इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ ? अनिश्चित ब्रेकउप का दर्द

-करिश्मा शेट्टी

अनुवाद: तन्वी मिश्रा

इन दिल्ली के लड़कों के बारे में मैं क्या कहूँ? अगर यह देखने में इतने खूबसूरत ना होते तो मेरे पास इनसे बात करने की वजह नहीं होती। शायद यह खट्टे अंगूर वाला मामला है, लेकिन मेरी परेशानियाँ भी एक दिल्ली के लड़के के साथ ही शुरू हुईं, और इसी ने मेरी ज़िंदगी को उलट-पुलट दिया।

यह बात क्लासी लोगों को समझाना मुश्किल है, लेकिन मैं मुंबई के एक ऐसे हिस्से में बड़ी हुई जो बहुत ही “अनकूल” माना जाता था। मेरे स्कूल में, लड़के और लड़कियाँ एक दूसरे से खुलकर बात नहीं करते थे। मैं फ्रेंडशिप बैंड्स और जेल से खड़े हुए बालों/स्पाइक्ड बालों की दुनिया से आती हूँ। अगर मैं स्कूल में अंग्रेजी अच्छे से बोलने की कोशिश करती (जिसमें मैं तब भी बहुत अच्छी थी), तो मुझे यह बोलके चिढ़ाया जाता कि, “बहुत शाइनिंग मार रही है”। तो उस दुनिया से निकलकर “नेटफ्लिक्स और चिल” की दुनिया में प्रवेश करना मेरे लिए एक सांस्कृतिक झटका था। स्कूल में मैंने किसी लड़के का हाथ भी नहीं पकड़ा है यह सोचे बिना कि मैं कुछ बहुत ही ग़लत कर रही हूँ। तो कॉलेज में सबको हाथ में हाथ डाले हुए, लायब्ररी और खाली कॉरिडोर्स में एक दूसरे को चूमते हुए देखकर मैं चकित रह जाती। इस खुलम खुल्ला प्यार के आदि होने में मुझे काफी समय लगा।

कॉलेज और एक बड़े ब्रेकअप के ठीक बाद (३ साल लंबा, ज़हरीला रिश्ता), मुझे लड़कों से कोई वास्ता नहीं रखना था। मुझे यह लड़के-वडके नहीं चाहिए थे। लेकिन उसी साल मैं संकेत से मिली। मैं पुणे के २०१३ के एन.एच.७ वीकेंडर फेस्टिवल में गयी थी। बड़े होते हुए मेरे लिए वेस्टर्न संगीत का मतलब था लिंकिन पार्क और एनरिके इग्लेसियस। अचानक मैं इस फेस्टिवल में इंडी (माने इंडिपेंडेंट) संगीत सुन रही थी। मैं चारों ओर “कूल” लोगों से घिरी हुई थी, जो बनडॅना , हिप्पी शॉर्ट्स और हिप्स्टर धूप वाले चश्मों में थे। अपनी साधारण सी टी-शर्ट और कॉटन की पैंट में मुझे थोड़ा अजीब सा लग रहा था।

मैं इलेक्ट्रॉनिक म्यूज़िक स्टेज के सामने थी और उस संगीत में खोती जा रही थी। तभी मैंने संकेत को अपने बगल में नाचते हुए देखा। वह इतना सुंदर था कि उसे देखकर मेरी आँखें उसके चेहरे की खूबसूरती सह नहीं पा रही थीं। उसकी भूरी आँखें, प्यारी सी दाढ़ी और प्रोफाइल इस कदर खूबसूरत कि किसी का भी दिल आ जाए। वह भी अकेला था और उसे इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं थी। हमारी नज़रे टकरायीं। हम एक दूसरे को देखकर मुस्कुराये और फिर अचानक हम दोनों अकेले नहीं थे।

