अंदर-बाहर की बहार

श्रुति सुंदररमन द्वारा लिखित

चित्रण : देबस्मिता दास 

अनुवाद – तन्वी मिश्रा

 

एक ज़माने में, हॉट मेल/कामुक पुरुष होना आम बात नहीं थी। हमें गलत मत समझिए। कामुक पुरुष हमेशा से मौजूद रहे हैं। लेकिन एक कामुक पुरुष के शरीर का विचार भारतीय मीडिया में पहले मायने नहीं रखता था। हर जगह सिर्फ औरतों के बदन नज़र आते थे। जब लोग सोचते थे, कविता लिखते थे और औरत के शरीर के बारे में गाने गाते या फिर तस्वीरें खींचते थे, तो वह हमेशा सेक्स अपील / लैंगिक मोहकता को ध्यान में रखते हुए करते थे। लेकिन एक पुरुष के शरीर को सेक्सी मानने का, उसे कामुकता के नज़रिये से देखने का, और तृष्णा का विषय बनाने का विचार निराला और देखा जाए तो, एक नया प्रचलन है। तो हम इस सिक्स-पैक (Six-Pack) रखने वाले, सेक्स के प्रतीक पुरुष के विचार तक पहुंचे कैसे?

यह अंदर की बात है।

आइये हमारे साथ इस अभियान पर जहाँ हम एक बहुत ख़ास ऐतिहासिक वस्तु की जांच करेंगे जिससे हमें थोड़ी जानकारी मिलेगी कि तब और अब, पुरुष के शरीर को भारतीय अंडरवियर के विज्ञापन में कैसे दिखाया जाता है।

१९७० का दशक

कहा जाता है कि दिमाग ही सबसे बड़ा लैंगिक अंग है। क्योंकि बिना आपकी लैंगिक कल्पना के आप कहाँ होते? १९७० और ८० के दशकों में, कल्पना का सबसे बड़ा महत्त्व था क्योंकि जांघिया के विज्ञापन ज़्यादातर रेडियो पे आते थे। यंग इंडिया नामक एक ब्रांड अपनी चड्ढी और बनियान बेचने के लिए रेडियो विज्ञापन बनाता था। किसी भी तरह की असहजता को छिपाने के लिए यह विज्ञापन एकदम हास्यपद अंकल जैसे वॉइसओवर का इस्तेमाल करते थे। सेक्सी-वेक्सी तो दूर की बात थी। अब तक, कोई भी पुरुष की कामुक मोहकता को उसकी चड्ढी से नहीं जोड़ रहा था।

जैसा कि संतोष देसाई, फ्यूचर ब्रांड के सी.ई.ओ (CEO) और भारत में पॉपुलर कल्चर (popular culture) के सबसे तेज पर्यवेक्षकों में से एक, कहते हैं, “७० और ८० के दशकों में, चड्ढीयों का आदमियों की लैंगिकता से कुछ लेना देना नहीं था। ज़रा सोचिये – हर उम्र के आदमी हमारे घरों और अड़ोस-पड़ोस में उघारे बदन टहला करते थे। इससे किसी तरह की कामुकता नहीं जुड़ी थी। कामुकता हमेशा औरत के बदन से जोड़ी गयी थी, नाकि पुरुष शरीर से। इस से ये पता चलता है कि आदमियों के खुद की लैंगिकता को लेकर क्या विचार थे।”

 

ज़ाहिर सी बात है, इसका मतलब यह नहीं है उस समय कोई सेक्स नहीं कर रहा था। देसाई कहते हैं, “आदमी सेक्स को गंभीरता से देखते थे, बिलकुल, लेकिन अपनी खुद की कामुकता को नहीं।”

७० और ८० के दशकों की शुरुआत में भी किसी अभिनेता ने कोई ऐसा आकांक्षात्मक मूल्य नहीं बाँधा था जो सेक्स पर निर्भर करता था। संजीव कुमार और राजेश खन्ना आदमियों के लिए प्रेरणास्रोत ज़रूर थे, लेकिन उनकी मर्दानगी उनके शरीर से नहीं जुड़ी थी। यह उनकी तहज़ीब और स्क्रीन पे या स्क्रीन के पीछे उनके व्यवहार से जुड़ी थी। काफी सारे अभिनेताओं के नरम, गोल आकार थे। बेशक, दारा सिंह और धर्मेंद्र जैसे स्पष्ट रूप से मर्दाना आदमी भी थे लेकिन वह अपवाद थे।

