हममें वो हैं जो मौका मिलते ही लिपट लेते हैंl

हमनें हाल में अंतरंग संबंधों को समझने के लिए एक अनुसंधान सा किया, एक खोज की  l हमनें पाया कि केवल संभोग में आत्मीयता ढूँढने की कड़ी खोज से थक कर, कई लोग ऐसी महफ़िलों (dos) का आयोजन कर रहे हैं जहाँ अंजान मिलते हैं और एक दूसरे से सिर्फ़ लिपट कर, दूसरे के शरीर में स्पर्श और आराम की निष्काम घनिष्टता का सुख लेते हैं l

आयोजक इस बात पर बिल्कुल क्लियर हैं कि यह एक निष्काम जगह है- जो की समझा जा सकता है  l पर जीवन को यूँ संकीर्ण लकीरों में बाँधने की ज़रूरत नहीं है: वो बँधता भी नहीं है l

जैसे संभोग में होता है, यहाँ भी, औरों से सुख ढूँढने की प्रक्रिया में, खुद को जानना भी बहुत ज़रूरी है l

इस लिए आरामदायक जगहों में खुद से लिपटना, माकूल वस्तुओं के साथ (जिसमें किताबें भी शामिल हैं), बड़ा ज़रूरी है l यह जानना भी फ़ायदेमंद होगा कि सुकून में आपको कौन सी खुश्बू पसंद है l  और अगर आप बहुत कलात्मक हैं, तो फिर संगीत और रौशनी के उतार चढ़ाव पर भी आपका ध्यान जाएगा l

सवाल 3क्या किताब को लिए- लिए सो जाना उससे लिपटना -सा नहीं है? या उसके लेखक या पात्रों से?

शरीर के किसी कार्य क्रम की जाँच तभी पूरी मानी जाती है जब उसके सारे आसनों की व्याख्या की जाए,

तो यह रही एक ऐसी कोशिश, संक्षिप्त रूप में, लिपटने चिपटने के एक वर्गीकरण की:

पहली बात: लिप्टन चिप्टन का शारीरिक आसनों द्वारा वर्गीकरण (क्लॅसिफिकेशन) किया जा सकता हैl

 

1.सबसे सामान्य आसान, चमचासन/मैं तुम्हारा चमचा हूँ l

जब दो लोग एक ही करवट लेकर यूँ आलिंगन करें कि एक दूसरे की पीठ सेसट जाए, यूँ, कि उनके बदन दो चमच्च के कटोरों से दिखें l

यहाँ एक यह बात छिड़ती है कि दोनों में से धारक कौन है और धरा हुआ कौन..यानि किसका सर कौन से कंधे पर है l

अतिरिक्त: यह और ऐसे अन्य आसन कथित अंगों के सुन्न होने पर, एक प्रचंड चर्चा जारी कर देते हैं , और आकस्मक छोटे बालों का गुदगुदी मचाना और लंबे बालों के (जान बूझ कर या आकस्मक) स्पर्श से ‘आऊ’ के सुरों का निकल भागना, गंजे सरों का चुंबन का निवेदन सा होना, माथो का भी और उस हर अंग का जो बेतरतीब, होंठों के इर्द गिर्द आ जाए, उनपर भी l

 

2. वड़ा पाव या सॅंडविच आसान

यह तब जब कोई तीन अगल बगल में लिपट चिपट जाएँ l  वो आपकी पसंद है कि आप डबल रोटी बनेंगे या टिक्की, पाव के दो भागों में एक, या बीच का वड़ा l

 

3. ‘T’ आसन यानि पेट पे सर, अँग्रेज़ी में ( Head On Tummy- HOT).

यहाँ पेट पर सर रखकर जब एक अपनी पीठ पर लेटता है, दूसरा, 90 डिग्री के एंगल पर, पहले के पेट पर सर रखकर लेटता है l बातचीत में बड़ी सहूलियत होती है (कभी 6/8 पैक वाले पेट पर यूँ नहीं लेटे? हमें  हमेशा उनके मांसपेशियों पर ऊपर नीचे ‘बाउन्स ‘ करने का ख्याल आता है  l )

इस आसन का एक और रूप- पहला पेट के बल लेटा है, दूसरा अपने किसी हिस्से को, कभी उसकी पीठ, कभी  

कूल्हों पर रख टेक लेता है  l बिल्ली, कुत्तों, इंसानों को ये बेहद पसंद है  l

 

4. पिरामिड

यानी हर एक दूसरे पर बेतरतीब गिर पड़ता है l कई बार यूँ होता है कि कोई एक कहीं फैल गया और उसने अचानक पाया कि उस पर एकदम बड़े सारे बदन पड़ गये l

2 -3 से ज़्यादा लोग हों तो यह बेहतर हो पाता है, और बिल्ली कुत्तों के साथ भी और सफल होता है l

 

5. बागों में प्रेमी

जहाँ एक दूसरे की गोद पर सर रखे और दूसरा गोद पर रखे सर को देख कर आहें भरे, इत्यादि l

 

6. आक्टोपस

लगता तो यूँ है कि किसी रहस्यमय तरीके से, बड़े सारे अंग आप पर लिपटे हुए हैं ,पर शायद वो बस (किसी के) चार अंग हों जो आपको आलिंगन में लिए हों l

 

7. भालू

कसी हुई पर प्यार भारी पकड़, जहाँ हिलना भी नामुमकिन लगता है l

 

8.  जकड़ !