हम पूरे दिन एक साथ रहे। हमारे बीच साफ़ केमिस्ट्री थी। मेरी दोस्त दिव्या (जो बाद में मेरे साथ इस फेस्टिवल में जुड़ी) ने मुझसे कहा, “करू, वह जिस तरह से तुम्हें देखता है, मुझे बिलकुल पसंद नहीं आता।” मैंने उसे शरारती मुस्कराहट देते हुए कहा, “लेकिन क्या तुमने यह देखा है कि मैं उसकी तरफ किस तरह देखती हूँ?” मेरी इस बात से वह चौंकी हुई लग रही थी। मैं जानती हूँ कि वह क्या सोच रही थी – मैं भी बिल्कुल वही सोच रही थी।

अचानक मेरा संस्कारी, एक-ज़िंदगी-एक-बॉयफ्रेंड-व्रत टूट गया। मैं संकेत से इतनी आकर्षित थी कि मुझे दिन रात बस उसके साथ सेक्सी टाइम काटना था। हम एक स्टेज से दूसरे स्टेज की तरफ भागते, कभी हाथ पकड़े हुए, कभी हमारे हाथ एक दूसरे को छूते हुए, और ढेर सारा पी.डी.ए– यानी पब्लिक डेमोंस्ट्रेशन ऑफ़ अफेक्शन (लोगों के सामने एक दूसरे के लिए शारीरिक तरह से अपना लगाव व्यक्त करना) करते हुए। तनाव बस बढ़ता जा रहा था। फेस्टिवल खूबसूरत, फैशनेबल औरतों से भरा हुआ था जो खुद को लेकर आश्वस्त थीं। लेकिन संकेत – जो कि एक खिलाड़ी टाइप का लड़का था – की आँखें (और हाथ) सिर्फ मुझ पर केंद्रित थे। मैं बहुत खुश थी और मेरे सर पे कामोत्तेजनाएँ हल्ला बोल रही थीं। फेस्टिवल के तीसरे दिन हमने उसके होटल रूम में  सेक्सी टाइम किया। मैं इतनी डरी हुई थी। मेरे एक्स के अलावा, अच्छे सेक्स को मापने के लिए मेरे पास कोई तरीका नहीं था। जब आप किसी ऐसे इंसान के साथ सेक्सी टाइम करते हैं जो आपका बॉयफ्रेंड नहीं है, तो क्या करना होता है? उस रात मैंने इतने लंबे अरसे बाद सेक्सी टाइम किया कि लगा मैं पहली बार कर रही थी। और उफ़, वह बहुत शानदार था। लेकिन अगले दिन उस से क्या कहना चाहिए? मुझे नहीं पता था कि कूल प्रोटोकॉल (आधुनिक नियम) क्या था।

उसके साथ रात गुज़ारने के बाद, मैं मुंबई के लिए निकल गयी और वह बैंगलोर के लिए। कुछ हफ़्तों बाद वह काम के लिए मुंबई शिफ्ट हो गया। उसने मुझे कॉल किया और कहा कि मैं उसे शहर दिखाऊँ। मैं जानती थी इसका क्या मतलब था। और जी हाँ, मैं उसे क्या कुछ नहीं दिखाया। मुंबई में हमारी पहली रात बिल्कुल वीकेंडर जैसी थी। हम एक दूसरे से अपने हाथ नहीं हटा पा रहे थे। मैंने रात उसी के घर पे गुज़ारी, सेक्सी टाइम करते हुए, उसे छूते हुए, बात करते हुए, और सेक्सी टाइम करते हुए। उफ़, उसका वह आकर्षक चेहरा।

हमने हर दूसरे दिन सेक्सी टाइम करना शुरू कर दिया। हर वीकेंड का मतलब था पूरे-दिन सेक्सी टाइम करना। महीने भर, मुझे शानदार सेक्सी टाइम को छोड़कर, और किसी बात की परवाह नहीं थी। मुझे एहसास हुआ कि मेरे एक्स-बॉयफ्रेंड द्वारा दिखायी गयी सेक्स की दुनिया के बाहर भी कितना कुछ था मेरी सेक्स लाइफ में। कितनी स्वतंत्रता थी इस अनुभव में/उस बंधन के बाहर!