१९८० का दशक

पहले तो, उस समय की स्थिति के बारे में एक नोट। अनुराग अग्निहोत्री, ओगिल्वी एंड मेथर के एग्जीक्यूटिव क्रिएटिव डायरेक्टर (executive creative director)  कहते हैं, “अमूल और रिवोल्टा जैसे ब्रांड्स के उस वक्त चड्ढी के विज्ञापन थे, लेकिन वह आमतौर पर बॉक्सर ब्रीफ (boxer brief) के बारे में थे। प्रिंट विज्ञापनों में मॉडल्स नहीं होते थे, बस ३ सफ़ेद चड्ढीयों की तसवीरें। कुछ विज्ञापन दीवारों पे फिल्म पोस्टरों जैसे चिपका दिए जाते थे। लेकिन उनमें से कोई भी पुरुष कामुकता की खुल के चर्चा नहीं करते थे।”

१९८० के अंत की ओर छपे अब एक मशहूर वी.आय.पी फ्रेंची के अखबारी विज्ञापन ने सब बदल दिया।

नाम: वी आय पी फ्रेंची

क्रेडिट/श्रेय: इंडिया फोरम (India Forum)

विज्ञापन में, दलीप ताहिल ने एक रहस्य्मयी अंतर्राष्ट्रीय आदमी की छवि बनाई, एक हाथ से लाल ड्रेस में एक महिला को पकड़े हुए, और दुसरे हाथ से विलन को हवा में उड़ता भेजते हुए। और सामने उनका लाल लबादा खुला हुआ उनकी हाई-कट (high-cut) वी आय पी फ्रेंची की चड्ढी दिखाते हुए। उस पीढ़ी की लैंगिक कल्पना में यह एक सुनेहरा पल था।

देसाई कहते हैं, “अचानक, रास्ते के बीचों बीच एक आदमी कसी हुई सफ़ेद चड्ढी में खड़ा हुआ है, औरतों को बचाते हुए, और एकदम माचो / मर्दाना दिखते हुए। एक ऐसा वस्त्र जो कभी लैंगिकता या शारीरिक छवि के साथ नहीं जोड़ा गया था अब उनसे जुड़ने लगा। इस विज्ञापन ने आदमियों को सोचने पे मजबूर कर दिया: ‘क्या मैं अपनी चड्ढी में माचो/मर्दाना हो सकता हूँ?'”

इस समय में, माचो शरीर धीरे-धीरे भद्रलोक मध्यम-वर्गीय मर्दानगी का भी हिस्सा बनता जा रहा था। विनोद खन्ना जैसे अभिनेता बड़े परदे पे लोगों के दिलों की धड़कनों को तेज़ कर रहे थे, और क्रिकेटर (cricketer) इमरान खान का सुन्दर ढांचा क्रिकेट-प्रेमी भारतीय मर्दों पर गहरा असर कर रहा था। या तो वी आय पी फ्रेंची के विज्ञापन की टाइमिंग (timing) बढ़िया थी या यूं समझो कि उड़ता हुआ लबादा पहनी खुद किस्मत पधारी थी। अचानक चड्ढीयों ने पूरी तरह से हास्यजनक होना बंद कर दिया। विज्ञापन ने अचानक औरतों के ध्यान को आदमियों की तरफ ऐसा आकर्षित किया जैसा उन्होंने पहले कभी संभव नहीं समझा था। कौन सोच सकता था कि दुनिया की सभी चीज़ों में से, औरतें आदमियों को उनकी चड्ढीयों की वजह से ध्यान देंगी?