जब साँस लेना वैकल्पिक हो जाता है l

 

9. भुलक्कड़

इसमें सहलाना ज़्यादा और लिपटना कम होता है l इस प्रेम भरे स्पर्श का काम होता है, भूली हुई लिपटने की यादों को लौटाना और उनसे मिलता हौसला भी l

 

10. मैं- गद्दा हूँ

यहाँ आप कई बार तकिया भी होते हो  और गद्दा भी, और अपने को यूँ खुशकिस्मत जान कर,  हौले ही हिलते हो, कि कहीं दूसरा नींद से न जाग जाए होते हो

बिल्लियाँ इस आसन में निपुण हैं, कुत्ते भी, पर अन्य इंसानों संग भी यह काम दे सकता है l

लिपटने चिपटने का वर्गीकरण भावना और सन्दर्भ से भी किया जा सकता है:

 

1. दोस्ताना बातों- बातों वाली लिपट:

गरमीला और संतुष्ट सा, ये आलिंगन साथ पीने, बतियाने का एक अगला कदम है.

 

2. मीठी चुभन वाली चिपट

ये थोड़ी पेचीदा है- जब एक कौमुक है और दूसरा अंजान… या स्पष्ट रूप से कौमुक नहीं है, पर पास में है l

तो पहले को बड़ा सतर्क रहना पड़ता है कि वो आलिंगन सह सांवेदी/ ‘कन्सेन्सुयल’ रहे, दूसरे के लिए विकृत न बन जाए.. नतीजा, आलिंगन एक दम आराम दायक तो नहीं होता, पर अंगों में, और दिल में अनंत मीठा दर्द, इत्यादि दे जाता है l

 

3. बेपरवाह आलिंगन

सबसे बेहतर तकियों और चादरों की लपेट में जब न दूसरे को जा गिराने की परवाह हो, न उसके किसी कोमल अंग से ग़लती से चुटकी लेने की, ना खुद से आती थोड़ी पकी सी बू की…

 

4. संभोग से पहले का आलिंगन

सोफे पर, थोड़ा तने हुए हैं, पर फैलने की जगह भी है, ये आलिंगन थोड़ा बेढंगा भी है और बेहद कौमुक भी… और ज़्यादातर आने वाली क्रीड़ाओं का आरंभ l

 

5. टीवी आलिंगन

टीवी देखते वक्त करा जाने वाला: गोद में पाँव, गोद में सर, काँधे पे सर, इसके कई रूपांतर हैं.

ये आलिंगन अपने आप में पर्याप्त है… ये लंबी रेस की लिपटने वालों के लिए हैl

 

6. अचानक पीस देने वाला आलिंगन

जब किसी एक को किसी दूसरे पर अचानक उमड़ घुमड़ कर प्यार यूँ आए कि पीसा जाने वाला अपने को थोड़ी अस्त व्यस्त हालत में, हक्का बक्का पाता हैl

 

7. रूबिक

लंबे अरसे से इन आलिंगन आसनों में हमसफर होने से, आसान में आने की पूर्व ही, हर अंग को पता है कि उसे कहाँ फिट होना है, इससे पहले कि वो सुन्न हो जाए l

यह तो जुड़ने और अलग होने का नृत्य ही माना जाएगा, कभी नितंबों को छूना, फिर आमने सामने होना… ये लंबे अरसे तक चल सकता है, पूरी रात भी l

 

8. चिमटने वाला आलिंगन

जहाँ एक अपने मन की करता है, और दूजा  चिमटता है और बीच बीच में उसे थपथपाया जाता है l यह खुशनुमा  है, बस इस चिमटने के विभिन्न तरीकों को श्रेय मिलना चाहिए l

 

9. आग्रही आलिंगन

ये बिल्ली नुमा लोग होते हैं जो आपकी गोद पर चढ़ बैठने की हठ करते हैं( या जहाँ कहीं वो चढ़ना चाहें), ‘n’ बार, भला आप ‘न-1’ बार उन्हें हटा दें.

 

10. स्पेशल मेंशन आलिंगन

यानि बाईक पर उड़ते बालों में हवा वाला आलिंगन  l

 

और आख़िर में, रूह राज़ी है आलिंगन

जहाँ बदन तो मुकरता है, क्योंकि बड़ी गर्मी है, आप भारी महसूस कर रहे हैं, या जो भी और… यानि लिपट नहीं पाएँगे. तो

फिर ऐसे में, ख़याली,या फिर, रूहानी लिपट ही सही l

 

शाल्स महाजन आरामपसंद हैं, लेखक हैं, कुछ बिल्लीनुमा हैं, कुछ इंसानी, क्वीयर, नारीवादी…आप बंबई के वासी हैं, पर  उससे ज़्यादा अपने दिमाग़ में बसते हैं. आपकी प्रकाशित रचनाओं में हैं- ‘टिम्मी इन टैंगल्स’ और ‘नो आऊटलॉज़ इन द जेंडर गालाक्सी ‘

 

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