एक रात, सेक्सी टाइम के बाद (४ बार, हेहे), संकेत और मैंने बात करते हुए रात गुज़ारी। हमने सितारों के नीचे साथ बैठकर गाने गाये, जीवन, प्यार, विज्ञान और सभी बातों पर चर्चा की। मैंने पहली बार, इस बात पर गौर किया कि यह लड़का कितना होशियार और अच्छा था। अचानक मुझे यह बात समझ में आयी कि मैं संकेत के अलावा और किसी के साथ नहीं रहना चाहती थी। मुझे एहसास हुआ कि उसके साथ वक्त बिताना मुझे बहुत पसंद था। जिस लड़के के साथ मैं सो रही थी वह बहुत अच्छा था। लेकिन हम रिलेशनशिप में नहीं थे।

मैं उससे हमारे रिश्ते के बारे में बात करने से कतराती थी। मुझे डर था कि शायद मेरे सवालों से उसे असहजता महसूस हो, और वह मुझसे दूर रहने के फैसला कर ले। और वैसे भी, इन कूल टाइप के लड़कों से गंभीर मुद्दों के बारे में आखिर बात कैसे करते हैं? जब अपनी भावनाओं के बारे में बात करने का मौका आता तो वह इसमें बिल्कुल दिलचस्पी नहीं दिखाता।

सच यह था कि मैं नहीं जानती थी कि मैं इस रिश्ते को क्या नाम दूँ। रिलेशनशिप बोलूं या नहीं? क्या हम सेक्स बड्डीस थे (सेक्सी टाइम करने वाले दो दोस्त)? लेकिन संकेत हमेशा इस बात पर ज़ोर डालता कि उसके लिए यह सिर्फ सेक्स नहीं था। तो फिर इसे मैं क्या बुलाऊँ?

लेकिन सात महीने बीतने के बाद, मैंने देखा कि हमारे सेक्स के हसीन मौके कम हो गए। हम ज़्यादा नहीं मिलते थे। ना ही अक्सर ड्रिंक्स के लिए जाते। मुझे उसपे ज़ोर नहीं डालना था इसलिए मैंने उससे खुलकर पूछा नहीं कि आखिर चल क्या रहा था। मैंने उसके कॉल का इंतज़ार किया। लेकिन उसका कॉल नहीं आया। यह सिलसिला तीन महीने चला। लेकिन फिर भी, मेरे दिमाग में, मैं अब भी संकेत के साथ थी।

उसी दौरान, मेरी एक नयी सहेली बनी, अंचिता। वह हठी लड़की थी और सेक्स वगैरह के बारे में काफ़ी खुलकर बात करती थी। उसने कहा कि वह बैंगलोर के किसी लड़के के साथ सो चुकी थी जो अँधेरी में रहता था। वह उसे किसी दोस्त के ज़रिये मिली थी, और उसे काफ़ी मज़ा आया था। उन्होंने सिर्फ एक बार सेक्स किया था। फिर उसने मुझे उसका नाम बताया – संकेत – और उसकी तस्वीर दिखायी। यह तो मेरा संकेत था।

मुझे इस बात से इतना धक्का लगा और चोट पहुंची, कि मैं टूट गयी। संकेत ने उसके साथ सेक्स उस दौरान किया जब मुझे हमारा रिश्ता बिल्कुल लावारिस लग रहा था। कहीं उस गुस्से के पीछे, मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। शर्मिंदगी इस बात की कि मैं इतनी ज़रुरतमंद थी। मैंने उससे यह उम्मीद कैसे कर ली थी कि वह सिर्फ मेरे साथ रहने वाला था जब हम दोनों ने इस बारे में कभी बात तक नहीं की थी? मुझे लगा कि मैं एक छोटी इंसान थी क्योंकि अंचिता और संकेत की तरह मैं इतनी बेपरवाह और कूल नहीं रह सकती थी। ठुकराए जाने की भावना भी मुझे बहुत दर्द पहुंचा रही थी। शायद मैं उसे पर्याप्त रूप से अब आकर्षक नहीं लगती थी?