लेकिन ऐसा ही हुआ। ललिता वैद्यनाथन, एक विज्ञापनों की सलाहकार, जिन्होंने इस क्षेत्र में ३० साल बिताएं हैं, को वह पल याद है जब पुरुष जनसँख्या को पता लगा कि उनका शरीर मायने रखता था। “जब ८० के दशक में वी आय पी फ्रेंची का विज्ञापन निकला, मैं कॉलेज में थी। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में इसका आधे पन्ने का विज्ञापन छपा था। मुझे याद है कॉलेज में लड़कों के पास इस विज्ञापन के कट-आउट (cut-out) होते थे और लड़कियां इस बारे में बहुत हँसती और बात करतीं। इस विज्ञापन को औरतों ने नोटिस (notice) किया था, और इस सच्चाई ने आदमियों को एहसास दिलाया की अंडरवियर भी लैंगिक आकर्षण का एक अस्त्र बन सकती थी।”

और यह भी कि औरतों की नज़रों में भी वासना बस सकती है, मचा

 

१९९० का दशक

वी आय पी फ्रेंची के विज्ञापन के बाद एक ऐसा दशक आया जहां आदमी अपनी खुद की लैंगिकता को अपनी शारीरिक छवि के द्वारा समझने के लिए ज़्यादा खुल गए थे। देसाई कहते हैं, “मुझे याद है ९० के दशक में जब स्टारडस्ट के कवर (cover) पे मैंने जैकी श्रॉफ को देखा था। वह एकदम बिंदास एक व्हाई-फ्रंट (y-front) वाली चड्ढी में खड़ा था। आप ने ऐसा कुछ ७० या ८० के दशक में देखा नहीं था।” और जो रास्ता फ़िल्मी दुनिया ने दिखाया, आम जनता ने बिना सवाल पूछे उस रास्ते पे उनका साथ दिया।

मनीष भट, स्केरक्रो कम्युनिकेशन्स के सह-संस्थापक कहते हैं, “जब ९० के दशक में बाज़ार में ऐसे विज्ञापनों की बाढ़ आयी जहां chandra bindi व्हाई-फ्रंट की चड्ढी या कसी हुई बॉक्सर्स पहने हुए मर्द या तो औरतों को बचा रहे थे, या उन्हें प्रभावित कर रहे थे, तब आदमियों ने मान लिया कि औरतें उनकी सेक्स अपील को इसी तरीके से मापती थीं। इन विज्ञापनों की बदौलत, विषमलैंगिक आदमी अपनी लैंगिकता को किस तरह से देखते-समझते थे, यह इस बात पे निर्भर था कि उनके हिसाब से औरतें उन्हें कैसे देखती थीं।”

नेविल शाह, हास्य अभिनेता/स्टैंड-अप कॉमेडियन (stand-up comedian) और ओगिल्वी एंड मेथर के एग्जीक्यूटिव क्रिएटिव डायरेक्टर (executive creative director), बहस करते हुए कहते हैं, “पुरुष रूप को लैंगिक/कामुक बनाने के लिए, चड्ढी के विज्ञापन हमेशा औरतों का इस्तेमाल करते थे। फीमेल प्रोडक्ट्स (female products) के विज्ञापनों में ऐसा कभी मर्दों के साथ नहीं होता था। 90 के दशक के विज्ञापन में मशहूर लिरिल सोप लड़की एक झरने के नीचे खुदबखुद नहा रही थी, कोई आदमी मौजूद नहीं था, उसे कामुक बनाने या महसूस करवाने के लिए। वह अपनेआप ही सेक्सी महसूस कर रही थी। लेकिन आदमियों के प्रोडक्ट के विज्ञापन…वह खुद सेक्सी महसूस करने के बारे में नहीं थे, बल्कि सामने वाली/नारी जाति को रिझाने के लिए सेक्सी महसूस करने पे केंद्रित थे।”

तो विज्ञापन एक विषम-मानक (एक विश्वदृष्टि जो बस विषमलैंगिकता को सामान्य मानती है) दुनिया में स्थित थे – लड़कों को लड़कियां और लड़कियों को लड़के पसंद हैं। लेकिन ग्राहक केवल इस दुनिया में ही स्थित नहीं थे – जिसे भी लड़कों को चड्ढीयों में देखना पसंद था, चाहे वह विषमलैंगिक हो या समलैंगिक, वह उन्हें ख़ुशी-खुशी देख रहे थे।

२००० के दशक से लेकर अब तक

पिछले दो दशकों में, अंडरवियर विज्ञापनों में आदमी लैंगिक जीव से लैंगिक वस्तु बन चुके हैं। माने? अमूल माचो का वह विवादस्पद विज्ञापन (२००७) याद है जिसमें सना खान  बैडरूम में अपने पती के कौशल को प्रतीकात्मक तरीके से ज़ाहिर करती है, उसकी बड़ी सी बॉक्सर ब्रीफ को घिसते हुए, उसे गाँव की ईर्षालु औरतों के सामने यूं शेखी बघारते हुए दिखाया गया है?

