S.W.A.G. सेक्रेटली वी आर गे

सीक्रेट राइटिंग्स द्वारा

सानिका धाकेफालकर द्वारा चित्रित

छुपते-छुपाते, दुनिया की नज़रों से दूर, रात के अँधेरे में जब दो दिल मिलते हैं…तो वो समां जैसे थम सा जाता है। सर्दी और बारिश की ऐसी ही एक रात में जब मैं रज़ाई में, हीटर के सामने अपने लैपटॉप में कुछ काम कर रहा था तो मेरे मोबाइल की जलती-बुझती रौशनी ने मुझे बताया की कोई अजनबी मुझसे मिलना चाहता है। बस एक दफा मिले थे, एक रात में, बरसात की वो रात आज भी याद है…उसके घुंघराले बाल, बेहद संवेदनशील और तहज़ीब भरा व्यवहार जैसे मेरे दिल और दिमाग में छा गया था।

आज भी बारिश है…और मुझे दूसरी पहाड़ी के पार जाना है। पता नहीं कैसे जाऊंगा? पहुँच भी पाउँगा या नहीं? तैयार हुआ, थोडा इत्र लगाया और लम्बी काली जैकेट पहने, छाता लिए निकल पड़ा। मैं एक बार फिर अपने ख्वाब से मिल रहा था और इस ख्वाब को शब्दों में पिरोना आसान नहीं हैं। पर इस दफा, मेरा ख्वाब कुछ बदला हुआ था…उसके कटे बाल, पहले से कम वज़न जैसे कुछ बयां कर रहा था, या शायद बहुत कुछ बयां कर रहा था। कभी वो मेरी गोद में सर रखता तो कभी मेरे सीने से लिपट जाता, बार-बार मेरा हाथ चूमता और अपने सीने में छुपा लेता। कहता, हमारी सारी रातें ऐसी क्यों नहीं होतीं? पूरी रात मेरे हाथ को अपने सीने में लगाए चूमता रहा और मैं उसे सुनता और देखता रहा। मैं भी उसे बहुत प्यार करना चाहता था पर खुद को रोक रहा था, क्योंकि मुझे पता था…सुबह होते ही हम फिर से अजनबी हो जायेंगे, क्योंकि हम दोनों ने समाज के नियम तोड़ें हैं, हम महिलाओं के साथ शादी के रिश्ते में हैं और उस से भी पहले दो पुरुष हैं।

मेरे ख्वाब की ख़्वाबगाह उसने खुद सजाई थी। चारों तरफ, उसके बनाये हुए चित्र दीवारों से हमें ताक रहे थे, रंगों का बेहद खूसूरत इस्तेमाल और हर ख़्वाबगाह के उर्दू, सूफी नाम उसकी शख्शियत के बारे में कुछ कह रहे थे। इसे खाना बनाना, रंगों से खेलना, गाना गाना और खेती बेहद पसंद है। इतना खूबसूरत इंसान, जिसके पास हर गुण है…पर आज कुछ टूटा हुआ है। कहता मैं अपनी पहचान के दो हिस्सों में झूल रहा हूँ। कभी लगता है कि मैं गे हूँ और कभी नहीं हूँ। रोज़ खुद से झूठ बोलता हूँ। कहता है, अभी कुछ ही महीने हुए हैं मेरी शादी को और मेरी पत्नी हमेशा कहती है…तुम क्यों कभी मुझसे प्यार का इज़हार नहीं करते? उसके साथ बिस्तर पर रोज़ एक सज़ा होती है। पता है, मैं अपनी पत्नी का गुनहगार हूँ पर क्या समाज के बनाये नियम मुझपर थोपे नहीं गए? आगे कहता है…कॉलेज में मेरी एक गर्लफ्रेंड थी, पर शायद सबकी थी तो मेरी भी थी और दोस्तों के दबाब में आकर बनाई गर्लफ्रेंड थी। शायद किसी तरह जी लूँगा यह ज़िन्दगी और कहता आज बहुत हल्का महसूस हुआ बात करके। दिमाग पर बहुत बोझ है और यह बोझ अंदर ही अंदर मुझे खा रहा है। शादी से पहले दिल्ली में एक व्यक्ति से मिला, मुलाक़ात सिर्फ १५-२० मिनट की होगी पर सोचा शादी के बाद शायद मौका न मिले। जिससे मिला उसने भी मुझे सुख देने में कोई कसर न छोड़ी, टूट कर मुझे प्यार किया।

तड़के सुबह, अँधेरे में, मेरे जाने का समय आ गया। हमने कपडे पहने और ज़ोर से एक-दुसरे को गले लगाया, मैंने उसके होंठों पर चूमा और हम बाहर आ गए। बाहर चाँद जैसे हमें निहार रहा था। वापस रास्ते में, कई सवाल, थोड़ा दुःख और थोड़ी ख़ुशी के साथ में आगे बढ़ता रहा। अगले दिन उसके मैसेज या कॉल का इंतज़ार किया पर मेरा ख्वाब अब खत्म हो चुका था। उसका कोई सन्देश नहीं आया मेरे मैसेज का जवाब भी नहीं आया क्योंकि हम फिर से अजनबी थे।

सोचता हूँ, हमारी ज़िंदगी ऐसी दोहरी पहचान के साथ कब तक चलेंगी? क्या हमारी ज़िन्दगी प्यार की तलाश में ही बीत जाएगी? हाँ, हम गुनहगार हैं अपनी पत्नी के पर उन नियमों का क्या जो समाज ने हमपर थोपे हैं, और इन नियमों को हमें सारी ज़िन्दगी ढोना पड़ेगा।  शायद सारी ज़िन्दगी हमें S.W.A.G. में ही रहना पड़ेगा, सेक्रेटली वी आर गे।

लेखक की उम्र 32 साल है और वो हिमाचल के एक कस्बे में रहते हैं । वो LGBTQIA+ समुदाय के लिए हेल्पलाइन चलाते हैं और सेक्स, सेक्सुअलिटी, जेंडर, पितृसत्ता के मुद्दों पर लिखते , पढ़ते और बातचीत करते रहते हैं । गे हुक-उप apps के माध्यम से वो लोगों से मिलते रहते हैं और उन्हें लोगों की रोमेंटिक और सेक्स कहानियाँ सुनना पसंद है, वो कहानियाँ जो हम सिर्फ अजनबियों को सुना पाते हैं।

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