उस दिन मैंने उसे सीधे मुझे मिलने के लिए कहा ताकि हम इस बारे में बात कर सकें। लेकिन उसने सिर्फ मुझे एक मैसेज भेजा कि, “तुम एक बहुत अच्छी दोस्त हो और मुझे तुम्हारे साथ वक्त बिताना अच्छा लगता है।” तो क्या मैं दोस्त से ज़्यादा कोई मायने नहीं रखती थी उसके लिए? तो फिर इस सेक्स का क्या मतलब था? मुझे और भी शर्मिंदगी महसूस हुई कि मैं सेक्स और रिश्तों को अलग करने में ना-कामयाब रही थी।

लेकिन कहीं ना कहीं मैं जानती थी कि ब्रेकअप के तुरंत बाद मैं रिलेशनशिप भी नहीं चाहती थी।

धीरे-धीरे, मुझे लगने लगा कि मैं एक पाखंडी थी – मुझे खुद तो कमिट नहीं करना था लेकिन मैं यह भी नहीं चाहती थी कि संकेत और लोगों से मिले, या उनसे रिश्ता बनाये।

और धीरे-धीरे मुझे यह एहसास हुआ कि संकेत से मुझे सिर्फ एक जवाब चाहिए था – कि हम आपके हैं कौन? लेकिन बिना छोटा और अनकूल महसूस किये मैं यह सवाल कैसे पूछ सकती थी।

अगले कुछ हफ़्तों के लिए मैंने उसे बीमारी/हर तरीके से टाला। हम एक दूसरे से संगीत के किसी इवेंट या फिर डिनर (हमारे बहुत से कॉमन दोस्त थे) में टकराते रहते। मुझे याद है एक बार उसे देखकर मैं कॉन्सर्ट की जगह के बाथरूम मैं छिप गयी। वहाँ से निकलने में मुझे आधा घंटा लग गया।

लेकिन उसे हमारे “ब्रेकअप” को संभालने में कोई दिक्कत नहीं हुई। मेरी गपशप करने वाली सहेलियों ने मुझे उन सब लड़कियों के बारे में बताया जिन्हें वह मेरे बाद मिला था। किसी सहेली ने बताया कि उसने संकेत से इस बारे में बात की थी और उसने हैरान होते हुए कहा था कि, “करिश्मा और मेरा रिश्ता तो बहुत पहले ख़तम हो गया था!” अच्छा? मुझे तो इस बात से इत्तला नहीं किया गया था। यहाँ मैं सोच रही थी (और उम्मीद कर रही थी) कि हमारे बीच अब भी कुछ था। मुझे लगा कि हम साथ ना रहकर भी साथ थे, कि हम दूसरे लोगों को भी डेट कर रहे थे।

तो उसकी गैरमौजूदगी से निपटना और भी मुश्किल था। मुझे नहीं पता था कि मैं इस सबको क्या नाम दूँ। मेरे एक्स के साथ मेरा एक स्पष्ट रिश्ता था, और स्पष्ट ब्रेकअप भी। कुछ स्पष्ट मुद्दे थे मेरे पास उस ब्रेकअप से निपटने के लिए। लेकिन यहाँ, इस भावना के लिए मेरे पास कोई नाम नहीं था। एक ही समय पर मैं जलन, गुस्सा और बहुत बुरा महसूस कर रही थी। और ऐसा लगा कि मैं इसके लिए किसी को दोषी नहीं ठहरा सकती थी। मैं अपनी भावनाओं को किसी खांचे में नहीं बिठा पा रही थी।