“यह तो बड़ा टोइंग है”, अंडरवियर मॉडल को लैंगिक बनाने के लिए एक आकर्षक नारा बन गया। विज्ञापन में मेल मॉडल को ना दिखाने के बावजूद, उसने स्पष्ट तरीके से यह बता दिया था कि टोइंग आदमी उस औरत की तृष्णा का वस्तु था।

जहाँ पुराने फ्रेंची विज्ञापन, अंग्रेजी-टाइप के मज़ाक अपने विज्ञापनों में डालते थे, नए विज्ञापन ज़्यादा देसी तरीके से काम करते हैं।

लेकिन इन विज्ञापनों में एक और दर्शनीय परिवर्तन आया था। फोकस/ध्यान पुरुष शरीर से अब लिंग पर शिफ्ट हो गया था।

कभी सोचा है कि आकर्षक/हॉट-हॉट (hot-hot) मॉडल पे बड़े बिलबोर्ड्स (billboards) पे चड्ढियाँ इतनी, हम्म, बड़ी क्यों लगती हैं? हर मॉडल का इतना बड़ा टोइंग तो नहीं हो सकता ना? प्रतीक पंचमियाँ, मुंबई में बसे एक फैशन फोटोग्राफर (fashion photographer) ने समझाया, “मेक-अप के दौरान मॉडल के अंडरविएर को खूब भर दिया जाता है,  ताकि चड्ढी का फिट यूनीफ़ॉर्म दिखे। आमतौर पर, कॉटन (cotton) और एथलेटिक पैडिंग (athletic padding) के अंडरवियर को सामान दिखाने के लिए क्लोज-अप शॉट (close-up shot) में इस्तेमाल किया जाता है।”

फिर, २००८ के वी आय पी फ्रेंची एक्स  विज्ञापन में, एक पुरुष मॉडल अपनी गर्लफ्रेंड के साथ सेक्स करने की कोशिश करता है, और वह उसे बार-बार ठुकराती रहती है जब तक वह उसे फ्रेंची एक्स अंडरवियर पहने हुए नहीं देख लेती  (और उसके सिक्स पैक को भी)। अचानक, वह दरवाज़े को धाड़ से अपने पीछे बंद करती है, मुमकिन है अपने बॉयफ्रेंड के साथ नॉटी-नॉटी करने के लिए। यह अंडरवियर के विज्ञापनों में एक निश्चित परिवर्तन दर्शाता है जैसे कि हम सेक्सी से सेक्स के तरफ रहे हों  रहे हों ।

२०१४ के यूरो (EURO) विज्ञापन में, एक कोकेशियन (Caucasian) आदमी को झरने में डुबकी लेते हुए दिखाया गया है, सिर्फ इसलिए ताकि फिर कोकेशियन जंगली औरतें उसे घेर सकें, जो पानी से उसके व्हाई-फ्रंट के निकलने के बाद, कामुक तरीके से उसे छूना शुरू कर देती हैं।

 

यूरो विज्ञापन की टैगलाइन से जुड़ी दिक्कतों को अभी के लिए नज़रअंदाज़ करते हैं । “हमले के लिए तैयार हो जाओ”, यह विज्ञापन ‘मैं चाहती हूँ’ से ‘मैं मोहक बनना चाहती हूँ’ की तरफ जा रहे हैं। और ऊपर से वह इस संभावना को बढ़ावा दे रहे हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय औरतें यह कह पायें कि ‘मैं चाहती हूँ’।

आज के अंडरवियर विज्ञापन मेँ सिद्धार्थ मल्होत्रा रूपा की चड्ढी पहनकर किसी जेम्स-बांड रूपक मिशन पर जाने के लिए तैयार है और कुछ सेक्सी शुरू करने का वादा करता है (#स्टार्टसमथिंगसेक्सी) (#StartSomethingSexy)। ९० के दशक मेँ गोविंदा के कच्छों की धुंधली याद पे (हमें लगता है क्योंकि वह अंदर की बात ही रही), अमेरिकन-स्टाइल बॉक्सर का ग्रहण लग चुका है।