हमारे कॉमन दोस्तों ने मुझे बताया कि वह पॉलीएमरस था (एक व्यक्ति जो एक ही समय पर एक से ज़्यादा इंसान की तरफ रोमानी लगाव महसूस करता है)। लेकिन मैं यह सब नहीं समझती थी। पर काश उसने मुझे बताने की कोशिश की होती। उसकी याद आने पर मैं खुद को कोसती और सोचती कि मैं कितनी बेवकूफ थी। मुझे हमारी की हुई बातें सताती, सेक्सी टाइम की यादें सताती। मेरे एक्स के बाद वह पहला लड़का था जिसके लिए मैंने अपने शरीर को खोला था। संकेत ने ही मुझे इस दुनिया में फेंका था जहां मैं अब रहती हूँ। तरल रिश्तों और बढ़िया संगीत की दुनिया। लेकिन इस अस्पष्टता का क्या मतलब है? मैं उसे कहना चाहती थी कि तुम सबके साथ सेक्स करो लेकिन मुझे यह तो बता दो कि हमारा रिश्ता क्या है?

क्या आपको वह हिंदी गाना याद है, इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ? तो वैसे ही, इस ब्रेअकप को मैं क्या नाम दूँ?

मैं सही में नहीं जानती थी कि इससे मैं कैसे उभरी। ६ महीने लग गए मुझे!

संकेत के साथ मेरी बहुत सी दिक्कतें इस बात से जुड़ी थीं कि मैं उसे जवाब माँगने से डरती थी और उसमें मुझे स्पष्टता से बात बताने की तमीज़ नहीं थी। मैं ऐसी थी क्योंकि मुझे में आत्मविश्वास नहीं था। “अच्छी लड़की” बने रहने की इतनी आदत थी और इम्पोस्टर सिंड्रोम (ऐसे लोग जो अपनी कामयाबी को अपना नहीं पाते – उन्हें हमेशा यूं लगता रहता है कि कोई उन्हें ढोंगी ऐलान कर देगा) का इतना गंभीर केस था। लगता था कि लोग मेरे अंदर छुपी बहनजी को अगर देख लेते तो मैं अपने सभी कूल दोस्तों से हाथ धो बैठती, खासकर संकेत से। लेकिन जैसे मैंने अपने सर्कल के लोगों को जानना शुरू किया, तो मुझे एहसास हुआ कि हर इंसान की कोई दुखती रग थी। इम्पोस्टर सिंड्रोम सब पर लागू होता है। मैंने अपने आप को बेहतर तरीके से बातचीत करना सिखाया और जाना कि मुझे सेक्स और रिश्तों से कमिटमेंट नहीं, स्पष्टता चाहिए थी।

मैंने ज़बरदस्ती खुद को बाहर जाने के लिए मजबूर किया। और लड़कों से मिली, और सेक्सी टाइम किया और दोस्तों के साथ वक्त गुज़ारा। संकेत को अब मैं म्यूज़िक के इवेंट में मिलती तो टालती नहीं थी। मैंने उसका सामना करने के लिए खुद पर दबाव डाला। यह शहर तो मेरा घर था, मैं उसको और कितनी देर टाल सकती थी?

लेकिन हमारे “ब्रेअकप” के महीनों बाद भी, वह बेशरम लड़का मुझसे फ़्लर्ट करता था। एक बार मुझसे किसी इवेंट में टकराने के बाद, उसने मुझे घर आने के लिए कहा। मैंने उसकी ओर घूर के देखा और हँसते हुए वहाँ से चल पड़ी। मुझे एहसास हुआ कि उन फक्स के बाद अब मेरे पास देने के लिए और फक्स नहीं बचे थे।

करिश्मा शेट्टी मुंबई में बसी एक लेखिका हैं। वह चाहती हैं कि पी.आर फर्म्स उन्हें कॉल करना बंद कर दें।

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