जैसे-जैसे अंडरवियर और उसका विज्ञापन बदला है, वैसे ही उसे पहननेवाला शरीर। उस पुराने वी आय पी फ्रेंची विज्ञापन मेँ ताहिल के मुकाबले, आज का अंडरवियर मॉडल एकदम छेनी से कटा हुआ और बिना बालों के पाया जाता है। अंडरवियर विज्ञापन का हॉट आदमी पड़ोस के लड़के से जिम मेँ रहने वाले लड़के मेँ तब्दील हो गया है। ‘किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए’, यह पन्नों पर फैले हुए आदमी कुछ कहते हुए नज़र आते हैं, “कि देखो, यही आकर्षक/मोहक/तृष्णा के लायक पुरुष है।’ तो जहाँ विज्ञापन एक तरफ आज़ादी और विशवास का संकेत भेजता है, वहीं वह दूसरी तरफ सीमाएं भी तय करता है। अगर मैं इस बॉडी-टाइप (Body type) के अनुरूप नहीं चलूँ, तो?

उसका मॉडल मेरे मॉडल से सफ़ेद कैसे

पिछले कुछ सालों मेँ, चड्ढी के विज्ञापन मेँ सेक्सी मर्दानगी सिर्फ गोरे कोकेशियन (Caucasian) मॉडल से जुड़ गयी है। सिर्फ स्किन-टोन की बात नहीं है; यहां( chandra bindi)  भारतीय मर्दों के सर पर मंडराती बाहरी मॉडल का आकार और साइज़ भी है। क्या यह दिक्कत-तलब बात है? यह कैसे हुआ?

अजेश एन, डेन्ट्सु इंडिया के ग्रुप क्रिएटिव हेड (Group Creative Head), समझाते हैं कि अमूल, रूपा, वी आय पी और क्रोमोजोम जैसे भारतीय ब्रांड ने जॉकी, कैल्विन क्लाइन, ऍफ़ सी यू के, हैंज़ और यूरो  जैसे अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड के आने से बाज़ार मेँ अपनी हिस्सेदारी को खतरे मेँ पाया। अजेश कहते हैं, “अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड चाहते थे कि दुनिया भर मेँ उनके विज्ञापन एक जैसे दिखें, तो भारतीय बाज़ार के लिए कोई भारतीय मॉडल नहीं था, बस एक सफ़ेद बंदा उनके सभी मार्केट्स के लिए। यह बहुत हिट हो गया। इसने पुरुष मोहकता को एक सफ़ेद/कोकेशियन मॉडल जैसे दिखने के विचार से बाँध दिया – तीखी जबड़े की लकीर, तीखा हेअरकट, तीखे एब्सरूपा और वी आय पी जैसे भारतीय ब्रांड्स ने धीरे-धीरे इस विचार को उधार लेना शुरू किया। जल्द ही हम भारतीय चड्ढी के ब्रांड मेँ भी सफ़ेद बन्दों को देखने लगे। सनी देओल और सलमान खान का काम तमाम, अब बारी थी मशीन से बने सफ़ेद पुरुष मॉडल की।”

 

आज कल के विज्ञापनों मेँ दिखते शरीर आम आदमियों को अपने बारे मेँ कैसा महसूस करवाते हैं?

सर्वेश तलरेजा, एक मुंबई मेँ बसे लेखक कहते हैं, “मैं जानता हूँ कि मैं कभी उस बिलबोर्ड मेँ दिखाए गए एब्स वाले आदमी की तरह नहीं बनने वाला, और मुझे वैसा बनना भी नहीं है। लेकिन लैंगिक रूप से सक्रीय आदमियों पे यह विज्ञापन असर ज़रूर करते हैं। उदाहरण के लिए, जब मैं किसी लड़की की संगत मेँ होता हूँ, और हम सेक्स के लिए कपड़े उतार रहे होते हैं, तो मैं अपनेआप को अवचेतन रूप से नीचे के अपने फैशन चुनावों के बारे मेँ सोचते हुए पाता हूँ।”

 

३२ वर्षीय नटराज कुमार, जो चेन्नई के एक प्राइवेट बैंक मेँ मैनेजर हैं, कहते हैं, “इनमें से कुछ विज्ञापन मुझे अपने शरीर के बारे मेँ शर्मिंदा महसूस करवाते थे। मुझे उनके लैंगिक आत्मविश्वास से ईर्ष्या होती थी। मुझे पता है कि यह सब चालबाज़ी है और सच्चाई से कोसों दूर है, लेकिन कौन अपने आप को उस स्थिति मेँ नहीं पाना चाहेगा, एक मोहक मर्द जिसे सभी औरतें मिलती हैं?”

परमेश शाहनी, गोदरेज इंडिया कल्चर लैब के हेड (Head), बात को इस नज़रिये से नहीं देखते हैं। वह कहते हैं, “आपको डेटिंग एप्प ग्राइंडर पे काफी अंडरवियर मॉडल की तसवीरें का इस्तेमाल होते हुए पाएंगे। यह दिखाता है कि लोग, विषमलैंगिक या समलैंगिक,क्या चाहते हैं, कि दूसरे उन्हें किस नज़र से देखें?।” शाहनी कहते हैं कि यह विज्ञापन क्वीयर कल्पना मेँ काफी अच्छी तरह से बैठते हैं। “यह बहुत क्वीयर-फ्लेक्सिबल (queer flexible- यानि इनकी विवेचना अंदाज़ में भी की जा सकती है ) हैं – लैंगिक दृष्टी से कम और काल्पनिक दृष्टी से ज़्यादा। सेक्सी माचिस्मो के छुपे हुए और अलंकार  भी काफी मज़ेदार हैं।”

भला उसका मॉडल मेरे मॉडल से सफ़ेद कैसे  – काफ़ी मर्दों के लिए फिरंगी मेल मॉडल का ये सन्दर्भ उनमें  एक असहज एहसास पैदा करता है। मोहन पानिकेर, एक कोच्ची मेँ बसे आय.टी प्रोफेशनल (I.T. Professional) कहते हैं कि सफ़ेद मॉडल की चड्ढियाँ उन्हें अपने शरीर के प्रति शर्मिंदगी महसूस करवाती हैं। कहते हैं, “मैं एक ऐसे वातावरण से आता हूँ जहाँ मेरे सांवले रंग की वजह से हमेशा मेरा मज़ाक बनता था। पहले ही अंतर्राष्ट्रीय कपड़ों के ब्रांड की होर्डिंग्स पर सफ़ेद मॉडल को जीन्स और टी-शर्ट्स पहने देखना मुश्किल था, लेकिन अब अंडरवियर जैसी निजी और बेसिक चीज़ को भी नहीं बक्शा है। मुझे लगता है कि मेरा सांवला रंग लगातार अस्वीकार्य और अवांछनीय रहेगा।”

हमारे इस छोटे से चड्ढी के ऐतहासिक अभियान मेँ, दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं:

अंडरवियर के विज्ञापन सेक्सीनेस/कामुक मोहकता के विचार को आदमियों के शरीर के द्वारा बढ़ावा देते हैं और यह बढ़िया है। लेकिन साथ साथ, यह विज्ञापन एक सेक्सी पुरुष शरीर के मापदंड निर्धारित करते हैं। और यह शर्म की बात है।

हम मेँ से जो आदमियों की तरफ आकर्षित होते हैं – आदमी, औरतें और ट्रांस लोग – मानते हैं कि साइज़ सिर्फ एक क्षेत्र  में मायने रखता है। यानि हमारे दिलों का  साइज़ जो हर तरह के आदमियों की तृष्णा करने मेँ व्यस्त है – पतले, बिना मसल वाले, बालों वाले, और अलग अलग रंगों वाले। कभी कभी, जब फिल्में और पॉप कल्चर हमारी वासना की पाँति को दर्शाता है तो दिल मेँ कुछ कुछ होता है। यह दुःख की बात है कि विज्ञापनों की दुनिया मेँ, अब भी आदमी सिर्फ तभी आकर्षक माने जाते हैं जब वह मोहकता के पारम्परिक कोष्ठक मेँ बिठाये जा सकते हैं।

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